14 साल की कानूनी लड़ाई के बाद माखन सिंह को मिली पुलिस की नौकरी, HC से मिली जीत
समझें क्या है पूरा मामला...
- माखन सिंह करचो का साल 2012 में मध्यप्रदेश पुलिस में चयन हुआ था।
- उन्हें सूबेदार स्टेनोग्राफर पद के लिए चुना गया था।
- चरित्र जांच में पुराने धारा 307 मामले की जानकारी सामने आई।
- उस मामले में वे संदेह का लाभ लेकर दोषमुक्त हो चुके थे।
- लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2026 में उन्हें नियुक्ति मिली।
- 14 साल पहले शुरू हुई थी नौकरी की कहानी
माखन सिंह करचो के लिए साल 2012 उम्मीद लेकर आया था। उन्होंने मेहनत के बाद मध्यप्रदेश पुलिस में जगह बनाई थी। उनका चयन सूबेदार स्टेनोग्राफर पद के लिए हुआ था।
परिवार के लिए यह बड़ी खुशी का मौका था। लेकिन नियुक्ति से पहले चरित्र जांच में मामला सामने आया। इसी जानकारी के बाद उनकी नियुक्ति रोक दी गई।
पुराने आपराधिक मामले ने रोक दी नियुक्ति
चरित्र जांच के दौरान माखन सिंह के पुराने मामले की जानकारी मिली। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 307 से जुड़ा था। यह धारा हत्या के प्रयास से जुड़े मामलों में लगती थी।
इस मामले की सुनवाई सत्र अदालत में हुई थी। अदालत ने माखन सिंह को संदेह का लाभ दिया था। इसके बाद उन्हें उस मामले में दोषमुक्त कर दिया गया था। इसके बावजूद पुलिस में उनकी नियुक्ति आगे नहीं बढ़ सकी।
माखन सिंह ने नहीं छिपाई थी मामले की जानकारी
इस मामले में माखन सिंह की ओर से एक अहम बात सामने रखी गई। उनका कहना था कि उन्होंने चरित्र जांच में पूरी जानकारी दी थी। उन्होंने पुराने मामले का उल्लेख अपने फॉर्म में किया था। उन्होंने अपनी दोषमुक्ति की जानकारी भी दी थी।
यानी उनके अनुसार उन्होंने कोई तथ्य छिपाया नहीं था। इसके बाद भी उनकी उम्मीदवारी स्वीकार नहीं की गई। यही फैसला उनके 14 साल लंबे संघर्ष की वजह बना।
2012 से 2026 तक चलता रहा कानूनी संघर्ष
नौकरी रुकने के बाद माखन सिंह ने अदालत का रास्ता चुना। उन्होंने अपने अधिकार के लिए लगातार कानूनी लड़ाई लड़ी। यह संघर्ष करीब 14 साल तक चलता रहा।
इस दौरान मामला जबलपुर हाईकोर्ट तक पहुंचा। उनकी ओर से अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय ने पैरवी की। मामले में सार्वजनिक नौकरी और पुराने आपराधिक मामलों से जुड़े फैसले रखे गए। तर्क दिया गया कि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं।
2025 को हाईकोर्ट से मिली पहली बड़ी राहत
मामले में रिट याचिका क्रमांक 3345/2018 दायर की गई थी। 14 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने फैसला सुनाया। अदालत ने नियुक्ति रोकने वाले फैसले को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने माखन सिंह को पुलिस में नियुक्त करने का निर्देश दिया। उन्हें सूबेदार स्टेनोग्राफर पद पर नियुक्त करने को कहा गया। अदालत ने काल्पनिक वरिष्ठता देने का निर्देश भी दिया। इस फैसले से माखन सिंह के लिए नौकरी का रास्ता खुल गया।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को दी चुनौती
एकलपीठ के फैसले के बाद राज्य सरकार ने अपील की। यह अपील रिट अपील क्रमांक 1446/2026 के रूप में दाखिल हुई। मामला हाईकोर्ट की खंडपीठ के सामने पहुंचा।
