केपी यादव बने नान अध्यक्ष, सिंधिया गुट क्यों हुआ बेचैन?

Amresh Kushwaha | Apr 26, 2026, 13:38 IST
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मध्यप्रदेश सरकार ने केपी यादव को मप्र नागरिक आपूर्ति निगम (नान) का अध्यक्ष नियुक्त किया है। केपी यादव वही नेता हैं, जिन्होंने 2019 में ज्योतिरादित्य सिंधिया को गुना से हराया था। अब सिंधिया के करीबी गोविंद सिंह राजपूत के मंत्रालय से जुड़े निगम में केपी की एंट्री नई सियासी रार की वजह बन सकती है।

News In Short

  • मध्यप्रदेश सरकार ने केपी यादव को नान का अध्यक्ष बनाया है।
  • केपी यादव ने 2019 में सिंधिया को गुना में हराया था।
  • नान खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री राजपूत के अधीन आता है।
  • राजपूत को सिंधिया का करीबी माना जाता है।
  • केपी और सिंधिया के बीच भाजपा में आने के बाद से कोल्ड वॉर जारी है।

News In Detail

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने एक ऐसी नियुक्ति की है, जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। गुना से लोकसभा सांसद रह चुके केपी यादव को मप्र नागरिक आपूर्ति निगम यानी नान (MP Nagrik Aapurti Nigam) का अध्यक्ष बना दिया गया है। यह नियुक्ति कागज पर सामान्य दिखती है। वहीं, इसके पीछे की सियासी कहानी बहुत दिलचस्प है। आइए हम आपको याद दिलाते हैं…



2019 की वो हार जो भूली नहीं

साल 2019 का लोकसभा चुनाव। गुना की सीट पर उस वक्त के कांग्रेस के दिग्गज ज्योतिरादित्य सिंधिया मैदान में थे। गुना उनकी पारिवारिक सीट माना जाता था। वहीं, भाजपा के केपी यादव ने उन्हें करारी शिकस्त दे दी। यह सिंधिया के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा झटका था।



उस हार के बाद सिंधिया ने 2020 में कांग्रेस छोड़ दी। वे अपने समर्थक विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। इससे मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बन गए।



एक पार्टी, दो खेमे

सिंधिया के भाजपा में आने के बाद से एक अजीब स्थिति बन गई। जिस नेता को केपी यादव ने हराया था, वह अब उनकी ही पार्टी में था। दोनों एक ही छत के नीचे थे। इसके बावजूद भीतरी तनाव कभी खत्म नहीं हुआ। राजनीतिक जानकार इसे कोल्ड वॉर कहते हैं। केपी यादव संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के करीबी माने जाते हैं। वहीं सिंधिया का अपना अलग धड़ा है।



नान और राजपूत का कनेक्शन

अब समझिए असली पेंच। मध्यप्रदेश में खाद्य, नागरिक एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत हैं। नान उनके ही मंत्रालय के अधीन काम करता है। राजपूत को सिंधिया का बेहद करीबी माना जाता है। वे सिंधिया के साथ ही 2020 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे। यानी जिस मंत्री के मातहत नान आता है, वह सिंधिया गुट का है। और अब उसी निगम की कमान केपी यादव के हाथ में दे दी गई है। यह महज संयोग नहीं लगता।



अमित शाह का वादा और नियुक्ति

बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने केपी यादव को सम्मान का वादा किया था। ग्वालियर में एक सभा के दौरान शाह ने कहा था कि वक्त आने पर पार्टी केपी के त्याग का सम्मान करेगी।



2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गुना से सिंधिया को टिकट दिया। केपी यादव को पार्टी ने उम्मीदवार नहीं बनाया। इससे केपी समर्थकों में नाराजगी थी।



अब नान की यह नियुक्ति उसी वादे को पूरा करने की कोशिश मानी जा रही है।



नान क्या करता है?

