आईपीएस कैडर रिव्यू में देरी: कैडर रिव्यू बैठक नहीं हो सकी समय पर, अफसरों की उम्र निकली, जवाबदेह कौन?
कैडर रिव्यू की फाइल रुकी?
मध्यप्रदेश में आईपीएस बनने की उम्मीद लगाए बैठे राज्य पुलिस सेवा (State Police Service)के अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल वरिष्ठता या रिक्त पदों की नहीं है। सवाल उस प्रशासनिक प्रक्रिया का भी है, जिसके जरिए आईपीएस कैडर (IPS Cadre)की स्वीकृत संख्या और पदों की जरूरत की समीक्षा होती है।
जानकारी के मुताबिक, राज्य में कैडर रिव्यू निर्धारित अंतराल पर नहीं होने से पदोन्नति के अवसर प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समय पर समीक्षा नहीं होने से पदों की उपलब्धता और पदोन्नति की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है। हालांकि, किसी अधिकारी की पदोन्नति का अधिकार केवल कैडर रिव्यू से तय नहीं होता।
छह समीक्षा वर्ष, लेकिन नहीं हो सका समय पर
जानकारी के अनुसार वर्ष 2000, 2005, 2010, 2015, 2020 और 2025 मैं समीक्षा होना चाहिए थी। लेकिन हर बार कैडर रिव्यू की बैठकें तय समय सीमा में नहीं हो सकी। इस हिसाब से सवाल उठता है कि समीक्षा के बीच अंतराल लगातार क्यों बढ़ा? क्या प्रस्ताव समय पर नहीं भेजे गए या केंद्र और राज्य के स्तर पर प्रक्रिया लंबित रही? इन प्रश्नों का जवाब संबंधित विभागों के आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है।
उम्र की सीमा पार हुई तो नुकसान की भरपाई कैसे?
कैडर रिव्यू और पदोन्नति (promotion) में देरी से कई अफसरों की आईपीएस बनने की संभावनाएं प्रभावित हुईं। इसमें 56 वर्ष की आयु सीमा के कारण कुछ अधिकारियों के अवसर समाप्त होने की बात भी सामने आई है। हालांकि, आईपीएस में पदोन्नति के लिए आयु, चयन वर्ष, रिक्तियां, सेवा रिकॉर्ड और संबंधित नियम महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए किसी विशेष अधिकारी की पात्रता समाप्त होने का निष्कर्ष व्यक्तिगत सेवा अभिलेख और लागू नियमों की जांच के बिना नहीं निकाला जा सकता। असली सवाल यह है कि यदि प्रशासनिक देरी साबित होती है, तो प्रभावित अधिकारियों को राहत देने का कानूनी रास्ता क्या होगा?
बेस ईयर की गणना पर भी विवाद
मामला केवल कैडर रिव्यू की तारीखों तक सीमित नहीं है। दस्तावेज में आधार वर्ष यानी बेस ईयर की गणना पर भी सवाल उठाए गए हैं। पदोन्नति में संबंधित चयन वर्ष का महत्व होता है। ऐसे में गलत आधार वर्ष या रिक्तियों की गणना को लेकर विवाद पैदा होने पर अधिकारियों की वरिष्ठता और चयन की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। लेकिन बेस ईयर की गणना वास्तव में गलत हुई है या नहीं, यह संबंधित डीपीसी रिकॉर्ड, रिक्तियों के विवरण और लागू नियमों की जांच के बाद ही तय होगा।
2026 की डीपीसी में क्या मिलेगी राहत?
वर्ष 2025 के लंबित कैडर रिव्यू से संबंधित पदों को 2026 की विभागीय पदोन्नति समिति यानी डीपीसी की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। यह मांग सीधे उन अधिकारियों के भविष्य से जुड़ी है, जिन्हें समय पर समीक्षा नहीं होने के कारण नुकसान होने का दावा किया गया है। हालांकि, कैडर रिव्यू से स्वीकृत होने वाले पदों और पदोन्नति के लिए उपलब्ध रिक्तियों की गणना अलग कानूनी प्रक्रियाओं के अधीन है। इसलिए लंबित समीक्षा के संभावित पदों को डीपीसी में सीधे शामिल करना नियमों और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी पर निर्भर करेगा।
कानूनी सवाल: देरी हुई तो जिम्मेदारी किसकी?
आईपीएस कैडर की समीक्षा अखिल भारतीय सेवा कैडर नियमों के अंतर्गत होती है। इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकार की निर्धारित भूमिकाएं हैं। भारतीय पुलिस सेवा (कैडर) नियम, 1954 के नियम 4(2) में सामान्यतः पांच वर्ष के अंतराल पर कैडर की संख्या और संरचना की समीक्षा का प्रावधान है। लेकिन हर देरी को स्वतः अवैध मानना उचित नहीं होगा।
पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि संबंधित वर्षों में प्रस्ताव कब भेजे गए, किन स्तरों पर विचार हुआ और समीक्षा पूरी होने में कितना समय लगा। इसी तरह समय पर समीक्षा न होने से किसी अधिकारी को स्वतः आईपीएस पदोन्नति का अधिकार नहीं मिल जाता। इसके लिए वैधानिक पात्रता और चयन प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।
सरकार से तीन सीधे सवाल
- वर्ष 2025 के आईपीएस कैडर रिव्यू की वर्तमान स्थिति क्या है?
- निर्धारित समीक्षा अंतराल में देरी के कारण और संबंधित स्तरों की जिम्मेदारी क्या रही?
- प्रभावित अधिकारियों की शिकायतों और 2026 की डीपीसी संबंधी मांग पर क्या निर्णय लिया गया?
देरी का हिसाब कौन देगा?
मध्यप्रदेश में आईपीएस कैडर रिव्यू का विवाद केवल अधिकारियों की पदोन्नति तक सीमित नहीं है। यह प्रशासनिक समयबद्धता और पारदर्शिता से जुड़ा सवाल भी है। यदि दस्तावेज में बताए गए अंतराल और पदोन्नति पर पड़े प्रभाव की पुष्टि होती है, तो सरकार को देरी के कारण सार्वजनिक करने चाहिए। क्योंकि अधिकारियों की उम्र आगे बढ़ती रहती है, लेकिन प्रशासनिक फाइलों के इंतजार की कोई भरपाई अपने आप नहीं होती।