रद्दी से भी खेल गए MP के अफसर, सरकारी प्रेस में 3 टन दिखाकर 12 टन माल किया गायब
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेशके सरकारी प्रेस में रद्दी कागज बेचने में बड़ी गड़बड़ी मिली है।
- जांच में असली तौल और सरकारी रिकॉर्ड में बड़ा अंतर मिला है।
- ट्रकों में करीब 29.7 टन रद्दी थी, फाइल में सिर्फ 6.82 टन दिखाई गई।
- इस हेराफेरी से सरकार को करीब 1.34 करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान है।
- समिति अध्यक्ष के जवाबों में भी कई विरोधाभास सामने आए हैं।
मध्य प्रदेश के गवर्नमेंट प्रेस में रद्दी कागज बेचने के मामले में बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। यह विभाग शासकीय मुद्रण एवं लेखन सामग्री विभाग के नाम से जाना जाता है। दैनिक भास्कर की जांच में सरकारी प्रेस, ठेकेदार कंपनी और धर्मकांटे के रिकॉर्ड में गंभीर गड़बड़ी मिली है। इससे कई अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
दस्तावेजों की पड़ताल में सामने आया कि पूरे टेंडर के दौरान सरकार को करीब एक करोड़ 34 लाख रुपए का नुकसान हो सकता है। जांच के लिए टीम आधी रात रद्दी से भरे ट्रकों के पीछे गई। टीम उस धर्मकांटे तक पहुंची, जहां ट्रकों की तुलाई हुई थी। वहां से तस्वीरें और वीडियो जुटाए गए।
पड़ताल में पता चला कि असली तुलाई की पर्चियां सरकारी फाइल में मौजूद ही नहीं थीं। मूल रिकॉर्ड में दोनों ट्रकों में करीब 29.7 टन रद्दी दर्ज मिली। सरकारी फाइलों में यह मात्रा घटाकर सिर्फ 6.82 टन कर दी गई। यानी करीब 23 टन रद्दी का हिसाब गायब मिला। सवाल पूछने पर अधिकारियों ने रिकॉर्ड दोबारा जांचने की बात कही।
टेंडर की पूरी कहानी
शासकीय मुद्रण एवं लेखन सामग्री विभाग ने 16 नवंबर 2025 को टेंडर जारी किया था। इसके तहत सरकारी प्रेस से 60 मीट्रिक टन रद्दी कागज उठाने का काम दिया जाना था। टेंडर में जरूरत पड़ने पर रद्दी की मात्रा बढ़ाने का प्रावधान भी रखा गया।
यह ठेका भोपाल की फर्म मां ट्रेडर्स को मिला था। ठेकेदार को एक महीने में पूरी रद्दी उठानी थी। प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए मई 2026 में एक खास समिति भी बनाई गई। इस समिति के अध्यक्ष प्रभारी लेखा अधिकारी भवेशकांत सिन्हा को बनाया गया।
एग्रीमेंट के मुताबिक रद्दी की दर 32.55 रुपए प्रति किलो तय हुई थी। इसमें सारे टैक्स शामिल थे। परिवहन का खर्च ठेकेदार को खुद उठाना था। नियम के अनुसार 15 टन के ट्रक में कम से कम 12 टन रद्दी होनी जरूरी थी। कंपनी ने जून 2026 में दो चालानों से कुल दो लाख रुपए विभागीय खाते में जमा किए।
आधी रात ट्रकों का पीछा
30 जून 2026 को दिनभर सरकारी प्रेस में रद्दी लोड होती रही। रात करीब साढ़े ग्यारह बजे दो ट्रक प्रेस के मुख्य गेट से बाहर निकले। जांच टीम पहले से वहां मौजूद थी और दोनों ट्रकों का पीछा किया। कुछ ही मिनटों में दोनों ट्रक गोविंदपुरा इंडस्ट्रियल एरिया स्थित संजय स्केल्स धर्मकांटे पर पहुंच गए। वहां दोनों ट्रकों की तुलाई हुई।
इस दौरान पूरी प्रक्रिया को कैमरे में कैद किया गया। वहीं, इस दौरान निगरानी समिति के सदस्य धर्मकांटे पर मौजूद रहने के बजाय पास खड़ी कार में बैठे रहे। कुछ देर बाद धर्मकांटे के कर्मचारी ने तौल पर्चियां कार में ही सदस्यों को थमा दीं। पूरी घटना सामान्य निगरानी प्रक्रिया से काफी अलग नजर आई।
तौल पर्चियों में गड़बड़ी
दो जुलाई 2026 को उसी धर्मकांटे से दोनों ट्रकों की डुप्लीकेट तौल पर्चियां हासिल की गईं। इनके मुताबिक दोनों ट्रकों का कुल वजन करीब 29,775 किलो निकला। इसके बाद सूत्रों से सरकारी फाइल की पर्चियां भी मंगाई गईं।
