जल संसाधन विभाग के रिटायर्ड सब इंजीनियरों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, शुरुआती नौकरी भी पेंशन में जुड़ेगी
हाईकोर्ट ने बदला पिछला फैसला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग से रिटायर हुए 65 सब इंजीनियरों को बड़ी राहत दी है। जबलपुर हाईकोर्ट में जस्टिस विवेक रुसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने 26 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया।
कोर्ट ने साफ किया कि कर्मचारियों ने नियमित नियुक्ति या नियमितीकरण से पहले जितने साल काम किया है, उस अवधि को भी पेंशन के लिए गिना जाएगा। हाईकोर्ट ने अपने पिछले फैसले में दी गई सीमित राहत वाले हिस्से को खारिज कर दिया है।
साथ ही अपील स्वीकारते हुए शुरुआती सेवा जोड़ने का आदेश दिया है। अब पेंशन के लिए कर्मचारियों की पहली नियुक्ति से की गई सेवा गिनी जाएगी।
संजय कुमार वर्मा और मुनींद्र प्रसाद पांडे समेत 65 कर्मचारियों ने की अपील
जल संसाधन विभाग के 65 रिटायर्ड सब इंजीनियरों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। इनमें जबलपुर के संजय कुमार वर्मा और रीवा के मुनींद्र प्रसाद पांडे भी शामिल थे। कर्मचारियों की मांग थी कि नियमितीकरण से पहले की सेवा भी पेंशन में जोड़ी जाए।
कर्मचारियों की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी ने कोर्ट में पैरवी की। उनके साथ अधिवक्ता वृंदावन तिवारी, मनीष गुर्जर और कंचन तिवारी भी मौजूद रहे।
वहीं, राज्य सरकार का पक्ष शासकीय अधिवक्ता राजेश तिवारी ने कोर्ट में रखा है। कर्मचारियों ने नियमितीकरण से पहले की गई सेवा को पेंशन की गणना में शामिल करने की मांग की थी।
उनकी अपील रिट याचिका क्रमांक 27044/2022 में 27 सितंबर 2025 को पारित आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।
1988 या उससे पहले मिली थी नौकरी
कर्मचारियों के मुताबिक, उनकी नियुक्ति साल 1988 या उससे पहले हुई थी। उनके महीने वेतन का भुगतान विभाग की आकस्मिक निधि से होता था। सामान्य प्रशासन विभाग ने 11 नवंबर 1997 को एक परिपत्र जारी किया था।
यह परिपत्र 31 दिसंबर 1988 तक नियुक्त दैनिक वेतनभोगी सब इंजीनियरों के नियमितीकरण से जुड़ा था। इसी प्रक्रिया के तहत इन कर्मचारियों को साल 2004-05 में नियमित किया गया था। कर्मचारियों का कहना था कि उन्होंने नियमित होने से पहले भी कई साल काम किया था।
ऐसे में पेंशन तय करते समय उनकी पुरानी सेवा को नजरअंदाज करना सही नहीं है। उनका तर्क था कि पेंशन की गणना में नियमितीकरण से पहले की सेवा भी जोड़ी जाए।
पहले 15 साल बाद की सेवा पर ही मिलता था लाभ
कोर्ट ने पहले रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कर्मचारियों को सीमित राहत दी थी। आदेश के मुताबिक, मासिक वेतन वाले कर्मचारियों की 15 साल बाद की सेवा ही पेंशन में गिनी जानी थी। इससे पहले की सेवा का उन्हें पूरा फायदा नहीं मिल रहा था।
कर्मचारियों ने कोर्ट में इसी शर्त को चुनौती देते हुए अपनी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि स्थायी कर्मचारी बनने के बाद शुरुआती सेवा को बाहर रखना गलत है। पेंशन के नियमों में ऐसा करने का कोई आधार नहीं बताया गया है।
कर्मचारियों ने नियमितीकरण से पहले की पूरी सेवा को पेंशन में जोड़ने की मांग की है।
6 साल की सेवा के बाद स्थायी दर्जे का दिया हवाला
