दिव्यांग क्यों रहें फिल्मी पर्दे से दूर? सरकार ने सिनेमाघरों से मांगा जवाब
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- सभी सिनेमाघरों को दिव्यांग अनुकूल बनाने की तैयारी शुरू।
- दृष्टिबाधित दर्शकों के लिए ऑडियो डिस्क्रिप्शन अनिवार्य होगा।
- श्रवणबाधितों के लिए कैप्शनिंग और सांकेतिक भाषा सुविधा।
- टिकट बुकिंग में उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी देनी होगी।
- कलेक्टरों को व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश जारी।
देश में दिव्यांगजनों को समान अवसर और मनोरंजन का अधिकार कानून पहले से देता है, लेकिन हकीकत यह रही कि सिनेमाघरों के दरवाजे उनके लिए पूरी तरह कभी नहीं खुले। वर्षों तक दृष्टिबाधित और श्रवणबाधित दर्शक फिल्मों की दुनिया से अधूरे तौर पर जुड़ते रहे।
अब मध्यप्रदेश सरकार ने सभी मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों को दिव्यांगों के लिए सुलभ बनाने की तैयारी मैं हैं। सवाल यह भी है कि जब नियम पहले से मौजूद थे, तो उन्हें लागू करने में इतनी देरी क्यों हुई?
कानून था, लेकिन अधिकार अधूरा रहा
अंधेरे हॉल में फिल्में चलती रहीं, कहानियां बदलती रहीं, लेकिन हजारों दिव्यांग दर्शकों के लिए मनोरंजन का अनुभव अधूरा ही रहा। दृष्टिबाधित दर्शक दृश्यों को समझ नहीं पाते थे, जबकि श्रवणबाधित दर्शक संवादों से कट जाते थे। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम और भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के बावजूद यह स्थिति वर्षों तक बनी रही।
अब सिनेमाघरों को करनी होगी तैयारी
नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने प्रदेश के सभी जिला कलेक्टरों को कहा है कि सिनेमाघरों में दिव्यांग दर्शकों के लिए जरूरी सुविधाएं तत्काल सुनिश्चित की जाएं।
फिल्में अब महसूस भी की जा सकेंगी
नए निर्देशों के तहत सिनेमाघरों में कई तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी, ताकि दिव्यांग दर्शक भी फिल्म का पूरा अनुभव ले सकें।
दिव्यांग दर्शकों के लिए अनिवार्य सुविधाएं...
- ऑडियो डिस्क्रिप्शन (श्रव्य वर्णन): दृष्टिबाधित दर्शकों को फिल्म के दृश्यों का विवरण सुनाया जाएगा।
- क्लोज्ड कैप्शनिंग: संवादों के साथ जरूरी ध्वनियों और आहटों की जानकारी भी लिखित रूप में उपलब्ध होगी।
- ओपन कैप्शनिंग: पर्दे पर बोले जा रहे शब्द और वार्तालाप दिखाई देंगे।
- भारतीय सांकेतिक भाषा: श्रवणबाधित दर्शकों को कहानी समझने में मदद मिलेगी।
- तकनीकी सहायता: स्मार्ट ग्लास, हेडफोन, मोबाइल ऐप जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।
- मानवीय सहयोग: जरूरत पड़ने पर शारीरिक सहायता भी सुनिश्चित करनी होगी।
टिकट से लेकर एग्जिट तक बदलनी होगी व्यवस्था
सिर्फ हॉल के भीतर सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं होगा। टिकट काउंटर और ऑनलाइन बुकिंग प्लेटफॉर्म पर भी यह स्पष्ट बताना होगा कि दिव्यांग दर्शकों के लिए कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं। यानी अब जिम्मेदारी फिल्म शुरू होने से पहले और खत्म होने के बाद तक तय होगी।
दिखावे से आगे बढ़ने की चुनौती
प्रदेश के कई सिनेमाघरों में औपचारिकता निभाने के लिए व्हीलचेयर तो रखी जाती हैं, लेकिन दिव्यांगों की सहज आवाजाही की व्यवस्था नहीं होती। कई स्थानों पर हॉल तक पहुंचना ही बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसे में नया आदेश केवल कागजी कार्रवाई बनकर न रह जाए, इसकी निगरानी भी जरूरी होगी।
मनोरंजन और सांस्कृतिक गतिविधियों में समान भागीदारी का अधिकार कोई नई व्यवस्था नहीं है। यह अधिकार पहले से कानून का हिस्सा है। फिर भी दिव्यांग दर्शकों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ा। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकारी निर्देश वास्तविक बदलाव लाते हैं या फिर यह पहल भी फाइलों तक सीमित रह जाती है।
सिनेमाघरों को दिव्यांग अनुकूल बनाने की तैयारी
दृष्टिबाधित और श्रवणबाधित दर्शकों के लिए विशेष तकनीकी सुविधाएं अनिवार्य हैं। टिकट बुकिंग प्लेटफॉर्म पर भी सुविधाओं की जानकारी देनी होगी। जरूरत पड़ने पर शारीरिक सहायता उपलब्ध करानी होगी।
सवाल बरकरार- कानून होने के बावजूद अमल में इतनी देरी क्यों हुई?
अपर सचिव कैलाश वानखेड़े ने सभी कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि दिव्यांगजनों की सुविधा और सुगमता के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी तरह चाक-चौबंद रखी जाएं। उन्होंने कहा कि संबंधित विभाग समन्वय बनाकर यह सुनिश्चित करें कि दिव्यांगजनों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
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