हैरानी की बात यह रही कि फाइल में संजय स्केल्स की पर्ची थी ही नहीं। इसकी जगह करीब पंद्रह किलोमीटर दूर मिसरौद स्थित भवानी धर्मकांटे की पर्चियां लगी मिलीं। इन पर्चियों पर निगरानी समिति के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर थे।
दोनों धर्मकांटों के आंकड़ों में भारी अंतर था। संजय स्केल्स के रिकॉर्ड में वजन 29 हजार 775 किलो था, जबकि भवानी धर्मकांटे की सरकारी पर्ची में सिर्फ छह हजार 820 किलो दर्ज मिला। यानी दोनों रिकॉर्ड में करीब 22 हजार 955 किलो यानी 23 टन का अंतर आया।
समय को लेकर उठे सवाल
तौल पर्चियों में दर्ज समय पर भी गंभीर सवाल उठे। रिकॉर्ड के अनुसार दोनों धर्मकांटों पर तुलाई कुछ ही मिनटों के अंतर में दिखाई गई। जबकि गोविंदपुरा और मिसरौद के बीच बारह से पंद्रह किलोमीटर की दूरी है। इतनी दूरी इतने कम समय में तय होना संभव नहीं लगता।
इसके अलावा भवानी धर्मकांटे की दोनों पर्चियों के सीरियल नंबर अलग थे। वहीं, दोनों ट्रकों के नंबर का पहला हिस्सा एक जैसा दिखाया गया। सिर्फ आखिरी अंक अलग थे। इन तमाम बातों से दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सीधे सवाल खड़े होते हैं।
कितना हुआ राजस्व नुकसान
टेंडर कुल 60 मीट्रिक टन रद्दी के लिए जारी हुआ था। अभी तक सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ छह टन रद्दी की बिक्री दर्ज है। यानी कागजों पर अभी 54 मीट्रिक टन रद्दी बिकनी बाकी है। सरकारी रिकॉर्ड के हिसाब से हर ट्रक में औसतन तीन टन रद्दी दिखाई गई है। इस आधार पर साठ टन रद्दी उठाने के लिए करीब बीस ट्रकों की जरूरत होगी।
दो ट्रकों के आधार पर हुई गणना के मुताबिक दोनों रिकॉर्ड के बीच वजन का अंतर लगभग तेईस हजार किलो निकला। बत्तीस रुपए पचपन पैसे प्रति किलो की दर से इन दो ट्रकों पर ही करीब सात लाख सैंतालीस हजार रुपए का नुकसान बनता है। अगर यही अनुपात बाकी अठारह ट्रकों में भी दोहराया गया हो, तो कुल संभावित नुकसान करीब एक करोड़ 34 लाख रुपए तक पहुंच सकता है।
अफसर के जवाबों में झोल
नियम के मुताबिक रद्दी की तुलाई और डिस्पोजल पर निगरानी की जिम्मेदारी समिति अध्यक्ष भवेशकांत सिन्हा की थी। मीडिया ने उनसे कई सवाल पूछे, जिनके जवाबों में साफ विरोधाभास दिखा। पहले उन्होंने बताया कि अब तक तीन ट्रक भेजे जा चुके हैं। जब वजन के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने सटीक आंकड़ा याद न होने की बात कही।
तुलाई किस धर्मकांटे पर हुई, इस सवाल पर उन्होंने मिसरौद के धर्मकांटे का नाम लिया। वहीं, जब उन्हें बताया गया कि जांच में गोविंदपुरा के धर्मकांटे पर तुलाई मिली है, तो उन्होंने फिर मिसरौद का ही दावा दोहराया। साथ ही कहा कि वे समिति के बाकी सदस्यों से इस बारे में बात करेंगे।
फैक्ट चेक में हुआ खुलासा
मौजूदा दस्तावेजों के अनुसार 29 जून 2026 को मिसरौद के धर्मकांटे पर किसी तुलाई का रिकॉर्ड ही नहीं मिला। हालांकि उसी दिन कंपनी ने विभागीय खाते में पेमेंट जमा किया था। मीडिया के वीडियो और अन्य सबूतों के मुताबिक ट्रकों की असली लोडिंग और तुलाई 30 जून की रात हुई। यह तुलाई गोविंदपुरा के संजय स्केल्स धर्मकांटे पर हुई थी। समिति के सदस्य उस वक्त वहीं मौजूद थे। इसका पक्का वीडियो सबूत भास्कर के पास सुरक्षित है।
सरकार ने दिया जांच का भरोसा
जांच से जुड़े सभी दस्तावेज और सबूत प्रदेश के राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा को सौंपे गए हैं। मंत्री ने इस मामले को गंभीर बताया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि दस्तावेजों के आधार पर पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी।
उन्होंने कहा कि जांच में जो भी अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। मंत्री ने यह भी कहा कि किसी भी भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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