एमपी में पर्यावरण मंजूरी को लेकर विवाद: आमने-सामने आए ACS और सिया चेयरमैन!

Amresh Kushwaha | Mar 30, 2026, 10:51 IST
mp environment clearance dispute acs vs seiaa chairman deemed ec controversy
मध्य प्रदेश में 237 डीम्ड पर्यावरण मंजूरियों को लेकर ACS अशोक वर्णवाल और SEIAA चेयरमैन के बीच विवाद गहरा गया है। जानें क्या है माइनिंग लॉबी और NGT की फटकार का पूरा मामला...

मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) को लेकर एक बड़ा घमासान मचा हुआ है। यह विवाद किसी बाहरी व्यक्ति से नहीं, बल्कि सरकार के भीतर ही दो रसूखदार पक्षों के बीच है। एक तरफ पर्यावरण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) अशोक वर्णवाल हैं, तो दूसरी तरफ सिया (SEIAA - State Environment Impact Assessment Authority) के चेयरमैन एसएनएस चौहान हैं।



विवाद की जड़ में वे 237 डीम्ड मंजूरियां हैं, जिन्हें लेकर मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी (NGT) की चौखट पर है। ताजा मोड़ तब आया, जब विभाग के एसीएस (ACS) ने एक नया फरमान जारी कर पुरानी मंजूरियों को सही ठहराने की कोशिश की।



एसीएस के पत्र ने सुलगाई विवाद की चिंगारी

पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने 27 मार्च 2026 को सिया के सदस्य सचिव को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने पिछले साल 28 मई 2025 को जारी की गई डीम्ड (Deemed) पर्यावरणीय मंजूरियों का पक्ष लिया है।



वर्णवाल ने निर्देश दिया है कि इन मंजूरियों के टर्म ऑफ रेफरेंस (ToR - संदर्भ की शर्तें) पर भी उसी गंभीरता से विचार किया जाए, जैसे अन्य सामान्य मामलों में किया जाता है। यानी शासन अब उन मंजूरियों को मुख्यधारा में लाने की तैयारी में है, जिन पर पहले से ही सवालिया निशान लगे हुए हैं।



चेयरमैन की दो टूक: गलत है यह कदम

दूसरी ओर, सिया चेयरमैन शिवनारायण सिंह चौहान इस आदेश से इत्तेफाक नहीं रखते। उन्होंने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उनके पास आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई पत्र नहीं पहुंचा है।



हालांकि, सिया चेयरमैन एसएस चौहान ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि ऐसा कोई आदेश जारी किया गया है, तो वह पूरी तरह से वैधानिक (Statutory) रूप से गलत है। चेयरमैन का तर्क है कि जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में लंबित है, तो ऐसे निर्देश देना नियमों की अनदेखी है।



क्या है 237 डीम्ड मंजूरियों का सच?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ था जब पर्यावरण विभाग के तत्कालीन अधिकारियों ने ईआईए नोटिफिकेशन 2006 (EIA Notification 2006) की कंडिका 8 (iii) का हवाला देकर 237 परियोजनाओं को डीम्ड मंजूरी दे दी थी।



नियम कहता है कि यदि सिया 45 दिनों के भीतर आवेदन पर निर्णय नहीं लेता, तो उसे स्वतः मंजूर मान लिया जाता है। लेकिन चेयरमैन चौहान ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाए थे कि अधिकारियों ने जानबूझकर बैठकें नहीं बुलाईं, ताकि फाइलों को पेंडिंग (Pending) रखकर माइनिंग लॉबी को फायदा पहुंचाया जा सके।



एनजीटी की फटकार और माइनिंग लॉबी का कनेक्शन

इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की भोपाल बेंच पहले ही कड़ा रुख अपना चुकी है। 3 फरवरी को एनजीटी ने पन्ना जिले की रेत खदानों से जुड़ी नौ डीम्ड मंजूरियों को शून्य (Null and Void) घोषित कर दिया था।



ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में तीखी टिप्पणी करते हुए इसे माइनिंग लॉबी (Mining Lobby) को लाभ पहुंचाने का एक क्लासिक उदाहरण बताया था। एनजीटी का मानना है कि बिना किसी सामूहिक निर्णय और तकनीकी जांच (Appraisal) के ऐसी मंजूरियां देना पर्यावरण नियमों का खुला उल्लंघन है।



जांच के घेरे में अफसर, दिल्ली तक पहुंची आंच

फिलहाल, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने भी इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी (Fact Finding Committee) का गठन किया है जो इसकी बारीकी से जांच कर रही है।



एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है, वहीं दूसरी तरफ विभाग के नए आदेश ने आग में घी डालने का काम किया है। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस प्रशासनिक टकराव को कैसे सुलझाती है।



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