आईटीआई भर्ती में CITS अनिवार्य नहीं, हाईकोर्ट पहुंचा मामला

Neel Tiwari | Aug 27, 2026, 10:55 IST
आईटीआई भर्ती में विवाद
मध्य प्रदेश में आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती का विवाद हाईकोर्ट पहुंचा है। याचिकाकर्ता CITS को अनिवार्य योग्यता बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका दावा है कि केंद्र के निर्देशों के बाद भी सरकार स्किल डेवलपमेंट विभाग और ESB ने नियम नहीं बदले।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती में CITS योग्यता को लेकर विवाद है।
  • CITS धारकों का कहना है कि उन्हें भर्ती में लाभ नहीं मिला है।
  • केंद्र ने CITS को लेकर राज्यों को कई निर्देश दिए थे।
  • मध्य प्रदेश ने इन निर्देशों के बाद भी नियम नहीं बदले।
  • भर्ती विज्ञापन की नियुक्तियां अंतिम फैसले के अधीन रहेंगी।

आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती में CITS पर विवाद

मध्य प्रदेश में आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती विवाद में घिर गई है। मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर पहुंच चुका है। डब्ल्यू.पी. क्रमांक 13174/2026 में यह चुनौती दी गई है।



रामपाल रैकवार और अन्य ने यह याचिका दायर की है। सभी याचिकाकर्ता CITS प्रमाणपत्र धारक बताए गए हैं। कई याचिकाकर्ता आईटीआई में अतिथि फैकल्टी भी रहे हैं।



वे अब नियमित प्रशिक्षण अधिकारी पद (आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती परीक्षा) पर नियुक्ति चाहते हैं। उनका मुख्य सवाल भर्ती में CITS को लेकर है। नई भर्ती में CITS अनिवार्य योग्यता नहीं है।



CITS धारकों को अतिरिक्त अंक भी नहीं दिए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कि केंद्र सरकार के द्वारा बार-बार निर्देश देने के बाद भी ESB ने नियम नहीं बदले।



CITS क्या है और भर्ती में विवाद क्यों है

CITS का पूरा नाम क्राफ्ट इंस्ट्रक्टर ट्रेनिंग स्कीम हैं। यह प्रशिक्षण आईटीआई प्रशिक्षकों की ट्रेनिंग से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह योग्यता प्रशिक्षण अधिकारी पद के लिए जरूरी है।



वहीं मध्य प्रदेश के मौजूदा नियमों में यह जरूरी नहीं है। नई भर्ती में CITS को अलग लाभ भी नहीं मिला। इसी अंतर को याचिका का मुख्य आधार बनाया गया है।



केंद्र के निर्देश आए, फिर भी नियम नहीं बदले

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता श्रेयश राज त्रिपाठी और अधिवक्ता सुदीप चटर्जी ने पक्ष रखा। उन्होंने केंद्र सरकार के कई निर्देशों का उल्लेख किया है।



प्रशिक्षण महानिदेशालय यानी DGT ने राज्यों को पत्र भेजे। ऐसे निर्देश वर्ष 2016 से लगातार जारी किए जा रहे हैं। इन निर्देशों में CITS को भर्ती के लिए अनिवार्य करने की बात है।



जनवरी 2016, जुलाई 2019, दिसंबर 2019, जनवरी 2020, फरवरी 2022 से लेकर 30 जून 2023 के पत्र भी कोर्ट के सामने रखे गए। इसके बावजूद राज्य के भर्ती नियम नहीं बदले गए।



नियम बदलने की प्रक्रिया भी सालों से लंबित

याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2023 और 2024 में RTI से जानकारी मांगी थी। 20 जनवरी 2023 और 23 जुलाई 2024 को जवाब मिले। इन जवाबों में नियम बदलने की प्रक्रिया जारी बताई गई।



यानी नियम बदलने की प्रक्रिया जनवरी 2023 से चल रही थी, लेकिन नियमों में बदलाव अब तक नहीं हुआ। इसी दौरान 2026 की नई भर्ती शुरू कर दी गई।



