मध्यप्रदेश में फरार आरोपी की जेब तक पहुंचेगी पुलिस, पर क्या संपत्ति तलाशने का सिस्टम तैयार?
फरार आरोपियों की जानकारी जुटाने की तैयारी
गिरफ्तारी वारंट निकला, आरोपी नहीं मिला तो अब एमपी पुलिस केवल उसके घर और संभावित ठिकानों पर दबिश देकर नहीं रुकेगी। मध्यप्रदेश में फरार आरोपियों की बैंकिंग से लेकर जमीन-मकान, वाहन और दूसरी वित्तीय संपत्तियों तक की जानकारी जुटाने की तैयारी है। बड़ा सवाल यह है कि अलग-अलग विभागों में बिखरे रिकॉर्ड को जोड़कर पुलिस कितनी जल्दी अदालत तक पहुंचा पाएगी?
आरोपी नहीं मिला तो आर्थिक लोकेशन खोजेगी पुलिस
फरार आरोपियों को पकड़ने की रणनीति में आर्थिक दबाव को ज्यादा व्यवस्थित तरीके से इस्तेमाल करने की तैयारी है। पुलिस मुख्यालय (मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय) के निर्देश के मुताबिक जिलों में ऐसे आरोपियों का रिकॉर्ड तैयार किया जाना है, जिनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद वे पुलिस की पकड़ से बाहर हैं।
इस कवायद का महत्वपूर्ण हिस्सा आरोपी की चल-अचल संपत्ति की पहचान है। यानी पुलिस को यह पता करना होगा कि उसके नाम पर जमीन कहां है, मकान कितने हैं, कौन से वाहन दर्ज हैं। साथ ही उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया के तहत कौन-कौन सी वित्तीय संपत्ति की जानकारी जुटाई जा सकती है।
आदेश बड़ा, असली परीक्षा डेटा जुटाने की
दूसरी ओर इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी भी सामने आती है। आरोपी की पूरी आर्थिक जानकारी पुलिस को एक ही सरकारी पोर्टल पर नहीं मिलेगी। जमीन की जानकारी के लिए राजस्व रिकॉर्ड देखना होगा। संपत्ति के लिए स्थानीय निकाय और उप-पंजीयक कार्यालय से जानकारी लेनी होगी।
साथ ही वाहनों के लिए परिवहन विभाग से संपर्क करना पड़ेगा। वहीं, बैंक और दूसरी वित्तीय जानकारी के लिए संबंधित संस्थाओं से तालमेल करना होगा। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पुलिस आरोपी की संपत्ति खोज पाएगी या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या 55 जिलों में यह काम एक जैसी तेजी और गुणवत्ता से हो पाएगा?
बैंक से जमीन तक खुलेगी फाइल
आर्थिक जांच में बैंक खातों और उपलब्ध वित्तीय रिकॉर्ड की जानकारी अहम होगी। पैन और दूसरे पहचान दस्तावेजों के जरिए कानूनी तरीके से वित्तीय संपत्तियों का पता लगाया जा सकता है।
जमीन और मकान की जानकारी के लिए राजस्व विभाग, पंचायत, नगर निकाय और उप-पंजीयक कार्यालय के रिकॉर्ड देखे जाएंगे। इससे आरोपी के गृह जिले के बाहर की संपत्ति का भी पता चल सकता है। वहीं परिवहन विभाग (मध्यप्रदेश परिवहन विभाग) से वाहन का रिकॉर्ड मिलने पर आरोपी के नाम दर्ज कार, बाइक या दूसरे वाहन भी संपत्ति की सूची में शामिल किए जा सकते हैं।
पुलिस सीधे संपत्ति जब्त नहीं कर सकती
इस मामले में सबसे पहले एक जरूरी कानूनी फर्क समझना होगा। सिर्फ गिरफ्तारी वारंट लंबित होने से पुलिस को आरोपी की संपत्ति कुर्क करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत फरार आरोपी के खिलाफ अदालत पहले उद्घोषणा की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। इसके बाद अदालत आरोपी की चल या अचल संपत्ति कुर्क करने का आदेश दे सकती है। इसके लिए अदालत को लिखित में कारण भी दर्ज करना होता है।
केंद्रीय पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो यानी BPR&D की प्रक्रिया संबंधी सामग्री में भी यही बात सामने आती है। जांच अधिकारी को आरोपी के नाम दर्ज संपत्ति की पहचान करके उसकी पूरी सूची अदालत के सामने रखनी होती है। इसके बाद संपत्ति कुर्क करने का आदेश अदालत की ओर से दिया जा सकता है।
दूसरे जिले की संपत्ति पर भी पहुंच संभव
BNSS के तहत अदालत का आदेश जिले के भीतर मौजूद संपत्ति पर लागू हो सकता है। अगर संपत्ति दूसरे जिले में है, तो संबंधित जिले के जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी की प्रक्रिया जुड़ जाती है। यानी आरोपी की संपत्ति दूसरे जिले में होने से वह इस कार्रवाई से बच नहीं जाता।
दिक्कत यह है कि संपत्ति से जुड़ा डेटा अलग-अलग जगहों पर मौजूद है। बैंक, राजस्व, परिवहन और पंजीयन के रिकॉर्ड अलग-अलग सिस्टम में हैं।
साथ ही, यह साबित करना भी जरूरी होगा कि संपत्ति वास्तव में आरोपी की है। सिर्फ नाम एक जैसा होने से संपत्ति कुर्क नहीं की जा सकती। अदालत के सामने संपत्ति के स्वामित्व का पक्का रिकॉर्ड रखना होगा।
यह पुलिस की मनमानी कार्रवाई नहीं है। पूरी कार्रवाई अदालत के आदेश और तय कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होगी।
इसलिए इस व्यवस्था की सफलता सिर्फ आदेश जारी होने से तय नहीं होगी। असली सवाल यह होगा कि कितने फरार आरोपियों की संपत्ति मिली। कितने मामलों में पुख्ता रिकॉर्ड अदालत तक पहुंचा। कितने मामलों में कानूनी प्रक्रिया के तहत संपत्ति कुर्क हो सकी।