जल जीवन मिशन की ठेकेदार कंपनियों पर HC ने लगाया 1 लाख रुपए का जुर्माना

Neel Tiwari | Jul 18, 2026, 13:03 IST
जल जीवन मिशन
जबलपुर हाईकोर्ट ने जल जीवन मिशन की पानी सप्लाई परियोजनाओं से जुड़े ठेके के विवाद में सेंट्रल इंडिया इंजीनियरिंग और उसकी सहयोगी कंपनियों को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने कंपनियों की सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। साथ ही, 1 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मामला होशंगाबाद जिले के बनखेड़ी और सोहागपुर की जलापूर्ति परियोजना से जुड़े करोड़ों रुपए के सरकारी ठेके का है।
  • यह परियोजना एशियन डेवलपमेंट बैंक की मदद से मध्य प्रदेश अर्बन डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड के जरिए लागू की जा रही थी।
  • ठेकेदार कंपनी ने आरोप लगाया कि सरकार ने बाद में SOP जारी कर अनुबंध की शर्तें बदल दीं।
  • हाई कोर्ट ने कहा कि अनुबंध में पहले से DAB और आर्बिट्रेशन की व्यवस्था थी, जिसे अपनाना जरूरी था।
  • अदालत ने सभी याचिकाएं खारिज करते हुए कंपनी पर कुल एक लाख रुपए की लागत भी लगा दी।

हाई कोर्ट ने खारिज की सभी याचिकाएं

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी ठेकों से जुड़े एक बड़े विवाद में सेंट्रल इंडिया इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड और उससे जुड़ी कंपनियों को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने कंपनी की सभी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं। इतना ही नहीं, कोर्ट ने सभी याचिकाओं पर मिलाकर एक लाख रुपए की लागत भी लगाई।



यह राशि मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि कंपनी के पास पहले से वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद थे। इसके बावजूद सीधे रिट याचिका दायर की गई। अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ताओं ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का पूरा खुलासा नहीं किया।



करोड़ों की जलापूर्ति परियोजना से जुड़ा है पूरा मामला

पूरा विवाद होशंगाबाद जिले की बनखेड़ी और सोहागपुर नगर परिषदों में जलापूर्ति व्यवस्था सुधारने वाली परियोजना से जुड़ा है। यह परियोजना मध्य प्रदेश अर्बन डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड यानी MPUDCL के माध्यम से लागू की जा रही थी। परियोजना को एशियन डेवलपमेंट बैंक से वित्तीय सहायता मिली थी। इसका उद्देश्य दोनों नगर परिषदों में आधुनिक पेयजल व्यवस्था विकसित करना था।



इसके लिए पाइपलाइन बिछाने, ओवरहेड टैंक बनाने, पंपिंग स्टेशन तैयार करने, जल वितरण नेटवर्क विकसित करने और बाद में दो वर्षों तक संचालन एवं रखरखाव का काम भी ठेकेदार को ही करना था। वर्ष 2017 में इस काम का अनुबंध सेंट्रल इंडिया इंजीनियरिंग और उसके जॉइंट वेंचर के साथ हुआ था।





कंपनी ने किस बात को बनाया विवाद का आधार

कंपनी का कहना था कि अनुबंध के कई साल बाद MPUDCL ने एक अक्टूबर 2021 को नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यानी SOP जारी कर दी। इससे पहले अनुबंध में जो नियम तय थे, उन्हें बदल दिया गया। कंपनी का आरोप था कि कमीशनिंग सर्टिफिकेट जारी करने की पूरी प्रक्रिया बदल गई।



साथ ही संचालन एवं रखरखाव अवधि में मिलने वाले भुगतान की शर्तें भी बदल दी गईं। इससे कंपनी को बड़ा आर्थिक नुकसान होने लगा। कंपनी ने इसी आधार पर हाई कोर्ट में कई रिट याचिकाएं दाखिल कर दीं।



