एमपी में 14 महीने में 149 तेंदुओं की मौत, RTI में चौंकाने वाला खुलासा
मध्य प्रदेश में टाइगर स्टेट का गौरव अब वन्यजीवों की बढ़ती मौतों के कारण संकट में नजर आ रहा है। साल 2025 में रिकॉर्ड 54-56 बाघों की जान गई, वहीं 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही यह आंकड़ा 18 के पार पहुंच चुका है।
आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक,चिंताजनक स्थिति सिर्फ बाघों तक सीमित नहीं है। पिछले 14 महीनों में 149 तेंदुओं ने भी दम तोड़ा है, जिनमें 31 फीसदी मौतें सड़क हादसों का परिणाम हैं।
अवैध शिकार, करंट और आपसी संघर्ष के बीच सिमटता वन्यजीवन प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। वन्यजीव एक्टिविस्ट अजय दुबे ने इसे गंभीर बताया है जबकि वन विभाग का कहना है कि मृत्यु दर स्वीकार्य सीमा के भीतर है।
देश में सबसे ज्यादा तेंदुए MP में
फरवरी 2024 में जारी भारत में तेंदुओं की स्थिति 2022 रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में देश में तेंदुओं की सबसे बड़ी आबादी है जो 3 हजार 907 है। इसके बाद महाराष्ट्र और कर्नाटक का नंबर आता है। साल 2018 में यह संख्या 3 हजार 421 थी यानी आबादी बढ़ी है, लेकिन मौतों का आंकड़ा भी बढ़ रहा है।
सड़क हादसे सबसे बड़ा कारण
RTI जवाब के आंकड़े बताते हैं कि 149 मौतों में से 31 फीसदी यानी सबसे ज्यादा मौतें सड़क दुर्घटनाओं (सड़क हादसों में मौत) में हुईं। इनमें से 19 तेंदुओं की जान सीधे हाईवे पर गई। बाकी मौतों के कारणों पर नजर डालें तो 24 फीसदी मौतें बुढ़ापे और बीमारी से हुईं।
21 फीसदी आपसी संघर्ष में मारे गए, 14 फीसदी शिकार या बदले की घटनाओं का शिकार बने। आठ तेंदुओं की मौत बिजली करंट से हुई और दो फंदों में फंसकर मरे। करीब नौ फीसदी मामलों में मौत की वजह अज्ञात रही।
वन विभाग क्या कह रहा है
वन विभाग के अतिरिक्त प्रधान मुख्य संरक्षक (वन्यजीव) एल. कृष्णमूर्ति ने कहा कि मृत्यु दर कम करने के लिए एक तय रोडमैप पर काम हो रहा है। उन्होंने बताया कि तेंदुए आकार में छोटे होते हैं और आसानी से नजर नहीं आते। वे पूरे राज्य में फैले हैं और इंसानी बस्तियों के काफी करीब पाए जाते हैं।
मौतें कम करने के लिए नई सड़कों पर जानवरों के लिए सुरक्षित रास्ते, चेतावनी के संकेत और नियमित गश्त जैसे उपाय लागू किए जा रहे हैं। विभाग ने सड़कों के पास पानी के स्रोत न बनाने की भी सलाह दी है क्योंकि जानवर पानी की तलाश में सड़कों तक आ जाते हैं।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 4 हजार तेंदुओं में से 149 यानी 4 फीसदी की मौत स्वीकार्य है। कैट फैमिली में सालाना 10 से 20 फीसदी तक का नुकसान सामान्य माना जाता है।
टाइगर रिजर्व के अनुसार बाघों की मृत्यु (2012 - 2025)
| टाइगर रिजर्व का नाम | कुल मौतों की संख्या |
| बांधवगढ़ | 101 |
| कान्हा | 79 |
| पेंच | 39 |
| पन्ना | 19 |
| संजय दुबरी | 14 |
| सतपुड़ा | 11 |
| रातापानी | 01 |
पिछले पांच सालों में बाघों की मृत्यु का विवरण
| साल | बाघों की मृत्यु की संख्या |
| 2021 | 34 |
| 2022 | 43 |
| 2023 | 45 |
| 2024 | 46 |
| 2025 | 55 |
| कुल (5 साल) | 223 |
एक्टिविस्ट का गंभीर आरोप
RTI अर्जी दाखिल करने वाले एक्टिविस्ट अजय दुबे ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि टाइगर स्टेट एमपी तेंदुओं के लिए कब्रिस्तान बन गया है। NTCA नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी के प्रोटोकॉल लागू करने में सिस्टम नाकाम रहा है। सुरक्षित रास्तों की कमी तेंदुओं को खत्म कर रही है।
दुबे ने यह भी कहा कि सड़क और बिजली से होने वाली मौतों के लिए कोई जवाबदेही नहीं है। NTCA और वन विभाग की लापरवाही यह साबित करती है कि तेंदुए (Leopard) उनके लिए दूसरी प्राथमिकता हैं।
FAQ
- मध्य प्रदेश में कितने तेंदुओं की मौत हुई और सबसे बड़ी वजह क्या रही?
RTI से मिली जानकारी के अनुसार जनवरी 2025 से 14 महीनों में मध्य प्रदेश में 149 तेंदुओं की मौत हुई। सबसे बड़ी वजह सड़क हादसे रहे जिनमें 31 फीसदी यानी 19 से अधिक तेंदुओं की जान गई। इसके बाद बुढ़ापे और बीमारी से 24 फीसदी, आपसी संघर्ष में 21 फीसदी और शिकार या बदले की घटनाओं में 14 फीसदी तेंदुओं की मौत हुई। - वन विभाग ने मध्य प्रदेश में तेंदुओं की मौत पर क्या कहा?
वन विभाग के अतिरिक्त प्रधान मुख्य संरक्षक एल. कृष्णमूर्ति ने कहा कि मृत्यु दर कम करने के लिए रोडमैप पर काम हो रहा है। सड़कों पर जानवरों के लिए सुरक्षित रास्ते, चेतावनी संकेत और नियमित गश्त जैसे उपाय लागू किए जा रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 4000 तेंदुओं में से 4 फीसदी की मौत स्वीकार्य सीमा में है क्योंकि कैट फैमिली में 10 से 20 फीसदी का वार्षिक नुकसान सामान्य माना जाता है।
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