एमपी में शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव: कक्षा 9वीं के मूल्यांकन का नियम बदला

Manya Jain | Aug 13, 2026, 15:26 IST
mp class 9 holistic progress card hpc
मध्यप्रदेश में कक्षा 9वीं के छात्रों के मूल्यांकन का तरीका बदल रहा है। अब सिर्फ परीक्षा नहीं, कौशल और गतिविधियां भी जुड़ेंगी। हर जिले के तीन स्कूलों में हॉलिस्टिक प्रोग्रेस कार्ड पायलट प्रोजेक्ट लागू होगा।

समझें क्या है पूरा मामला

  • मध्यप्रदेश में कक्षा 9वीं के छात्रों के मूल्यांकन का तरीका बदलने जा रहा है।
  • अब सिर्फ परीक्षा नहीं, कौशल और व्यवहार भी जांचा जाएगा।
  • इसके लिए हॉलिस्टिक प्रोग्रेस कार्ड पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया जा रहा है।
  • हर जिले के तीन चुनिंदा स्कूल इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनेंगे।
  • छात्रों को साल भर में 120 घंटे गतिविधि आधारित प्रोजेक्ट वर्क करना होगा।

मध्यप्रदेश में कक्षा 9वीं के विद्यार्थियों के मूल्यांकन की व्यवस्था में बदलाव की तैयारी हो चुकी है। अब तक छात्रों का आकलन सिर्फ परीक्षा में मिले नंबरों के आधार पर होता रहा है। नई व्यवस्था में इसके साथ छात्रों के कौशल, व्यवहार और रोजाना की गतिविधियों को भी शामिल किया जाएगा।



इसी बदलाव के तहत होलिस्टिक प्रोग्रेस कार्ड यानी एचपीसी (HPC – Holistic Progress Card) को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जा रहा है। समग्र शिक्षा अभियान के अपर परियोजना संचालक ने इस संबंध में निर्देश जारी कर दिए हैं। यह व्यवस्था इसी अगस्त माह से शुरू कर दी गई है।



देशभर में शिक्षा नीति के तहत मूल्यांकन के तरीकों में बदलाव की चर्चा लंबे समय से चल रही है। सिर्फ परीक्षा के आधार पर छात्रों को आंकना पर्याप्त नहीं माना जाता। इसी सोच के साथ अब मध्यप्रदेश में भी व्यावहारिक और गतिविधि आधारित मूल्यांकन को आगे बढ़ाया जा रहा है।



किन स्कूलों में होगा लागू

यह व्यवस्था अभी शुरुआती चरण में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू की जा रही है। हर जिले में तीन खास तरह के स्कूल इसके दायरे में आएंगे। इनमें एक सांदीपनि विद्यालय, एक पीएम श्री स्कूल और एक जिला उत्कृष्ट विद्यालय शामिल होगा।



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यानी हर जिले के कुल तीन स्कूल इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनेंगे। इन स्कूलों की कक्षा 9वीं के छात्रों पर नई मूल्यांकन व्यवस्था लागू होगी। शुरुआती नतीजों के आधार पर आगे इसे और स्कूलों तक बढ़ाया जा सकता है।



क्यों चुने गए यह स्कूल

सांदीपनि स्कूल, पीएम श्री स्कूल और उत्कृष्ट विद्यालय पहले से ही अलग-अलग योजनाओं के तहत बेहतर संसाधनों वाले माने जाते हैं। इसी वजह से पायलट प्रोजेक्ट के लिए इन्हें प्राथमिकता दी गई है। इससे नई व्यवस्था को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिल सकती है।



पायलट के तौर पर सीमित स्कूलों को चुनने का एक फायदा यह भी है कि शिक्षा विभाग शुरुआती दिक्कतों को समय रहते पहचान सकेगा। इससे बाकी स्कूलों में इसे लागू करने से पहले जरूरी सुधार किए जा सकेंगे। यही वजह है कि किसी भी नई शैक्षणिक योजना को पहले सीमित दायरे में परखा जाता है।



6 भागों में होगा मूल्यांकन

नई व्यवस्था के तहत छात्रों को साल भर में 120 घंटे गतिविधि आधारित प्रोजेक्ट कार्य करना होगा। हॉलिस्टिक प्रोग्रेस कार्ड में कुल छह भाग तय किए गए हैं। इन सभी भागों को पूरा करने के लिए ही 120 घंटे की गतिविधियां कराई जाएंगी।



यह गतिविधियां सिर्फ किताबी पढ़ाई तक सीमित नहीं रहेंगी। इनमें छात्रों की व्यक्तिगत समझ, टीम वर्क और व्यावहारिक कौशल को भी परखा जाएगा। इस तरह पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों के समग्र विकास पर भी ध्यान दिया जाएगा।



सात माह में पूरा होगा प्रोजेक्ट

निर्देश के मुताबिक अगस्त से फरवरी तक छात्रों की गतिविधियां चलेंगी। इस पूरी अवधि में कुल 144 शैक्षणिक कार्य दिवस तय किए गए हैं। रोजाना 50 मिनट के हिसाब से कुल 7 हजार 200 मिनट यानी 120 घंटे एचपीसी गतिविधियों के लिए तय किए गए हैं।



अगस्त महीने में छात्र अपनी व्यक्तिगत जानकारी, स्व-मूल्यांकन, समय प्रबंधन और स्कूली जीवन के बाद की तैयारी जैसे विषयों पर काम करेंगे। सितंबर और अक्टूबर में समूह में प्रोजेक्ट कार्य कराया जाएगा। नवंबर-दिसंबर में भी तय गतिविधियां जारी रहेंगी, जबकि जनवरी में क्लासरूम इंटरएक्शन से जुड़ी गतिविधि होगी।



फरवरी में शिक्षक छात्रों का अंतिम मूल्यांकन करेंगे। इसके बाद उन्हें रिपोर्ट भी उपलब्ध कराई जाएगी। यानी पूरे सात महीने के दौरान छात्रों की प्रगति को चरणबद्ध तरीके से दर्ज किया जाएगा।



क्रेडिट को लेकर क्या है स्थिति

एक खास बात यह भी है कि फिलहाल एचपीसी को नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क यानी एनसीआरएफ (NCrF – National Credit Framework) से सीधे नहीं जोड़ा गया है। मौजूदा समय में यह फ्रेमवर्क लागू नहीं होने के कारण छात्रों की गतिविधियों को सीधे क्रेडिट में तब्दील नहीं किया जाएगा।



इसके बजाय इन गतिविधियों को रिकॉर्ड में जोड़ा जाएगा। आने वाले समय में जब क्रेडिट फ्रेमवर्क लागू होगा, तब इसका इस्तेमाल आगे बढ़ाया जा सकता है। फिलहाल यह पूरी प्रक्रिया पायलट चरण में ही सीमित रहेगी।



शिक्षा विभाग की कोशिश है कि छात्रों को सिर्फ नंबरों तक सीमित न रखा जाए। इसके बजाय उनकी समझ, आत्मविश्वास और व्यावहारिक कौशल को भी पहचान मिले। अगर यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो आने वाले समय में इसे बाकी स्कूलों तक भी बढ़ाया जा सकता है।



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