जबलपुर की जीसीएफ को मिलेगा 300 धनुष तोपों का मेगा ऑर्डर
मध्यप्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर की गन कैरिज फैक्ट्री (जीसीएफ) अब भारतीय सेना की रीढ़ बनने की ओर अग्रसर है। नए वित्त वर्ष 2026-27 के साथ जीसीएफ प्रशासन ने एक नया लक्ष्य निर्धारित किया है। यह रक्षा उत्पादन के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा। जीसीएफ ने आठ महीने में 300 धनुष हावित्जर तोपों के उत्पादन का संकल्प लिया है।
बताया जा रहा है कि 2012 में जो पिछला कॉन्ट्रैक्ट GCF फैक्ट्री को दिया गया था, उसकी परफॉर्मेंस के आधार पर अब नया कॉन्ट्रैक्ट भी जीसीएफ को मिलने वाला है। 300 तोपों का कॉन्ट्रैक्ट जीसीएफ को दिए जाने की बड़ी वजह यह है कि गन कैरिज फैक्ट्री एक सरकारी फैक्ट्री है, जहां क्वालिटी पर कोई समझौता नहीं होता।
प्राइवेट फैक्ट्रियां मुनाफे पर ध्यान देती हैं, जबकि सरकारी फैक्ट्रियां उत्पाद की गुणवत्ता पर। यही कारण है कि जबलपुर की जीसीएफ फैक्ट्री के उत्पाद भारतीय सेना की परफॉर्मेंस को बेहतर बनाते हैं। पिछले ऑर्डर के आधार पर तय है कि अगला 300 बोफोर्स तोपों का कॉन्ट्रैक्ट भी जीसीएफ को मिलेगा।
धनुष तोप का सटीक प्रदर्शन
यह कदम ऑपरेशन सिंदूर में धनुष तोप द्वारा दिखाए गए सटीक प्रदर्शन के बाद लिया गया है। ऑपरेशन के दौरान धनुष तोप ने दुश्मन के ठिकानों को सटीक तरीके से नष्ट किया था। इससे भारतीय सेना ने जीसीएफ की क्षमता पर भरोसा जताया। पिछले साल जीसीएफ को 150 तोपों का वर्क ऑर्डर मिला था। इस बार सेना ने जीसीएफ की क्षमता पर विश्वास जताते हुए लक्ष्य को दोगुना कर दिया है।
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धनुष तोप की खासियतें
155 मिमी और 45-कैलिबर की रेंज।
38 से 42 किलोमीटर की मारक क्षमता।
80 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक।
पिन-पॉइंट सटीकता का प्रदर्शन।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम।
स्वदेशी तकनीक और आत्मनिर्भर भारत
300 धनुष तोपों का मेगा ऑर्डर जीसीएफ के लिए आर्थिक संजीवनी है। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह तोप 155 मिमी और 45-कैलिबर वाली है। इसके 80 प्रतिशत से अधिक पुर्जे स्वदेशी हैं। इसकी रेंज 38 से 42 किलोमीटर तक है। यह दुश्मन के ठिकानों को आसानी से नष्ट कर सकती है।
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लाइट फील्ड गन में सेना की नई रुचि
धनुष तोप के साथ-साथ भारतीय सेना ने लाइट फील्ड गन (एलएफजी) में भी गहरी रुचि दिखाई है। लगभग एक दशक के इंतजार के बाद, सेना ने इस हल्की और घातक तोप के लिए 24 यूनिट्स का लक्ष्य दिया है। एलएफजी की 17 से 19 किमी तक की मारक क्षमता दुर्गम रास्तों पर वरदान साबित हो सकती है। इन रास्तों पर भारी मशीनरी का पहुंचना मुश्किल होता है।