मोहन सरकार का आधा सफर पूरा, मोदी-शाह के दांव ने बदल दिए सत्ता, संगठन, सियासत के समीकरण

Pawan Modiya | Jun 13, 2026, 08:00 IST
13 जून 2026 को मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार का आधा सफर पूरा हो रहा है
13 जून 2026 को मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार का आधा सफर पूरा हो रहा है। द सूत्र की इस एक रिपोर्ट में पढ़िए वो सब कुछ... जो आपके लिए जानना जरूरी है।

11 दिसंबर 2023... भोपाल का वह सर्द दिन, जिसने मध्य प्रदेश की राजनीति का एक नया अध्याय लिखा था। भाजपा के नवनिर्वाचित विधायक दल का ग्रुप फोटो खींचा जा रहा था। तस्वीर में पहली और दूसरी पंक्ति में पार्टी के बड़े चेहरे मौजूद थे... शिवराज सिंह चौहान, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद सिंह पटेल, नरेंद्र सिंह तोमर, गोपाल भार्गव। वहीं, तीसरी कतार में एक चेहरा शांत भाव से बैठा था और वे थे डॉ. मोहन यादव।


घड़ी की सुइयां दोपहर के 3 बजकर 30 मिनट का समय बता रही थीं। सर्द हवाएं चल रही थीं, पर वहां मौजूद किसी व्यक्ति को यह अंदाजा नहीं था कि अगले 45 मिनट में मध्यप्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदलने वाली हैं।



फोटो सेशन खत्म हुआ। इसके बाद विधायक दल की बैठक शुरू हुई। केंद्रीय पर्यवेक्षक मनोहर लाल खट्टर मंच पर मौजूद थे। बैठक के दौरान एक पर्ची शिवराज सिंह चौहान तक पहुंची। उन्होंने पर्ची देखी और विधायक दल के नेता के नाम की घोषणा करने के लिए खड़े हुए।


उन्होंने डॉ. मोहन यादव का नाम पुकारा। कहा जाता है कि पहली बार में मोहन यादव स्वयं भी अपना नाम नहीं सुन पाए। जब दूसरी बार उनका नाम दोहराया गया, तब वे सीट से उठे और मंच की ओर बढ़े। कुछ ही क्षणों बाद यह साफ हो चुका था कि मध्यप्रदेश को नया मुख्यमंत्री मिल गया है।


भाजपा विधायक दल ने डॉ.मोहन यादव को अपना नेता चुन लिया था। इसके साथ ही बीजेपी ने नई राजनीतिक परंपरा को जन्म दिया। ऐसी परंपरा, जिसमें आखिरी क्षण तक नाम गोपनीय रखा जाता है और सत्ता का शीर्ष पद किसी भी कार्यकर्ता तक पहुंच सकता है।



दो दिन बाद, 13 दिसंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अब 13 जून 2026 को उनकी सरकार अपने पांच वर्षीय कार्यकाल का आधा सफर पूरा कर रही है। ऐसे में यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रयोग का पड़ाव है, जिसने मध्यप्रदेश में सत्ता के समीकरण बदल दिए।



मोदी-शाह की रणनीति और मोहन यादव का उदय

विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था। नतीजों के बाद यह चर्चा जरूर थी कि पार्टी कुछ नया कर सकती है, पर यह अनुमान बहुत कम लोगों ने लगाया था कि नया चेहरा डॉ. मोहन यादव होंगे। राजनीतिक गलियारों में कई नाम चल रहे थे। अनुभवी नेताओं से लेकर केंद्रीय मंत्रियों तक की चर्चा थी। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतिक जोड़ी ने ऐसा फैसला लिया, जिसने सभी राजनीतिक आकलनों को पीछे छोड़ दिया।


शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। इसके बाद डॉ. मोहन यादव ने राज्यपाल मंगूभाई पटेल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया और 13 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। आज, 13 जून 2026 को ढाई वर्ष बाद उनका कार्यकाल अपने मध्य बिंदु पर पहुंच गया है।



दो दशक से ओबीसी नेतृत्व के हाथों में सत्ता की कमान

डॉ. मोहन यादव का मुख्यमंत्री बनना सामाजिक समीकरणों से जुड़ा एक बड़ा संदेश भी है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2003 से लगातार ओबीसी नेतृत्व सत्ता के केंद्र में रहा है। उमा भारती से शुरू हुआ यह सिलसिला बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान तक पहुंचा। अब यह जिम्मेदारी डॉ. मोहन यादव के कंधों पर है। इसके पीछे प्रदेश की सामाजिक संरचना सबसे बड़ी वजह है।


मध्यप्रदेश, देश का पहला ऐसा राज्य है, जहां ओबीसी आबादी 50.09 प्रतिशत है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कुल वोटर्स में करीब 48 प्रतिशत वोटर ओबीसी वर्ग से आते हैं। प्रदेश के 20 जिलों में ओबीसी वोटर्स की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि इनमें से करीब आधे जिले ऐसे हैं, जहां यह आंकड़ा 70 से 80 प्रतिशत तक पहुंचता है। यही कारण है कि मोहन सरकार की सामाजिक इंजीनियरिंग में भी ओबीसी वर्ग को प्रमुख स्थान दिया गया है। मुख्यमंत्री सहित मंत्रिमंडल के 41 प्रतिशत मंत्री यानी 13 सदस्य ओबीसी वर्ग से आते हैं।



अहम सवाल, जो मोहन की ताजपोशी को समझाते हैं...

