B.Ed.-D.Ed वाले शिक्षकों को मिलेगा वेतनवृद्धि का लाभ, हाईकोर्ट में हारी सरकार

Sanjay Dhiman | Aug 29, 2026, 22:17 IST
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जबलपुर हाईकोर्ट ने B.Ed.-D.Ed. योग्यता वाले शिक्षकों को दो अग्रिम वेतनवृद्धि देने के आदेश पर सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कट-ऑफ डेट को गलत बताया।

जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की एक पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। यह याचिका शिक्षकों की वेतनवृद्धि से जुड़ी थी। मामला B.Ed.-D.Ed. योग्यता हासिल करने वाले शिक्षकों का है। कोर्ट ने कहा कि सरकार बिना ठोस आधार के शिक्षकों में भेदभाव नहीं कर सकती। पुराना आदेश अब पूरी तरह बरकरार रहेगा।



दो शिक्षकों से शुरू हुआ मामला

यह विवाद पन्ना जिले के दो शिक्षकों से जुड़ा है। इनके नाम सुमेर सिंह और भान सिंह हैं। दोनों ने अपनी नौकरी के दौरान B.Ed.-D.Ed. की योग्यता हासिल की थी। नियमों के मुताबिक इस योग्यता पर उन्हें दो अग्रिम वेतनवृद्धि मिलनी थी। लेकिन सरकार ने यह लाभ देने से इनकार कर दिया।



दोनों शिक्षक कोर्ट पहुंचे। जबलपुर हाईकोर्ट ने 16 जून 2025 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने सरकार को दो वेतनवृद्धि देने का आदेश दिया था। इसी आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने रिव्यू पिटीशन दाखिल की।



सरकार ने दिया 1999 की कट-ऑफ का तर्क

राज्य सरकार ने कोर्ट में एक खास दलील दी। सरकार ने कहा कि दोनों शिक्षकों ने अपनी योग्यता 1 मार्च 1999 के बाद हासिल की थी। इस आधार पर सरकार ने वेतनवृद्धि के लाभ का विरोध किया।



गुरुवार को इस मामले पर सुनवाई हुई। जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच ने मूल नियमों और सरकार के सर्कुलर, दोनों पर बारीकी से विचार किया। कोर्ट के सामने नियमों की पूरी पृष्ठभूमि रखी गई।



1993 से पहले नियुक्त शिक्षकों का नियम

मूल नियमों के अनुसार 16 जून 1993 से पहले नियुक्त शिक्षक इस लाभ के हकदार माने गए थे। इसकी वजह साफ थी। 16 जून 1993 के बाद शिक्षक भर्ती के लिए B.ed-D.ed. योग्यता अनिवार्य कर दी गई थी। इसलिए पुराने शिक्षकों को अलग श्रेणी में रखा गया।



बाद में सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया। इसमें एक नई शर्त जोड़ी गई। शर्त यह थी कि 1993 से पहले नियुक्त शिक्षक तभी लाभ पाएंगे, जब उन्होंने योग्यता 1 मार्च 1999 से पहले हासिल की हो। इसी शर्त को लेकर पूरा विवाद खड़ा हुआ।



कोर्ट ने सर्कुलर को बताया अपर्याप्त आधार

जस्टिस विवेक जैन ने अपने फैसले में एक अहम बात कही। उन्होंने कहा कि 16 जून 1993 से पहले नियुक्त सभी शिक्षक एक ही वर्ग में आते हैं। ऐसे में इस वर्ग के भीतर अलग व्यवहार करने के लिए ठोस और तार्किक आधार जरूरी है।



कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार 1 मार्च 1999 की कट-ऑफ के लिए कोई ठोस औचित्य पेश नहीं कर सकी। सिर्फ प्रशासनिक सर्कुलर जारी करके मूल नियमों के तहत मिलने वाला वैधानिक लाभ नहीं छीना जा सकता। यह टिप्पणी फैसले का सबसे अहम हिस्सा रही।



पुराना आदेश बरकरार, याचिका खारिज

कोर्ट को पुनर्विचार का कोई ठोस आधार नहीं मिला। इसके बाद राज्य सरकार की रिव्यू पिटीशन खारिज कर दी गई। 16 जून 2025 का मूल आदेश पूरी तरह बरकरार रखा गया। अब दोनों शिक्षकों को दो अग्रिम वेतनवृद्धि का लाभ मिलेगा।



शिक्षकों की ओर से अधिवक्ता सुभाष कुमार चतुर्वेदी ने पैरवी की। कोर्ट के इस फैसले से समान परिस्थिति वाले अन्य शिक्षकों को भी राहत मिलने की उम्मीद है। फैसले में कोर्ट ने एक सिद्धांत भी दोहराया। समान श्रेणी के कर्मचारियों के बीच मनमानी कट-ऑफ लगाकर भेदभाव नहीं किया जा सकता।



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