सत्य सांई स्कूल और रमेश बाहेती को 4.30 करोड़ का झटका, निगम को देना होगा संपत्तिकर
Indore. इंदौर में श्री सत्य सांई विद्या विहार स्कूल स्कीम 54 और उनके प्रबंधन को तगड़ा झटका लगा है। स्कूल प्रबंधन को निगम को संपत्ति कर देना होगा। तत्कालीन निगमायुक्त प्रतिभा पाल ने नवंबर 2020 में स्कूल को नोटिस दिया था।
स्कूल प्रबंधन साल 1996 से ही संपत्ति कर नहीं दे रहा है। स्कूल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में चेयरमैन पद पर उद्योगपति डॉ. रमेश बाहेती है, सचिव पद पर डॉ. त्रिभुवन सचदेवा और कोषाध्यक्ष सीए श्याम भाटिया है।
4 करोड़ 30 लाख रुपए का झटका
नगर निगम की गणना के अनुसार सत्य सांई स्कूल पर वर्तमान में 4 करोड़ 30 लाख के संपत्ति कर की डिमांड है। अब निगम को इस राशि वसूली का अधिकार मिल गया है। हालांकि यह तय है कि स्कूल प्रबंधन हाईकोर्ट में अपील करेगा। वहीं जिला कोर्ट के फैसले के बाद स्कूल प्रबंधन को हर साल करीब 45 लाख रुपए का सपंत्तिकर देना होगा।
क्या है मामला
सत्य सांई स्कूल संपत्ति कर नहीं दे रहा था और लगातार कहना था कि वह शैक्षणिक परिसर है। तत्कालीन निगमायुक्त प्रतिभा पाल के समय नवंबर 2020 में नोटिस दिया गया। इसके खिलाफ स्कूल प्रबंधन जिला कोर्ट चला गया।
प्रबंधन किसी ना किसी बहाने से इसमें टालमटोली करता रहा। इस पर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने इसमें मजबूती से तर्क रखने की जिम्मेदारी अधिवक्ता प्रांजल भाले को दी। निगम का मजबूत पक्ष बनवाया। लंबी सुनवाई के बाद इसमें अब जिला कोर्ट का फैसला आया।
खेल, पार्किंग एरिया का भी बनता है संपत्ति कर
इसमें सबसे बड़ा मुद्दा था कि खुद की विवरण में स्कूल प्रबंधन ने एरिया केवल 64 हजार वर्गफीट बताया था। जबकि निगम की गणना में आया कि यह करीब 3.45 लाख वर्गफीट है।
वहीं सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि जिला कोर्ट न्यायाधीश विनोद शर्मा ने कहा कि खेलकूद (ओपन) की 2 लाख 11 हजार वर्गफीट जमीन भी कर के दायरे में हैं।
आदेश में साफ कहा गया कि यह जमीन स्कूल की बाउंड्रीवाल के अंदर है और इसका उपयोग स्कूल के ही छात्र कर सकते हैं। इसकी भी फीस ली जाती है, ऐसे में खेल मैदान, पार्किंग की ओपन जमीन भी कर से मुक्त नहीं है।
स्कूल प्रबंधन धर्मार्थ नहीं कर रहा है, व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में निगम की गणना और नोटिस सही है। साथ ही शैक्षणिक परिसर भी कर के दायरे में आता है। इसलिए संपत्ति कर बनता है।
क्या बोल रहे महापौर और निगमायुक्त
महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा कि नियम से जो टैक्स बन रहा है वह सभी के देना चाहिए, क्योंकि यह राशि शहर के विकास में ही लगती है।
यह मामला लंबे समय से रूका था, अब जिला कोर्ट के फैसले से कई नीतिगत बातें साफ हो गई है और यह भी कि निगम की कार्रवाई सही है।
वहीं निगमायुक्त आईएएस क्षितिज सिंघल ने कहा कि यह अहम फैसला है और हर व्यावसायिक गतिविधि जहां फीस, शुल्क ली जाती है वह टैक्स के दायरे में आती है।
ये भी पढ़ें...
सत्यसांई यूनिवर्सिटी में सहायक प्राध्यापक के लिए उच्च शिक्षित ब्राह्मण वधू चाहिए