मंडला में दूषित पानी: कलेक्टर साहब! क्या आप इस पानी का एक घूंट भी पी सकते हैं, जवाब दीजिए...
कलेक्टर साहब, क्या आप यह पानी पी सकते हैं? आज मैं आपको मंडला जिले का वो गंदा सच दिखा रहा हूं, जिसे प्रशासन देखकर भी अनदेखा कर रहा है। यह किसी नाली का पानी नहीं, हमारे पीने का पानी है। यह मजमून युवा शिवा परस्ते के एक वीडियो का है, जिसे अब तक प्रदेश और देश के 20 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं।
शिवा मंडला जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर पेयजल की हकीकत दिखाई है। शिवा ने कहा कि हमने कई बार पंचायत में आवेदन दिया। जनसुनवाई के चक्कर काटे, लेकिन मंडला प्रशासन की नींद नहीं खुल रही है। क्या हमारे बच्चों को जहर पिलाना ही विकास है? मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मंडला कलेक्टर हमें कागजी आश्वासन नहीं, पीने के लिए साफ पानी चाहिए।
देखते ही देखते शिवा का यह वीडियो वायरल हो गया। 20 लाख (2 मिलियन) से ज्यादा लोग इसे देख चुके हैं। शिवा ने फिर थैंक्यू वीडियो बनाकर कहा कि सिर्फ 12 घंटे में आप लोगों ने धनगांव (माणिकपुर) की इस गंभीर समस्या को देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया। यह जीत मेरी नहीं, उन हजारों ग्रामीणों की है, जो सालों से गंदा पानी पीने को मजबूर थे। शुक्रिया उन लाखों लोगों का, जिन्होंने इस आवाज को अपना समझा। अब मंडला प्रशासन की बारी है। दो मिलियन लोग जवाब का इंतजार कर रहे हैं।
क्या है इस वीडियो में
शिवा ने एक पोखर से एक कटोरी में पानी भरा और फिर पी लिया। उसने कहा, कलेक्टर साहब... हैरान न हों, यह नाली का कचरा नहीं, हमारे रोज के पीने का पानी है, जिसे हम जान जोखिम में डालकर पीते हैं। शिवा ने कहा, जल ही जीवन होता है, लेकिन हमारे लिए यह जल धीमा जहर बनता जा रहा है।
हमने कई बार शिकायत की, लेकिन हमारे कागज तो फाइलों में दब गए। डिजिटल इंडिया का सपना देखने वाले हम लोग आज एक ग्लास साफ पानी पीने के लिए तरस रहे हैं। क्या हमारे बच्चों की सेहत की कोई कीमत नहीं है। कब तक हम आवेदन करते रहेंगे और कब तक प्रशासन सोता रहेगा।
इस मामले में द सूत्र ने मंडला कलेक्टर आईएएस राहुल नामदेव धोटे से उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क किया, लेकिन बात नहीं हो सकी। उन्हें वॉट्सऐप पर मैसेज भी किया है, जैसे ही उनका पक्ष आएगा, हम उसे भी अपनी खबर में शामिल करेंगे। हालांकि यह भी उल्लेखनीय है कि राहुल नामदेव धोटे एक महीने पहले ही मंडला कलेक्टर पदस्थ हुए हैं। इससे पहले सोमेश मिश्रा मंडला कलेक्टर थे।
प्रदेश के कई जिले प्रभावित
सच यह है कि यह कहानी सिर्फ मंडला की नहीं है। यह मध्यप्रदेश के उस जल संकट की तस्वीर है, जिसे योजनाओं और घोषणाओं के नीचे दबा दिया गया है। जल जीवन मिशन फंक्शनैलिटी असेसमेंट रिपोर्ट ने खुद प्रदेश की स्थिति उजागर की है।
रिपोर्ट में केंद्र सरकार ने चेतावनी दी थी कि यदि हालात नहीं सुधरे तो फंड में कटौती तक की जा सकती है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भी साफ माना है कि मध्यप्रदेश की जल आपूर्ति व्यवस्था गंभीर संकट में है। यह संकट केवल तकनीकी नहीं, बल्कि लापरवाही और खराब रखरखाव का नतीजा है।
नाइट्रेट की मात्रा बेहद ज्यादा
स्थिति कितनी भयावह है, इसका अंदाजा केंद्र सरकार की उस स्टडी से लगाया जा सकता है, जिसमें खुलासा हुआ कि मध्यप्रदेश के 55 जिलों में से 39 जिलों के भूजल में नाइट्रेट तय मानक से ज्यादा पाया गया है। इस लिस्ट में इंदौर भी शामिल है, जहां पिछले महीनों में गंदे पानी की वजह से 32 लोगों की मौत हुई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्राउंड वाटर में नाइट्रेट की अधिकता के मामले में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के बाद देश में दूसरे नंबर पर है। अगस्त 2025 में साझा की गई यह रिपोर्ट वार्षिक ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट 2024 पर आधारित है, जिसमें राज्यवार भूजल में मौजूद प्रदूषकों का विश्लेषण किया गया।