सरकार ने कोर्ट में क्या रखा अपना पक्ष

सरकारी पक्ष ने हाई कोर्ट को बताया कि ठेकेदार कंपनी समय पर परियोजना पूरी नहीं कर सकी। अनुबंध के अनुसार काम 850 दिनों में पूरा होना था। वहीं, कंपनी ने तय समय से काफी देरी से परियोजना पूरी की और उसे चालू किया। सरकार ने यह भी कहा कि जिन आदेशों और SOP को चुनौती दी जा रही है, वे कई वर्ष पहले जारी किए जा चुके थे। इसके बावजूद कंपनी ने लंबे समय बाद रिट याचिकाएं दाखिल कीं। इसलिए देरी का सवाल भी महत्वपूर्ण है।



अदालत ने अनुबंध की इन शर्तों को माना सबसे अहम

सुनवाई के दौरान अदालत ने FIDIC गोल्ड बुक के विवाद समाधान संबंधी प्रावधानों का विस्तार से अध्ययन किया। इन शर्तों के अनुसार किसी भी अनुबंध विवाद को पहले विवाद अधिनिर्णय बोर्ड यानी DAB के सामने रखा जाना था। यदि वहां समाधान नहीं मिलता, तब दोनों पक्ष मध्यस्थता यानी आर्बिट्रेशन का रास्ता अपना सकते थे। अदालत ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया अनुबंध का अनिवार्य हिस्सा थी। ऐसे में सीधे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना उचित नहीं था।



हाई कोर्ट ने कंपनी पर क्यों जताई नाराजगी

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता को रिट याचिका में यह स्पष्ट बताना चाहिए था कि अनुबंध में पहले से मध्यस्थता का प्रावधान मौजूद है। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि कंपनी को पहले ही DAB के सामने विवाद उठाने का अवसर दिया गया था। इसके अलावा DAB का एक फैसला भी रिकॉर्ड में मौजूद था। यदि कंपनी उस फैसले से असंतुष्ट थी, तो वह अनुबंध में तय अगले कानूनी विकल्प का उपयोग कर सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।



कोर्ट ने यह भी कहा कि कंपनी ने अपने पक्ष में जरूरी पत्राचार का उल्लेख किया, लेकिन उन दस्तावेजों का पूरा खुलासा नहीं किया जो इस विवाद के समाधान से जुड़े थे। हाईकोर्ट ने इसे गंभीर माना।



अनुबंध विवाद का फैसला रिट में नहीं होगा

हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह पूरा विवाद अनुबंध की शर्तों और उनके पालन से जुड़ा है। ऐसे मामलों का फैसला सामान्य तौर पर रिट अधिकार क्षेत्र में नहीं किया जाता। जब अनुबंध में पहले से विवाद निपटाने की व्यवस्था तय हो, तब उसी प्रक्रिया का पालन करना होगा। कोर्ट ने माना कि यह मामला मध्यस्थ या अन्य वैकल्पिक मंच के सामने अधिक उपयुक्त है।



मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा होगा 1 लाख रुपए

एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने सभी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने कुल एक लाख रुपए की लागत लगाई। यह राशि सभी याचिकाओं के लिए संयुक्त रूप से तय की गई है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरी राशि मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराई जाए। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कंपनी चाहे तो अनुबंध के अनुसार उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय अपना सकती है।



सरकारी ठेकों से जुड़े मामलों पर क्या पड़ेगा असर

यह फैसला सरकारी निर्माण और अधोसंरचना परियोजनाओं से जुड़े ठेकेदारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाई कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि अनुबंध में तय विवाद समाधान व्यवस्था को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि DAB और आर्बिट्रेशन का प्रावधान मौजूद है, तो पहले उसी प्रक्रिया का पालन करना होगा। सीधे रिट याचिका दाखिल करने पर राहत मिलने की संभावना कम होगी। यह फैसला भविष्य में सरकारी अनुबंधों से जुड़े कई मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।



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