मध्य प्रदेश हाईकोर्ट: अनुच्छेद 21 के तहत बिजली कनेक्शन भी जीवन का अधिकार, सात दिन में देना होगा

Sandeep Kumar | Oct 16, 2026, 18:52 IST
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बिजली कनेक्शन को लेकर अहम फैसला सुनाया है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि बिजली कनेक्शन पाने का हक अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। जस्टिस मिलिंद रमेश फडके की पीठ ने बिजली विभाग को सात दिन में याचिकाकर्ता के मौजूदा घर पर कनेक्शन देने का आदेश दिया। मामला ग्वालियर की एक संपत्ति से जुडा है। अदालत ने विद्युत अधिनियम 2003 ( Electricity Act 2003) की धारा 43 का हवाला दिया।

मां से संपत्ति विवाद कैसे बढा?

अब जरा पीछे चलते हैं। सिविल कार्यवाही (दीवानी अदालत की सुनवाई) के दौरान समझौता हुआ। महिला के मुताबिक उसी समझौते से उसे संपत्ति में सातवां हिस्सा मिला। वह अपने परिवार के साथ उसी हिस्से में रह रही है। बाद में महिला और उसकी मां के बीच विवाद शुरू हो गया। महिला का आरोप है कि मां ने उसके शांतिपूर्ण कब्जे में दखल दिया। उसके मुताबिक मां ने पानी और बिजली की आपूर्ति में भी बाधा डाली।



कनेक्शन कटने के बाद क्या हुआ?

कनेक्शन कटने के बाद महिला ने नए बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन किया। उसने बताया कि बिजली न होने से परिवार मुश्किल में है। कक्षा 9 और 10 में पढने वाले बच्चों की पढाई प्रभावित हो रही है। यानी कनेक्शन सिर्फ सात दिन चल पाया। अब अदालत ने भी सात दिन की मियाद तय की है।



बिजली विभाग ने क्या तर्क दिया?

विभाग का तर्क सीधा था। परिसर पर अधिकार स्थापित हुए बिना बिजली कनेक्शन जारी नहीं होगा। महिला की दलील अलग थी। उसने Electricity Act 2003 की धारा 43 का हवाला दिया। कानून में परिसर के मालिक या कब्जाधारी (वहां रहने वाले) को कनेक्शन मिलता है। समझौते के दस्तावेज और पुराने बिल उसके कब्जे का समर्थन करते हैं। अब सवाल था, क्या विभाग संपत्ति का हक तय कर सकता है?



संपत्ति विवाद पर हाईकोर्ट का रुख

ग्वालियर हाईकोर्ट में बिजली विभाग का यह तर्क नहीं माना गया। पीठ के मुताबिक प्राधिकरण से स्वामित्व या बंटवारे के फैसले की अपेक्षा नहीं है। पक्षकारों के बीच नागरिक विवाद भी कनेक्शन रोकने की वजह नहीं बन सकते। बशर्ते आवेदक परिसर पर कब्जे में हो और कानून के तहत पात्र हो। अदालत ने माना कि विवाद मुख्य रूप से हिस्सेदारी, अधिकार और कब्जे का है।



1910 और 2003 के कानून में फर्क क्या है?

पीठ ने विद्युत अधिनियम 1910 और विद्युत अधिनियम 2003 के प्रावधानों की तुलना की। संसद ने 2003 के कानून में पुराने कानून से अलग शब्दावली अपनाई। अदालत ने महिला को कब्जाधारी माना। वह धारा 43 के तहत कनेक्शन मांग सकती है।



अनुच्छेद 21 और बिजली का रिश्ता

अनुच्छेद 21 संविधान में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हाईकोर्ट ने इसमें बिजली के अधिकार को भी गिना। कारण साफ था। आधुनिक समय में बिजली के बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती।



फैसला किन शर्तों पर टिका है?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश की सीमा भी साफ की। टिप्पणियां सिर्फ बिजली कनेक्शन पाने के अधिकार तक सीमित हैं। जब तक महिला संपत्ति पर कब्जे में रहती है। इससे स्वामित्व या दूसरे नागरिक विवादों का अंतिम फैसला नहीं होता।



सात दिन में कनेक्शन देने का निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली। आदेश की प्रति मिलने के सात दिन के भीतर बिजली कनेक्शन जारी करना होगा। यह निर्देश विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 43 के तहत दिया गया। महिला को बाकी लागू नियम और शर्तें पूरी करनी होंगी।



आम उपभोक्ता के लिए इस फैसले का मतलब

एमपी हाईकोर्ट (MP High Court) ने बिजली को जीवन के अधिकार से जोडा। Electricity connection का आवेदन सिर्फ निजी विवाद से खारिज नहीं होगा। शर्त यह है कि आवेदक कानून के तहत पात्र हो। ऐसे में परिवार के भीतर संपत्ति का झगडा कनेक्शन की राह नहीं रोक सकता। यानी विभाग का काम पात्रता और कब्जा परखना है, स्वामित्व तय करना नहीं।

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