राज्य सरकार ने एकलपीठ के फैसले को चुनौती दी। इस मामले पर 24 जून 2026 को फैसला आया। खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। इससे एकलपीठ का फैसला बरकरार रहा।
आदेश के बाद भी नियुक्ति नहीं हुई तो पहुंची अवमानना
राज्य की अपील खारिज होने के बाद भी मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं होने पर अवमानना कार्रवाई शुरू हुई। माखन सिंह की ओर से अवमानना याचिका दायर की गई। इसमें अदालत के आदेश का पालन कराने की मांग की गई।
अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय ने इस कार्रवाई में भी पैरवी की। अदालत की कार्रवाई के बाद संबंधित अधिकारियों पर आदेश लागू करने का दबाव बढ़ा। इसके बाद नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
2026 में आखिरकार खत्म हुआ 14 साल का इंतजार
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद माखन सिंह को नियुक्ति मिल गई। उन्हें मध्यप्रदेश पुलिस में सूबेदार स्टेनोग्राफर पद पर नियुक्त किया गया। साल 2012 में शुरू हुआ इंतजार साल 2026 में खत्म हुआ।
इस दौरान मामला एक रिट याचिका से आगे बढ़ा। इसके बाद राज्य सरकार ने रिट अपील दाखिल की। फिर आदेश लागू कराने के लिए अवमानना कार्रवाई हुई। इन सभी पड़ावों के बाद माखन सिंह को नौकरी मिल सकी।
अधिवक्ता ने इसे अधिकार और न्याय की जीत बताया
अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय ने इस मामले को बड़ी जीत बताया। उनके अनुसार यह मामला केवल नौकरी पाने तक सीमित नहीं था। यह सम्मान और अधिकार से भी जुड़ा था।
अधिवक्ता का कहना था कि पुराने मामले को अकेले आधार नहीं बनाया जा सकता। हर मामले की परिस्थितियों को अलग तरीके से देखना जरूरी है। इसी आधार पर अदालत के सामने माखन सिंह का पक्ष रखा गया।
माखन सिंह की कहानी क्यों है खास
माखन सिंह की कहानी एक लंबे इंतजार की कहानी है। 2012 में चयन के बाद उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी। इसके बाद उन्होंने अदालत में अपने अधिकार की लड़ाई लड़ी।
करीब 14 साल बाद उन्हें अपने पक्ष में परिणाम मिला। एकलपीठ ने नियुक्ति का रास्ता खोला। राज्य की अपील भी खारिज हुई। फिर अवमानना कार्रवाई के बाद आदेश लागू हुआ। आखिरकार 2026 में माखन सिंह को पुलिस की नौकरी मिल गई।
इस मामले का सबसे बड़ा संदेश क्या है
यह मामला चरित्र जांच और पुराने आपराधिक मामलों के सवाल से जुड़ा है। इसमें अदालत के सामने माखन सिंह के मामले के तथ्य रखे गए। उनके अनुसार उन्होंने मामला छिपाया नहीं था। वह मामले में दोषमुक्त भी हो चुके थे। इसके बावजूद नियुक्ति रोकने का फैसला हुआ था।
हाईकोर्ट की कार्रवाई के बाद उन्हें राहत मिली। हालांकि हर नौकरी और आपराधिक मामले का फैसला अलग हो सकता है। किसी एक फैसले को सभी मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता।
14 साल बाद मिली नौकरी ने खत्म किया लंबा संघर्ष
माखन सिंह के लिए 2026 सिर्फ नियुक्ति का साल नहीं रहा। यह उनके लंबे कानूनी संघर्ष के खत्म होने का साल बना। 14 साल तक चली लड़ाई में कई मोड़ आए। पहले नियुक्ति रोकी गई और फिर मामला अदालत पहुंचा।
एकलपीठ से राहत मिली तो राज्य ने अपील की। खंडपीठ ने भी राज्य की अपील खारिज कर दी। इसके बाद अवमानना कार्रवाई हुई। आखिरकार अदालत के आदेश के बाद माखन सिंह को नौकरी मिली।
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