रिपोर्ट साफ कहती है कि जिन इलाकों में पानी में नाइट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा है, वहां लोगों के शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम होने लगता है। इसका सबसे खतरनाक असर नवजात और छोटे बच्चों पर पड़ता है। उनकी जान तक खतरे में पड़ सकती है।
39 जिलों में ये नाम शामिल
रिपोर्ट के मुताबिक जिन 39 जिलों में नाइट्रेट का स्तर खतरनाक पाया गया, उनमें इंदौर, आगर मालवा, अनूपपुर, बालाघाट, बड़वानी, भिंड, बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, दमोह, दतिया, देवास, धार, गुना, ग्वालियर, हरदा, जबलपुर, झाबुआ, कटनी, खंडवा, खरगोन, मंडला, मंदसौर, मुरैना, नरसिंहपुर, नीमच, पन्ना, राजगढ़, रतलाम, रीवा, सागर, सतना, शहडोल, शाजापुर, श्योपुर, शिवपुरी, सीधी, टीकमगढ़, उज्जैन और उमरिया शामिल हैं।
खेती को भी इससे खतरा
रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया कि कई इलाकों में खराब सीवेज निपटान व्यवस्था और सेप्टिक टैंकों से होने वाला रिसाव जमीन में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ा रहा है। तेजी से बढ़ता शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन भी भूजल के पुनर्भरण को कम कर रहा है। जब जमीन में पर्याप्त पानी वापस नहीं पहुंचता, तब नाइट्रेट की सांद्रता और ज्यादा खतरनाक हो जाती है।
खेती भी इस संकट की बड़ी वजह बनती जा रही है। स्टडी के अनुसार धान और गेहूं जैसी फसलों में वर्षों से रासायनिक उर्वरकों का भारी उपयोग किया जा रहा है। यही रसायन धीरे-धीरे जमीन के रास्ते भूजल में पहुंचते हैं और नाइट्रेट का स्तर बढ़ाते जाते हैं। वर्षों से जारी यह प्रक्रिया अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है।
हर उम्र के लोगों को नुकसान
विशेषज्ञों के अनुसार पीने के पानी में नाइट्रेट की सुरक्षित सीमा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर मानी जाती है। इससे ज्यादा मात्रा शरीर के लिए गंभीर खतरा बन जाती है। नाइट्रेट शरीर में पहुंचकर नाइट्राइट में बदल जाता है, जो खून में मौजूद हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम कर देता है। इसके कारण शरीर के अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती।
नवजात और छोटे बच्चों में ज्यादा नाइट्रेट ब्लू बेबी सिंड्रोम का कारण बन सकता है। इसमें बच्चे की त्वचा नीली पड़ने लगती है, सांस लेने में परेशानी होती है और समय पर इलाज न मिले तो जान भी जा सकती है।
बड़ों में इसके असर लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर, सिरदर्द, सांस फूलना और दिल-दिमाग तक ऑक्सीजन की कमी के रूप में दिखाई देते हैं। लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से पाचन तंत्र भी प्रभावित हो सकता है। इतना ही नहीं, ज्यादा नाइट्रेट वाला पानी गर्भ में पल रहे बच्चे तक ऑक्सीजन की सप्लाई प्रभावित कर सकता है, जिससे समय से पहले प्रसव और कम वजन वाले बच्चे के जन्म का खतरा बढ़ जाता है।
दो लाख लोगों की मौत दूषित पानी से
देशभर के आंकड़ों का हवाला देते हुए एनजीटी ने हाल ही में कहा था कि हर साल करीब दो लाख लोगों की मौत दूषित पानी से जुड़ी बीमारियों के कारण होती है। करोड़ों लोग हर साल जलजनित रोगों की चपेट में आते हैं। वर्ष 2005 से 2022 के बीच 20 करोड़ से अधिक जलजनित रोगों के मामले दर्ज किए गए।
एनजीटी ने यह भी स्पष्ट कहा कि दूषित पेयजल की आपूर्ति जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले स्वच्छ जल और जीवन के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
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