भ्रूण लेकर हाईकोर्ट पहुंचने पर सख्त हुई अदालत, 200 करोड़ गबन वाली याचिका खारिज
News in short
- जबलपुर हाईकोर्ट ने भ्रूण लेकर कोर्ट पहुंचने वाले याचिकाकर्ता को चेतावनी दी।
- कोर्ट ने कहा न्याय प्रक्रिया भावनाओं नहीं, सबूतों पर चलती है।
- याचिकाकर्ता ने मारुति सुजुकी पर 200 करोड़ गबन का आरोप लगाया था।
- अदालत ने याचिका को अस्पष्ट और भ्रामक बताते हुए खारिज कर दिया।
- कोर्ट ने कहा यदि शिकायत है तो मजिस्ट्रेट के पास जाने का कानूनी रास्ता खुला है।
News in detail
जबलपुर हाईकोर्ट ने कोर्ट रूम में भ्रूण लाने की घटना पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इसे न्याय प्रक्रिया के साथ अनुचित और आपत्तिजनक व्यवहार बताया। साथ ही 200 करोड़ रुपये के कथित गबन को लेकर दायर याचिका भी खारिज कर दी।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर प्रिंसिपल बेंच में एक असामान्य घटना सामने आई थी। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता दयाशंकर पांडे कोर्ट रूम में भ्रूण लेकर पहुंच गए थे। मामला जस्टिस हिमांशु जोशी की एकल पीठ के सामने सुनवाई में था।
अदालत ने इस घटना को बेहद आपत्तिजनक और अनुचित करार दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि अदालत में न्याय कानून और सबूतों से होता है। भावनात्मक या नाटकीय तरीके से न्याय प्रक्रिया प्रभावित नहीं हो सकती।
क्या था पूरा मामला
रीवा निवासी दयाशंकर पांडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत लगाई गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड में बड़ा आर्थिक घोटाला हुआ है। उनके अनुसार कंपनी में 200 करोड़ रुपये से अधिक का गबन हुआ है।
दयाशंकर का दावा था कि इस मामले को उजागर करने के बाद उन्हें धमकियां मिलीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके परिवार पर हमले हुए। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से जांच कराने की मांग की थी।
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याचिका में ये की मांग
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कई मांगें रखी थीं। उन्होंने पुलिस को निष्पक्ष जांच का आदेश देने की मांग की थी। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी से 200 करोड़ रुपये की वसूली हो। साथ ही 82 लाख रुपए मुआवजा देने की मांग भी की गई। याचिका में बेटी के इलाज और मानहानि का भी जिक्र किया गया था। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से भी मुआवजे की मांग की थी।
कोर्ट ने जताई सख्त आपत्ति
सुनवाई के दौरान अदालत को पता चला कि पिछली तारीख पर याचिकाकर्ता भ्रूण लेकर आए थे। 9 मार्च 2026 की सुनवाई में उन्होंने इसे कोर्ट के सामने रख दिया था। इस पर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई।
अदालत ने कहा कि यह न्यायालय की गरिमा के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि यह आचरण नाटकीय और अनुचित है। अदालत में ऐसे तरीके स्वीकार नहीं किए जा सकते।
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जैव चिकित्सा नियमों का उल्लंघन बताया
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रूण का निपटान नियमों के अनुसार होना चाहिए। इसके लिए जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 लागू होते हैं।
कोर्ट ने कहा कि भ्रूण को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना गलत है। यह कानून के उल्लंघन की श्रेणी में भी आ सकता है। अदालत ने कहा कि यह मानव शव की गरिमा के खिलाफ भी माना जा सकता है।
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याचिका खारिज करने की मुख्य वजह
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिका में पर्याप्त सबूत नहीं हैं। याचिकाकर्ता ने 200 करोड़ गबन का कोई दस्तावेज पेश नहीं किया। हमलों से जुड़ी पुलिस शिकायत की कॉपी भी रिकॉर्ड में नहीं थी।कोर्ट ने कहा कि आरोप गंभीर हैं, लेकिन सबूत जरूरी हैं।
पहले भी लग चुकी थीं दो याचिकाएं
अदालत ने अपने आदेश में एक और तथ्य बताया। याचिकाकर्ता पहले भी इसी मामले में दो याचिकाएं लगा चुके थे। इनमें से एक याचिका 2025 में दायर हुई थी। दूसरी याचिका 2026 की शुरुआत में लगाई गई थी। दोनों मामलों को बाद में वापस ले लिया गया था। इस आधार पर कोर्ट ने प्रक्रिया के दुरुपयोग की बात कही।
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कोर्ट ने बताया कानूनी रास्ता
अदालत ने कहा कि शिकायत का कानूनी रास्ता मौजूद है। यदि पुलिस कार्रवाई नहीं करती तो मजिस्ट्रेट के पास जाया जा सकता है। इसके लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 में प्रावधान है। धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट को शिकायत दी जा सकती है।
भविष्य के लिए दी कड़ी चेतावनी
जस्टिस हिमांशु जोशी ने याचिकाकर्ता को चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसा व्यवहार दोबारा नहीं होना चाहिए। यदि फिर ऐसा हुआ तो संबंधित प्राधिकरण कार्रवाई कर सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायालय की गरिमा सर्वोपरि है।