मध्य प्रदेश में इंजीनियरिंग का बदलता दौर, 10 साल में 64 कॉलेज बंद, जानें क्या है कारण?

Aman Vaishnav | Apr 29, 2026, 09:54 IST
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मध्य प्रदेश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई का स्वरूप बदल रहा है। देखा जाए तो पिछले 10 वर्षों में 64 कॉलेज बंद हुए हैं। वहीं छात्र अब AI और मशीन लर्निंग को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।

मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई का माहौल तेजी से बदल रहा है। पहले जैसे कॉलेजों में एडमिशन लेने के लिए छात्रों की भीड़ होती थी, अब वो समय नहीं रहा है।



प्लेसमेंट के मौके घटते जा रहे हैं और कोर इंजीनियरिंग ब्रांचों में छात्रों की रुचि भी कम हो रही है। इस कारण कई कॉलेजों के सामने अस्तित्व का संकट आ गया है।



64 इंजीनियरिंग कॉलेज हो चुके बंद

इस साल (2026) भी कई कॉलेज अपनी सीटें सरेंडर करने की तैयारी में हैं। पिछले साल की बात करें तो 754 सीटें खाली हो गई थीं। और तो और, पिछले 10 सालों में 64 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो चुके हैं।



दूसरी तरफ जैसे-जैसे नई-नई टेक्नोलॉजी जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और ई-मोबिलिटी की मांग बढ़ रही है, कॉलेज इन ब्रांचों में ज्यादा सीटें देने के लिए तकनीकी शिक्षा विभाग से मंजूरी ले रहे हैं।



प्लेसमेंट वाले कॉलेज में ले रहे एडमिशन

आंकड़े ये बताते हैं कि अब छात्र और उनके माता-पिता केवल उन्हीं कॉलेजों को चुन रहे हैं, जहां अच्छे प्लेसमेंट के मौके मिलें। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे और कम पहचान वाले कॉलेजों पर पड़ रहा है।



विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश के इंजीनियरिंग क्षेत्र में बड़ा बदलाव हो रहा है। जहां एक तरफ कई कॉलेज बंद हो रहे हैं और 5 दर्जन से ज्यादा कॉलेजों पर ताले लग चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ नए-नए कोर्सेस की डिमांड भी बढ़ रही है। प्लेसमेंट के दबाव के कारण ये बदलाव हो रहे हैं।



10 से ज्यादा ब्रांच खाली पड़ी रही

जानकारी के अनुसार प्रदेश में कुल 75 हजार 722 इंजीनियरिंग सीटों में से पिछले साल सबसे ज्यादा 20 हजार से ज्यादा एडमिशन सिर्फ कंप्यूटर साइंस में हुए। इसके मुकाबले कई पुरानी और खास ब्रांचों का हाल बहुत बुरा रहा।



एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग, बायोटेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी, ई व्हीकल्स जैसी 12 ब्रांचों में पिछले दो साल से सीटें खाली पड़ी थीं।



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इंजीनियरिंग कॉलेज में घट रही सीटें

2015-16 में जहां प्रदेश में 200 इंजीनियरिंग कॉलेज और करीब 95 हजार सीटें थीं। वहीं 2025-26 में यह संख्या घटकर 138 कॉलेज 74 हजार 722 सीटों तक रह गई है।



यह गिरावट साफ-साफ दिखा रही है कि अब इंजीनियरिंग शिक्षा सिर्फ संख्या का खेल नहीं रह गई है। यह अब गुणवत्ता और रोजगार से जुड़ी हुई है।



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