मुंबई के कफ परेड से केरल के वायनाड तक, एमपी की संपत्ति का सरकार के पास नहीं रिकॉर्ड
मध्यप्रदेश सरकार के पास राज्य के बाहर अरबों की संपत्तियों की ठोस जानकारी नहीं है। ये संपत्तियां दिल्ली, मुंबई, नागपुर, झांसी, प्रयागराज, वाराणसी और रामेश्वरम तक फैली हैं। सरकार अब इन संपत्तियों का वैल्युएशन और लीगल स्टेटस जानने के लिए डेटाबेस तैयार करने जा रही है।
इस काम को लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग के अधीन काम करने वाली पीएएमसी (Public Asset Management Company) को सौंपा गया है। चार विभागों के पास प्रदेश के बाहर अचल संपत्तियां हैं। इन चारों में सबसे अधिक संपत्तियां धर्मस्व विभाग और धार्मिक न्यास के पास हैं।
तीन महीनों से पत्राचार के बाद तीन विभागों ने ब्योरा भेज दिया है। लेकिन धर्मस्व विभाग की ओर से अभी तक कोई जानकारी नहीं मिली है।
पीएएमसी का जिम्मा और योजना
पीएएमसी की जिम्मेदारी है कि:
- फिजिकल वेरिफिकेशन कर पता लगाया जाए कि संपत्ति पर कोई कब्जा या अतिक्रमण तो नहीं है।
- जिन संपत्तियों का कानूनी रिकॉर्ड अधूरा है, उनका रिकॉर्ड ढूंढकर वैध बनाया जाए।
- एक ‘एसेट रजिस्टर’ तैयार किया जाएगा, जिसमें यह तय होगा कि किन संपत्तियों का सरकारी उद्देश्य या व्यावसायिक उपयोग किया जा सकता है।
अब तक सामने आई संपत्तियां
1. वित्त विभाग – प्रोविडेंट इन्वेस्टमेंट कंपनी लिमिटेड
मुंबई: एडवर्ड विला, कफ परेड, ससून डॉक का हिस्सा, वर्ली-गोरेगांव में भूखंड।
नई दिल्ली: लुटियंस में फ्लैट और भूखंड।
केरल: वायनाड का 554 एकड़ बीनाची एस्टेट। 453 एकड़ जमीन केरल सरकार ने अधिग्रहित कर ली। 160 परिवारों का कब्जा भी मौजूद।
किराया बकाया: 77 करोड़, कोर्ट में लंबित।
2. मप्र राज्य परिवहन निगम
नागपुर: लगभग 3 एकड़ जमीन, बस डिपो और वर्कशॉप।
झांसी: 1373.80 वर्गमीटर बस डिपो। इलाहाबाद हाईकोर्ट में मप्र और यूपी के बीच विवाद लंबित।
आगरा, पुणे, हैदराबाद: पुराने कार्यालय और कर्मचारी आवास, वर्तमान स्थिति अस्पष्ट।
3. लोक निर्माण विभाग
झांसी: कोठी परान, 19 एकड़ जमीन, अभी यूपी के कब्जे में।
नई दिल्ली: चाणक्यपुरी और बसंत कुंज में मध्यप्रदेश भवन और मध्यांचल भवन। गेस्टहाउस के रूप में उपयोग।
मुंबई: वाशी और चर्चगेट में राज्य गेस्टहाउस और कार्यालय।
4. धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग
वाराणसी, प्रयागराज, मथुरा-वृंदावन, पुष्कर, हरिद्वार, रामेश्वरम, सोमनाथ, गया, अयोध्या: घाटों और पवित्र स्थलों पर धर्मशालाएं, मंदिर और भूखंड।
इनकी मौजूदा स्थिति पर अभी भी आधिकारिक जानकारी नहीं है।
विवादों को सुलझाना है सबसे बड़ी चुनौती
सरकारी फाइलों में कई जमीनों के बहुत पुराने रिकॉर्ड तो मिल रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत में वे प्लॉट कहां हैं किसी को नहीं पता। इसलिए सरकार अब इन सभी जगहों पर फिजिकल वेरिफिकेशन करवाने वाली है। इससे साफ हो सकेगा कि सरकारी जमीन पर कोई अवैध कब्जा तो नहीं है। कई संपत्तियों के मालिकाना हक के कानूनी दस्तावेज भी गायब हो चुके हैं।
अफसर अब पुराने दफ्तरों से रिकॉर्ड खोजकर कानूनी मान्यता हासिल करने में जुटे हैं। इसके साथ ही सरकार एक नया और डिजिटल 'एसेट रजिस्टर' तैयार कर रही है। इस रजिस्टर से तय होगा कि किस जमीन का उपयोग किस काम में होगा। सरकार इन संपत्तियों पर नए विश्राम गृह या व्यावसायिक परिसर बना सकती है।
निष्कर्ष
मध्यप्रदेश सरकार के पास अरबों की संपत्तियों का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है। अब पीएएमसी द्वारा तैयार डेटाबेस और एसेट रजिस्टर से राज्य को इन संपत्तियों का कानूनी और व्यावसायिक उपयोग तय करने में मदद मिलेगी।
FAQ
- मप्र सरकार बाहरी संपत्तियों का डेटाबेस क्यों बना रही है?
मप्र सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि राज्य की संपत्तियों का सही वैल्युएशन और कानूनी स्थिति पता हो। इससे व्यावसायिक और सरकारी उपयोग तय किया जा सकेगा। - धर्मस्व विभाग की संपत्तियों की स्थिति क्यों अस्पष्ट है?
धर्मस्व विभाग ने अभी तक पीएएमसी को अपने संपत्ति-ब्योरे की जानकारी नहीं दी है। इसलिए इनकी सटीक स्थिति स्पष्ट नहीं है। - पीएएमसी का मुख्य काम क्या होगा?
पीएएमसी संपत्तियों का फिजिकल वेरिफिकेशन, कानूनी रिकॉर्ड की पुष्टि और एसेट रजिस्टर तैयार करने का काम करेगी।
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