अब्दुल रज्जाक केस में जबलपुर पुलिस की कमजोर जांच, हाईकोर्ट में खुली पोल, आरोपी को मिलेगा फायदा

Neel Tiwari | Apr 02, 2026, 23:54 IST
Photograph: (thesootr)
JABALPUR. जबलपुर पुलिस की जांच में खामियों का खुलासा हुआ, जिससे अब्दुल रज्जाक को लाभ मिल सकता है। मामले की सुनवाई अब चीफ जस्टिस की बेंच में होगी।

News In Short

  • अब्दुल रज्जाक के ऊपर कई मामलों में पुलिस ने जांच में की गफलत
  • रज्जाक जब देश से बाहर था, उस दौरान भी पुलिस ने उस पर अपराध करना दिखा दिया।
  • मामले के जांच अधिकारी कोर्ट में नहीं हुए पेश, CSP और TI ने दिए गलत बयान
  • जुलाई 2025 में दायर यह याचिका करीब एक साल तक गलत बेंच में सुनी जाती रही।
  • कोर्ट ने माना कि केस डायरी और रोजनामचा की एंट्री में पुलिस ने हेरफेर की है।

News In Detail

जबलपुर के हिस्ट्रीशीटर अब्दुल रज्जाक से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट में पुलिस अधिकारियों ने न केवल गलत बयानबाजी की, बल्कि जांच में ऐसी बड़ी खामियां सामने आईं जो पुलिस की कार्यप्रणाली और नीयत पर सवाल खड़े करती हैं।



हालांकि, इस मामले में एक और चौकाने वाली बात सामने आई है कि लगभग 1 साल तक इस मामले की सुनवाई गलत बेंच में होती रही। अब इस पूरे मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस की बेंच में होगी।



यह था पूरा मामला

यह पूरा विवाद हिस्ट्रीशीटर अब्दुल रज्जाक के ऊपर की गई NSA की कार्रवाई और अस्पताल में हुई एक कथित हिंसक घटना से जुड़ा है। जबलपुर पुलिस के मुताबिक, अब्दुल रज्जाक को जब मुलाहिजा (मेडिकल चेकअप) के लिए विक्टोरिया अस्पताल ले जाया गया था, तब वहां कथित तौर पर रज्जाक ने अंकित मिश्रा नाम के व्यक्ति पर हमला कर दिया था।



पुलिस का दावा था कि जब रज्जाक को चेकअप के बाद वापस लाया जा रहा था, तब यह घटना हुई। इसी आधार पर रज्जाक के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, लेकिन कोर्ट में जब इस कहानी की कड़ी से कड़ी मिलाई गई, तो पुलिस के दावे ताश के पत्तों की तरह ढह गए।



पुलिस जांच की कोर्ट में खुली पोल

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की बेंच के सामने जब सुनवाई शुरू हुई, तो पुलिस की दलीलें किसी फिल्मी कहानी की तरह उलझती नजर आईं।



ओमती सीएसपी सोनू कुर्मी और टीआई राजपाल सिंह बघेल ने कोर्ट को यह यकीन दिलाने की कोशिश की कि जिस अंकित मिश्रा पर रज्जाक ने हमला किया था वह पहले से ही अस्पताल में भर्ती था।



जब कोर्ट ने अंकित मिश्रा के अस्पताल में भर्ती होने के दस्तावेज मांगे, तो अधिकारियों ने घुटने टेक दिए और स्वीकार किया कि उन्होंने कोर्ट के सामने गलत बयान दिया था। सच यह था कि अंकित मिश्रा कभी अस्पताल में भर्ती ही नहीं हुआ था।



अब्दुल रज्जाक विदेश में और जबलपुर में अपराध

पुलिस की सबसे बड़ी लापरवाही तब सामने आई जब रज्जाक के पासपोर्ट की जांच हुई। रिकॉर्ड के मुताबिक, रज्जाक 30 दिसंबर 2019 से 14 जनवरी 2020 तक भारत से बाहर था।



हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने उस दौरान की भी ऐसी एफआईआर (FIR) दिखाई जिसमें रज्जाक को जबलपुर में अपराध करते बताया गया। कोर्ट ने इसे पुलिस की "खोखली कार्यप्रणाली" करार दिया।



