जज ने की कानून की अनदेखी, रिवीजन कोर्ट ने निचली अदालत की कानूनी समझ पर उठाए सवाल
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- बिना शपथ पर बयान दर्ज किए परिवाद खारिज किया गया।
- BNSS की धारा 223 और 226 का पालन नहीं किया गया।
- कोर्ट ने कहा कानूनी प्रक्रिया की मूलभूत समझ में चूक।
- आदेश को वैधता और औचित्य रहित बताया गया।
- केस दोबारा बहाल, 5 मई को अगली सुनवाई तय।
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जबलपुर में एक क्रिमिनल रिवीजन मामले में कोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने कानून की बुनियादी प्रक्रिया नजरअंदाज की। बिना परिवादी और गवाहों के बयान दर्ज किए परिवाद खारिज करना गंभीर गलती था। कोर्ट ने आदेश को अवैध घोषित कर फिर से सुनवाई के निर्देश दिए।
मूल कानून की समझ में गंभीर चूक
जबलपुर के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मनीष सिंह ठाकुर की कोर्ट में जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े के मामले में सुनवाई हुई। रिवीजन कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने केवल एक तकनीकी गलती नहीं की, बल्कि कानून की बुनियादी प्रक्रिया को सही तरीके से समझने में चूक की।
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को जरूरी प्रक्रिया का पालन करना था, लेकिन इसे नजरअंदाज किया गया। यह केवल साधारण त्रुटि नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विपरीत कदम था। इससे आदेश की वैधता संदिग्ध हो गई। इस मामले के सामने आने के बाद कानूनी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि मामलों का बोझ कम करने की जल्दी में जज हवा हवाई आदेश जारी कर रहे हैं।
जमीन विवाद से शुरू हुआ था आपराधिक मामला
पूरा मामला भूरेलाल पटेल द्वारा दायर परिवाद से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी कृषि भूमि को जाली दस्तावेजों के जरिए हड़पने की साजिश रची गई। इसके साथ ही बैंक से मिलीभगत कर जमीन को गिरवी से मुक्त कराने और विरोध करने पर मारपीट व जान से मारने की धमकी देने के आरोप भी लगाए गए। पुलिस द्वारा FIR दर्ज न करने के बाद, उन्होंने न्यायालय का सहारा लिया। यानी यह मामला केवल दीवानी विवाद तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें आपराध भी साफ तौर पर दिख रहा था।
धारा 223 की अनिवार्य प्रक्रिया
रिवीजन कोर्ट ने आदेश में बताया कि BNSS की धारा 223 के तहत मजिस्ट्रेट के लिए परिवादी और गवाहों के बयान दर्ज करना अनिवार्य है। यह प्रक्रिया इसलिए जरूरी है, ताकि कोर्ट तय कर सके कि अपराध बनता है या नहीं। इस मामले में मजिस्ट्रेट ने यह कदम छोड़ा और निष्कर्ष निकाला कि FIR दर्ज करने का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने इसे कानून की “मूलभूत समझ में कमी” के रूप में देखा।
बिना परीक्षण के ही दे दिया अंतिम निष्कर्ष
सिर्फ धारा 223 ही नहीं, बल्कि BNSS की धारा 226 का भी स्पष्ट उल्लंघन सामने आया। इस धारा के अनुसार, मजिस्ट्रेट तभी परिवाद खारिज कर सकता है जब वह परिवादी और गवाहों के बयान तथा जांच के परिणामों पर विचार कर ले। यहां न तो कोई बयान दर्ज किया गया, न ही कोई जांच हुई। सीधे परिवाद खारिज कर दिया गया। रिवीजन कोर्ट ने इसे गंभीर गलती बताया और कहा कि इस तरह का आदेश कानूनी कसौटी पर टिक नहीं सकता।
गलत धारणा में दिया गया आदेश
रिवीजन कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण पहलू उजागर किया। कोर्ट ने लिखा कि मजिस्ट्रेट ने मामले को धारा 175(3) के तहत आवेदन मानकर निर्णय लिया। जबकि यह एक परिवाद (complaint case) था। जज ने केस की प्रकृति को गलत समझा और उसी आधार पर आदेश दिया। यह गलती गंभीर मानी गई क्योंकि इससे कार्यवाही की दिशा बदल गई और परिवादी को न्याय नहीं मिल पाया।
क्या मामलों के दबाव में हुई जल्दबाजी?
इस फैसले ने न्यायिक प्रणाली के भीतर एक अहम सवाल भी खड़ा कर दिया है। क्या लंबित मामलों के भारी दबाव के चलते जल्द निपटारे की कोशिश में ऐसी मूलभूत चूक हो रही है? जब बिना प्रक्रिया पूरी किए ही मामलों को खारिज किया जाता है, तो यह संबंधित पक्ष के अधिकारों का हनन करता है। इससे न्याय की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं। रिवीजन कोर्ट की सख्त टिप्पणियां इसी चिंता को उजागर करती हैं।
दोबारा शुरू होगी पूरी कानूनी प्रक्रिया
रिवीजन कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मामले को मूल नंबर पर बहाल किया जाए। BNSS के अध्याय XVI के तहत पूरी प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। इसका मतलब है कि अब परिवादी और गवाहों के बयान दर्ज होंगे। इसके बाद तय किया जाएगा कि मामला आगे बढ़ेगा या नहीं। परिवादी को 5 मई 2026 को कोर्ट में उपस्थित होने के लिए कहा गया है।
प्रक्रिया से समझौता यानी न्याय से समझौता
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि न्यायिक प्रक्रिया के नियमों का पालन जरूरी है। रिवीजन कोर्ट ने साफ किया कि कानून की बुनियादी समझ और प्रक्रिया का पालन न्यायिक निर्णय की नींव है। इसमें चूक की कोई गुंजाइश नहीं है।
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