1. क्या मोहन यादव का नाम चौंकाने वाला था?



निश्चित रूप से। चुनाव से करीब 11 महीने पहले जब शिवराज सिंह चौहान को लेकर अटकलें चल रही थीं, तब संभावित चेहरों में मोहन यादव का नाम प्रमुखता से लिया जाता था। हालांकि चुनाव में कई दिग्गज नेताओं की सक्रिय एंट्री के बाद उनका नाम चर्चा से करीब करीब गायब हो गया था। इसलिए अंतिम फैसले ने सभी को चौंकाया।



2. क्या यह प्रधानमंत्री मोदी की रणनीतिक सोच का हिस्सा था?



राजनीतिक विश्लेषक इसे मोदी-शाह की उस शैली का हिस्सा मानते हैं, जिसमें अप्रत्याशित लेकिन दूरगामी असर वाले फैसले लिए जाते हैं। 2014 के बाद भाजपा ने कई राज्यों में सत्ता बरकरार रखते हुए नए चेहरों को आगे बढ़ाया है। मोहन यादव का चयन भी इसी संदेश को मजबूत करता है कि संगठन का कार्यकर्ता भी सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है।



3. ओबीसी वर्ग को साधने की रणनीति कितनी अहम थी?



डॉ.मोहन यादव का चयन ओबीसी राजनीति के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना गया। इससे मध्यप्रदेश के ओबीसी मतदाताओं को स्पष्ट संदेश दिया गया। साथ ही उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के यादव समाज तक भी एक राजनीतिक संकेत पहुंचा, जहां परंपरागत रूप से विपक्षी दलों का प्रभाव रहा है।



4. संघ की भूमिका कितनी प्रभावशाली रही?



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राय इस निर्णय में महत्वपूर्ण रही। डॉ.मोहन यादव संघ की विचारधारा से आते हैं। संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुरेश सोनी से उनकी निकटता भी चर्चा का विषय रही है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे उमा भारती के बाद संघ की सिफारिश पर लिए गए सबसे बड़े निर्णयों में गिनते हैं।



छात्र राजनीति से मुख्यमंत्री कार्यालय तक

डॉ. मोहन यादव का राजनीतिक सफर अचानक शुरू नहीं हुआ था। इसके पीछे चार दशक से अधिक की संगठनात्मक और राजनीतिक यात्रा है। 1982 में वे माधव विज्ञान कॉलेज छात्रसंघ के सह-सचिव बने। 1984 में छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में लगातार जिम्मेदारियां संभालते रहे। 1986 में विभाग प्रमुख बने, 1988 में प्रदेश सहमंत्री और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य बने।



1989-90 में परिषद के प्रदेश मंत्री और 1991-92 में राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी मिली। 1993 से 1995 के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उज्जैन नगर के सह खंड कार्यवाह और नगर कार्यवाह रहे। 1996 में खंड कार्यवाह तथा बाद में नगर कार्यवाह बने। 1997 में भारतीय जनता युवा मोर्चा की प्रदेश कार्यसमिति में शामिल हुए। इसके बाद उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बने और छह वर्षों तक राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त पद पर काम किया। 2013 में पहली बार विधायक बने। 2018 में दूसरी बार विधानसभा पहुंचे और शिवराज सिंह चौहान सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।



शिक्षा बनी पहचान, राजनीति बनी मंजिल

राजनीतिक विश्लेषकों के लिए डॉ. मोहन यादव का मुख्यमंत्री बनना जितना अप्रत्याशित था, उतना ही उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि प्रभावशाली मानी जाती है। उन्होंने B.Sc, LLB, MA, MBA और PhD तक की शिक्षा हासिल की है। उज्जैन के माधव कॉलेज के छात्रसंघ में सह-सचिव के रूप में शुरू हुआ उनका सफर चार दशक बाद मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा। 1982 से 2023 के बीच की यह यात्रा बताती है कि संगठन, शिक्षा, राजनीतिक धैर्य और निरंतर सक्रियता किस तरह एक कार्यकर्ता को सत्ता के सर्वोच्च पद तक पहुंचा सकती है।



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