MP की आंगनबाड़ियों में राशन सप्लाई की बदली व्यवस्था, अब किसके हाथ होगी 1200 करोड़ की कमान?
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- कैबिनेट ने टेक होम राशन की व्यवस्था बदलने को मंजूरी दी।
- अब जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग के पास।
- राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की भूमिका खत्म होगी।
- सालाना करीब 1200 करोड़ रुपए की योजना।
- महिला समूहों के रोजगार और प्लांटों के भविष्य पर सवाल।
- सरकार का दावा- गुणवत्ता और सप्लाई दोनों सुधरेंगे।
मध्यप्रदेश सरकार ने आंगनबाड़ी में 6 महीने से 3 साल तक के बच्चों को मिलने वाले टेक होम राशन (THR) की व्यवस्था पूरी तरह बदलने का फैसला लिया है।
अब तक यह काम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (एसआरएलएम) के माध्यम से महिला स्व-सहायता समूहों के जरिए होता था, लेकिन अब इसकी जिम्मेदारी सीधे महिला एवं बाल विकास विभाग संभालेगा।
सरकार इसे गुणवत्ता सुधार और बेहतर सप्लाई सिस्टम की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, जबकि दूसरी ओर महिला समूहों के भविष्य और रोजगार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
क्या बदला और क्यों बदला?
अब तक टेक होम राशन तैयार कराने और वितरण की व्यवस्था पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधीन राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन संभाल रहा था। कैबिनेट के फैसले के बाद यह पूरी जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग को सौंप दी गई है।
सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्था से गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत होगा, तय मानकों के अनुसार पैकेजिंग होगी और आंगनबाड़ी केंद्रों तक समय पर राशन पहुंचाया जा सकेगा।
अब एमपी एग्रो के प्लांट होंगे अहम
नई व्यवस्था लागू होने के बाद टेक होम राशन तैयार करने में एमपी एग्रो के प्लांटों की भूमिका बढ़ सकती है। प्रदेश में मंडला, सागर, नर्मदापुरम, देवास, धार, रीवा और शिवपुरी सहित सात प्रमुख प्लांट हैं।
इन प्लांटों पर सरकार पहले ही करोड़ों रुपए खर्च कर चुकी है। अब इन्हीं संसाधनों का उपयोग नई व्यवस्था में किए जाने की तैयारी है।
समूहों के सामने सबसे बड़ा सवाल
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा असर उन महिला स्व-सहायता समूह पर पड़ सकता है, जो पिछले कई वर्षों से टेक होम राशन तैयार कर रहे हैं। इन प्लांटों में बड़ी संख्या में महिलाएं रोजगार से जुड़ी हैं।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि संचालन का तरीका बदलता है तो इन महिलाओं और उनके फेडरेशन की भूमिका क्या होगी। अभी इस पर सरकार की ओर से विस्तृत रोडमैप सामने नहीं आया है।
सरकार ने बदलाव की वजह भी बताई
सरकार का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आ रही थीं। बताया गया कि कई जिलों में टेक होम राशन समय पर नहीं पहुंच रहा था।
दो-दो महीने की देरी से सप्लाई होने के कारण पूरी वितरण व्यवस्था प्रभावित हो रही थी। इसके साथ ही सप्लाई चेन कमजोर होने और हर साल करोड़ों रुपए के नुकसान का भी हवाला दिया गया।
पुरानी व्यवस्था पर उठ चुके हैं सवाल
टेक होम राशन योजना पहले भी कई विवादों में रही है। 2017 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राशन वितरण व्यवस्था के विकेंद्रीकरण पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे।
अदालत ने कहा था कि बड़े निजी ठेकेदारों और औद्योगिक घरानों के बजाय स्थानीय स्तर पर व्यवस्था विकसित की जाए। इसके बाद अलग-अलग सरकारों में कई बार जिम्मेदारी बदली गई।
सीएजी रिपोर्ट ने भी बढ़ाई थी चिंता
बीते वर्षों में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों में टेक होम राशन योजना में गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट में करोड़ों रुपए की वित्तीय गड़बड़ियां, कागजों पर राशन वितरण, फर्जी भुगतान और अपात्र हितग्राहियों के मामले सामने आने का दावा किया गया था। इन खुलासों के बाद व्यवस्था में सुधार की मांग लगातार उठ रही थी।
टेक होम राशन: बार-बार बदली जिम्मेदारी
- 2018 से पहले : एमपी एग्रो और निजी ठेकेदारों के जरिए व्यवस्था।
- 2018 : हाईकोर्ट के निर्देश के बाद स्व-सहायता समूहों को जिम्मेदारी।
- 2020 : व्यवस्था फिर बदली और काम एमपी एग्रो को मिला।
- 2022 : जिम्मेदारी दोबारा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन को दी गई।
- 2026 : अब महिला एवं बाल विकास विभाग को पूरी जिम्मेदारी।
अब सबसे बड़ा सवाल क्या है?
सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से गुणवत्ता सुधरेगी और बच्चों तक समय पर पोषण आहार पहुंचेगा, लेकिन दूसरी ओर यह भी देखना होगा कि महिला स्व-सहायता समूहों की भूमिका क्या रहेगी, हजारों महिलाओं के रोजगार पर इसका क्या असर पड़ेगा।
क्या नई व्यवस्था वास्तव में उन खामियों को दूर कर पाएगी, जिनका हवाला देकर यह बदलाव किया गया है। यानी टेक होम राशन की जिम्मेदारी बदल गई है, लेकिन असली परीक्षा अब नई व्यवस्था के धरातल पर सफल क्रियान्वयन की होगी।
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