10 दिन हेलमेट पर सख्ती, फिर क्या? मध्य प्रदेश में सड़क सुरक्षा कब बनेगी रोज की ड्यूटी
ऐसे में असली सवाल चालान की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि सड़क सुरक्षा के नियमों को सालभर समान रूप से लागू करने वाली व्यवस्था आखिर कब बनेगी?
दस दिन की सख्ती से कितना बदलेगा व्यवहार?
पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर प्रदेश में 28 सितंबर से 8 अक्टूबर तक हेलमेट और सीटबेल्ट को लेकर प्रवर्तन और जन-जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। चौराहों, हाईवे और दुर्घटना संभावित इलाकों में जांच होगी। नियम तोड़ने वालों पर मोटरयान कानून के तहत कार्रवाई भी होगी।
मगर यहां सवाल अभियान की मंशा से ज्यादा उसके मॉडल पर है। सड़क सुरक्षा कोई दस दिन का आयोजन नहीं है। हेलमेट और सीटबेल्ट की जरूरत 8 अक्टूबर के बाद भी उतनी ही रहेगी, जितनी अभियान के दौरान है।
इसी साल पहले भी चला था अभियान
यही इस खबर का सबसे अहम पहलू है। मध्य प्रदेश पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक 26 अप्रैल से 10 मई 2026 तक भी हेलमेट की अनिवार्यता को लेकर विशेष अभियान चलाया गया था। जबलपुर में उस अवधि के शुरुआती दिनों में 3,300 से ज्यादा चालान किए गए थे। 175 से अधिक वाहन चालकों के लाइसेंस निलंबन के प्रस्ताव आरटीओ को भेजे गए थे।
आगर मालवा पुलिस के रिकॉर्ड में भी 26 अप्रैल से 10 मई तक विशेष हेलमेट अभियान का उल्लेख मिलता है। यानी मौजूदा अभियान इस साल का पहला विशेष प्रयास नहीं है।
यहीं सवाल उठता है कि अगर कुछ महीनों बाद फिर विशेष अभियान की जरूरत पड़ रही है, तो पिछले अभियान के बाद नियमों का नियमित प्रवर्तन कितना प्रभावी रहा?
आंकड़े बताते हैं, चुनौती छोटी नहीं
केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2026 में संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में 2024 में 56,669 सड़क दुर्घटनाएं और 14,791 मौतें दर्ज हुई थीं। 2023 में 55,327 दुर्घटनाएं और 13,798 मौतें दर्ज हुई थीं। यानी समस्या सिर्फ हेलमेट चेकिंग के कुछ दिनों की नहीं, बल्कि लगातार सड़क सुरक्षा प्रबंधन की है।
एक और आंकड़ा तस्वीर को गंभीर बनाता है। संसद में उपलब्ध 2024 के आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में गड्ढों से जुड़ी 1,069 दुर्घटनाओं में 277 लोगों की मौत दर्ज हुई। इसलिए सड़क सुरक्षा की बहस को केवल वाहन चालक के हेलमेट और सीटबेल्ट तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। सुरक्षित सड़क ढांचा और ब्लैक स्पॉट सुधार भी इसी जवाबदेही का हिस्सा हैं।
कैमरे और ई-चालान, लेकिन निरंतरता असली परीक्षा
मौजूदा अभियान में आईटीएमएस, सीसीटीवी और एएनपीआर जैसी तकनीक के जरिए उल्लंघन पकड़ने और ई-चालान की व्यवस्था भी शामिल है। बार-बार नियम तोड़ने वालों के ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित करने की कार्रवाई आगे बढ़ाने का भी प्रावधान बताया गया है।
तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है, लेकिन उसकी असली उपयोगिता तब होगी, जब निगरानी अभियान की तारीख खत्म होने के बाद भी उसी गंभीरता से जारी रहे।
जागरूकता भी सिर्फ दस दिन की क्यों?
स्कूल-कॉलेज, बाजार, सार्वजनिक स्थान, सामाजिक संगठन, ड्राइविंग स्कूल और दूसरे संस्थानों को अभियान से जोड़ना सकारात्मक पहल है। लेकिन सड़क सुरक्षा में व्यवहार बदलना एक लंबी प्रक्रिया है।
इंदौर यातायात पुलिस के आधिकारिक विवरण के अनुसार अकेले 2025 में 184 जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। इनके जरिए 43,431 नागरिकों तक सीधे पहुंचने का दावा किया गया। इससे यह भी साफ है कि जागरूकता का काम सालभर किया जा सकता है और किया जाता रहा है।
यहीं कमजोर पड़ता है मॉडल
विशेष अभियान की अवधि सीमित है, जबकि उल्लंघन रोज होते हैं।
इसी साल पहले अभियान चलने के बावजूद कुछ महीनों बाद दोबारा विशेष अभियान की जरूरत पड़ी।
मौजूदा अभियान की सफलता मापने के लिए सार्वजनिक रूप से स्पष्ट प्रदेशव्यापी लक्ष्य सामने होना ज्यादा उपयोगी होगा। उदाहरण के लिए हेलमेट अनुपालन में कितनी बढ़ोतरी हुई या मौतों में कितनी कमी आई।
हेलमेट और सीटबेल्ट जरूरी हैं, लेकिन सड़क सुरक्षा की जिम्मेदारी यहीं खत्म नहीं होती। ब्लैक स्पॉट, सड़क की स्थिति, ओवरस्पीडिंग, नशे में ड्राइविंग और इंजीनियरिंग खामियों पर भी समान निरंतरता जरूरी है।
सवाल इसलिए अभियान चलाने पर नहीं है। सवाल यह है कि सड़क पर सुरक्षा का अनुशासन “विशेष अभियान” क्यों बने? अगर उद्देश्य मौतों को कम करना है, तो 8 अक्टूबर के बाद भी कैमरे, चेकिंग, जागरूकता और जवाबदेही उसी रफ्तार से चलनी चाहिए।
आखिर सड़क सुरक्षा कैलेंडर देखकर लागू होने वाला नियम नहीं है। यह हर दिन की व्यवस्था होनी चाहिए।