जांच अधिकारी को क्यों छिपाया गया

01 अप्रैल 2026 को कोर्ट ने जबलपुर के SP संपत उपाध्याय को तलब करते हुए निर्देश दिया था कि मामले से जुड़े सभी अधिकारियों और दस्तावेजों को पेश किया जाए। इसके बावजूद, मुख्य जांच अधिकारी बुंदेलधर द्विवेदी को कोर्ट के सामने नहीं लाया गया।



टीआई बघेल ने बहाना बनाया कि द्विवेदी ही देरी और कमियों के बारे में बता सकते हैं, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह पुलिस की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं है। कोर्ट ने इसे पुलिस की लापरवाही और रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ का संकेत माना।



हालांकि, जांच अधिकारी को कोर्ट में पेश न करने का खामयाजा पुलिस को ही भुगतना पड़ा। दरअसल CSP सोनू कुर्मी और ओमती थाना प्रभारी राजपाल सिंह बघेल इस मामले की कायमी के समय पदस्थ ही नहीं थे। यही कारण था कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी ही नहीं थी और वह कोर्ट में गलत बयानी करते हुए नजर आए।



महाधिवक्ता खुद हुए हाजिर और पुलिस को बचाया

इस मामले में कोर्ट का कड़ा रुख देखते हुए महाधिवक्ता प्रशांत सिंह खुद कोर्ट में हाजिर हुए। प्रशांत सिंह ने कोर्ट को तर्क दिया कि आरोपी एक हिस्ट्रीशीटर बदमाश है और उससे जुड़े सभी मामलों के दस्तावेज लाना और उसपर कोर्ट के सवालों का जवाब देना पुलिस अधिकारियों के लिए तुरंत मुमकिन नहीं है।



इसके साथ ही उन्होंने कोर्ट को बताया कि यह एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका है जिसकी सुनवाई चीफ जस्टिस की बेंच में होनी चाहिए। हालांकि कोर्ट ने यह भी ऑब्जर्व किया कि अब तक सरकार की ओर से पेश हो रहे उपमहाधिवक्ता या याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को कभी यह जानकारी नहीं दी।



एक साल तक गलत कोर्ट में होती रही सुनवाई

यह याचिका (WP-27476/2025) जुलाई 2025 में दायर की गई थी। कानूनी नियमों के मुताबिक, 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिकाओं की सुनवाई केवल चीफ जस्टिस की बेंच (DB-1) ही कर सकती है। लेकिन पुलिस सहित सरकारी वकीलों और याचिकाकर्ता ने यह तकनीकी बात पहले नहीं बताई।



महाधिवक्ता प्रशांत सिंह जब इस मामले में पेश हुए तब उन्होंने यह तथ्य कोर्ट के सामने रखा। इस कारण से करीब एक साल तक गलत बेंच में सुनवाई होती रही और कोर्ट का कीमती समय बर्बाद हुआ।



क्या रज्जाक को मिलेगा पुलिस की गलतियों का फायदा?

पुलिस ने रोजनामचा एंट्री नंबर 27 और 32 में जो समय दिखाया है, उसमें भारी अंतर है। दोपहर 15:00 बजे जब रज्जाक को रिमांड खत्म होने पर कोर्ट में होना चाहिए था, तब पुलिस उसे वापस थाने ले आई।



अंकित मिश्रा पर हमले की कहानी में भी पुलिस ने अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज या स्वतंत्र गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए। जांच में इन "झूठ" और "दस्तावेजी हेरफेर" का सीधा फायदा अब्दुल रज्जाक को मिल सकता है, क्योंकि कोर्ट में पुलिस के साक्ष्य बेहद कमजोर और अविश्वसनीय साबित हो रहे हैं।



अब चीफ जस्टिस की डिविजनल बेंच में सुनवाई

जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच ने अब सारा रिकॉर्ड सील कर दिया है। मामले को 06 अप्रैल 2026 को चीफ जस्टिस की बेंच के सामने पहली सुनवाई के तौर पर लिस्ट करने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब किसी भी पक्ष को आगे कोई मोहलत नहीं दी जाएगी।



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