याचिकाकर्ताओं ने इसी स्थिति पर गंभीर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि निर्देश पहले ही जारी हो चुके थे। फिर भी भर्ती पुराने नियमों के आधार पर शुरू हुई।



केंद्र के 2023 निर्देश में CITS को खास महत्व

याचिका में 30 जून 2023 के निर्देश का जिक्र है। इसमें CITS से जुड़े कई प्रावधान बताए गए हैं। यदि CITS उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हों तो विकल्प हो सकता है। ऐसी स्थिति में दूसरे योग्य उम्मीदवार लिए जा सकते हैं।



वहीं CITS धारक उम्मीदवार को प्राथमिकता देने की बात है। बिना CITS वाले उम्मीदवारों पर उन्हें प्राथमिकता देने के निर्देश है।



मध्य प्रदेश के 2009 नियमों पर उठे सवाल

बता दें कि मध्य प्रदेश ने वर्ष 2009 में भर्ती नियम बनाए थे। इन नियमों में आईटीआई कर्मचारियों की भर्ती तय होती है। याचिका में इन नियमों को चुनौती दी गई है।



इन नियमों में भी CITS जरूरी नहीं है। 26 सितंबर 2018 को नियमों में बदलाव भी हुआ। इसके बाद भी CITS को अनिवार्य नहीं किया गया।



याचिका में इसे केंद्र के निर्देशों की अनदेखी बताया गया। याचिकाकर्ताओं ने नियमों में बदलाव की मांग करते हुए 30 जून 2023 के निर्देश लागू करने की मांग की है।



दूसरे राज्यों में CITS को लेकर अलग व्यवस्था

याचिका में कई राज्यों के उदाहरण दिए गए हैं। इनमें बिहार, छत्तीसगढ़ और राजस्थान ,उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड भी जिक्र शामिल हैं।



याचिका के अनुसार वहां CITS को महत्व दिया गया है। कुछ राज्यों में इसे जरूरी योग्यता बताया गया है। कुछ जगह CITS धारकों को प्राथमिकता देने के नियम है। लेकिन मध्य प्रदेश की स्थिति अलग है। यहां CITS को समान लाभ नहीं मिला।



मध्य प्रदेश की अतिथि फैकल्टी भर्ती का उदाहरण

याचिका में मध्य प्रदेश के पुराने विज्ञापन भी रखे गए हैं। 26 से 28 जून 2024 के रीवा, सागर और ग्वालियर के भर्ती विज्ञापनों में CITS धारकों को प्राथमिकता दी गई थी।



ऐसे ही अतिथि फैकल्टी में CITS को महत्व दिया गया। लेकिन नियमित भर्ती में यह लाभ नहीं दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने इसी अंतर को चुनौती का आधार बनाया है।



पुराने हाईकोर्ट मामले का भी दिया गया हवाला

बता दें कि सुनवाई में W.P. क्रमांक 25430/2024 का भी जिक्र हुआ। याचिकाकर्ताओं के अनुसार वह मामला अभी लंबित है। उस मामले में पहले नोटिस जारी किए गए थे।



कोर्ट ने अंतरिम आदेश भी पारित किया था। उस आदेश में नियुक्तियों को अंतिम फैसले के अधीन किया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसके बावजूद नई भर्ती निकली।



नियुक्तियां कोर्ट के आदेश के अधीन

मामले की सुनवाई एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल भी डिविजनल बेंच में हुई। कोर्ट ने प्रशिक्षण महानिदेशालय यानी DGT सहित ESB और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है।



प्रतिवादियों को जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है। सबसे अहम बात भर्ती पर रोक नहीं लगाई गई। हालांकि विज्ञापन के तहत होने वाली नियुक्तियां सुरक्षित नहीं हैं।



हर नियुक्ति इस याचिका के अंतिम फैसले पर रहेगी। यानी चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति अंतिम नहीं मानी जाएगी। मामले के अंतिम फैसले का असर नियुक्तियों पर पड़ेगा।


कोर्ट ने साफ कहा कि चयन पर स्टे नहीं है।



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