नान यानी एमपी नागरिक आपूर्ति निगम एक महत्वपूर्ण सरकारी संस्था है। यह राज्य में अनाज, खाद्यान्न और जरूरी सामान की आपूर्ति का काम देखती है। सरकारी राशन वितरण, गोदाम प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा योजनाएं इसी के दायरे में आती हैं। यानी यह एक बड़े बजट और बड़े प्रभाव वाला निगम है। अब केपी यादव को ऐसी जगह बिठाया गया है जहां काम भी है और ताकत भी।



राजपूत-केपी में टकराव क्यों बढ़ेगा?

यहीं से असली खेल शुरू होता है। राजपूत के मंत्रालय के अधीन काम करने वाले निगम में एक ऐसा अध्यक्ष आ गया है जो सिंधिया गुट का विरोधी माना जाता है। निगम की नीतियों, कर्मचारी नियुक्तियों और बजट पर फैसले लेने में मतभेद स्वाभाविक हैं।



केपी यादव का कार्यकाल दो साल का होगा। इन दो सालों में राजपूत और केपी के बीच कार्यशैली को लेकर कितना समन्वय बन पाता है, यह देखना दिलचस्प होगा।



सियासी संदेश क्या है?

इस नियुक्ति से भाजपा ने एक साथ कई संदेश दिए हैं। पहला, संघ के करीबी नेताओं की अनदेखी नहीं होगी। दूसरा, 2024 में टिकट न मिलने की भरपाई की कोशिश की जा रही है।



तीसरा, सिंधिया गुट को यह भी बता दिया गया है कि पार्टी में सिर्फ उनकी ही नहीं चलती। यह नियुक्ति भले ही प्रशासनिक हो, लेकिन इसका सियासी संदेश बिल्कुल साफ है।



आगे क्या होगा?

नान में केपी यादव की पकड़ मजबूत होने के साथ ही यह देखना होगा कि राजपूत से उनके संबंध किस दिशा में जाते हैं। अगर दोनों में समन्वय नहीं बना तो यह भाजपा के लिए भी मुश्किल बन सकता है। फिलहाल पार्टी के भीतर इस नियुक्ति पर चुप्पी है। लेकिन राजनीति में चुप्पी हमेशा खामोशी नहीं होती।



यह खबर क्यों जरूरी है?

यह खबर सिर्फ एक सरकारी नियुक्ति की खबर नहीं है। यह मध्यप्रदेश की भाजपा के भीतर चल रही गुटबाजी और आंतरिक राजनीति को उजागर करती है। जब एक ही पार्टी के भीतर अलग-अलग धड़े एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो इसका असर सरकारी कामकाज और जनता की सेवाओं पर पड़ता है। नान जैसी संस्था जो करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी है, उसमें सियासी खींचतान जनहित के लिए ठीक नहीं है।



FAQ

  1. केपी यादव को नान का अध्यक्ष क्यों बनाया गया?
    केपी यादव को मप्र नागरिक आपूर्ति निगम (नान) का अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गुना सीट से सिंधिया को टिकट दिया और केपी यादव को दरकिनार कर दिया था। पार्टी के भीतर उनके समर्थकों में नाराजगी थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सम्मान का वादा किया था। इसी वादे को पूरा करने के लिए यह नियुक्ति की गई मानी जा रही है। इसके साथ ही केपी यादव संघ के करीबी हैं, और भाजपा संगठन में उनकी साख मजबूत है।
  2. नान यानी मप्र नागरिक आपूर्ति निगम क्या काम करता है?
    मप्र नागरिक आपूर्ति निगम (नान) मध्यप्रदेश सरकार की एक प्रमुख सरकारी संस्था है। यह राज्य में खाद्यान्न, अनाज और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति का प्रबंधन करती है। सरकारी राशन वितरण प्रणाली, गोदाम प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाएं इसी निगम के दायरे में आती हैं। यह करोड़ों गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की जरूरी आपूर्ति सुनिश्चित करने वाली संस्था है। इसलिए यहां की नियुक्ति और कामकाज सीधे जनता से जुड़ी है।

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