कर्मचारियों ने पेंशन के लिए मध्य प्रदेश के 1979 के नियमों का हवाला दिया। ये नियम कार्यभारित और आकस्मिकता भुगतान पाने वाले कर्मचारियों की पेंशन से जुड़े हैं। पहले इन नियमों में स्थायी दर्जा पाने के लिए 15 साल की सेवा जरूरी थी।
फिर 13 सितंबर 1982 की अधिसूचना से यह अवधि घटाकर 10 साल कर दी गई। इसके बाद वित्त विभाग ने 30 जनवरी 1996 को नई अधिसूचना जारी की थी। इसके जरिए स्थायी दर्जा पाने की अवधि घटाकर 6 साल कर दी गई थी।
कर्मचारियों का कहना था कि स्थायी दर्जा मिलने पर पिछली सेवा भी गिनी जानी चाहिए। उन्होंने मांग की कि उनकी पिछली सेवा को भी पेंशन की गणना में जोड़ा जाए। उनका तर्क था कि पेंशन नियमों में शुरुआती सेवा को बाहर रखने का प्रावधान नहीं है।
नियमितीकरण से पहले की सेवा भी अहम
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2019 के प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कर्मचारियों की पुरानी सेवा को लेकर अहम बात कही थी। कोर्ट के मुताबिक, नियमितीकरण से पहले की गई सेवा भी पेंशन में गिनी जा सकती है।
इसमें कार्यभारित या आकस्मिकता निधि से वेतन पाने वाले कर्मचारियों की सेवा भी शामिल है। सिर्फ शुरुआती नियुक्ति नियमित नहीं होने से कर्मचारी को पेंशन लाभ से वंचित नहीं कर सकते।
कर्मचारी लंबे समय तक लगातार काम करे और बाद में नियमित हो, तो पिछली सेवा अहम है। ऐसे में सेवा को पेंशन की गणना से बाहर रखने के लिए ठोस आधार होना चाहिए।
शुरुआती सेवा को पेंशन से बाहर रखने की शर्त नहीं
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पेंशन नियमों को लेकर अहम बात स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा कि नियम 6(2) में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। जिसके तहत पिछली सेवा की गिनती स्थायी दर्जा मिलने से ही शुरू हो। कोर्ट के मुताबिक, तय सेवा अवधि पूरी होने पर कर्मचारी को स्थायी दर्जा मिलता है।
ऐसे में पेंशन की गणना में उसकी पहले की सेवा भी जोड़ी जानी चाहिए। बेंच ने पिछले फैसले में लगाई गई 15 साल की सीमा भी हटा दी है। पहले केवल 15 साल से ज्यादा की सेवा को ही गिना जा रहा था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शुरुआती नियुक्ति से की गई पूरी सेवा गिनी जाएगी। नियमितीकरण के बाद यह सेवा मध्य प्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के तहत अर्हक सेवा मानी जाएगी।
कर्मचारियों को क्या फायदा होगा?
इस फैसले से कर्मचारियों की पेंशन की गणना में उनकी पुरानी सेवा भी जुड़ेगी। अब पेंशन के लिए केवल नियमित होने के बाद की नौकरी नहीं गिनी जाएगी। नियमितीकरण से पहले की सेवा को भी पेंशन की गणना में शामिल किया जाएगा।
इससे कर्मचारियों की कुल सेवा अवधि बढ़ सकती है और पेंशन का लाभ मिल सकता है। हालांकि, पेंशन की वास्तविक राशि और बकाया लाभ का हिसाब अलग से तय होगा। इसके लिए कर्मचारियों के सेवा रिकॉर्ड और संबंधित विभाग के नियमों को देखा जाएगा।
विभाग इन्हीं नियमों और रिकॉर्ड के आधार पर पेंशन की राशि की गणना करेगा। हाईकोर्ट ने रिट अपील क्रमांक 2562/2026 स्वीकार कर कर्मचारियों को यह राहत दी है।
FAQ
- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पेंशन को लेकर क्या फैसला सुनाया?
हाई कोर्ट ने जल संसाधन विभाग के 65 रिटायर्ड सब इंजीनियरों की शुरुआती नौकरी को भी पेंशन की गणना में शामिल करने का फैसला दिया है। - इस फैसले का लाभ कितने कर्मचारियों को मिलेगा?
इस मामले में अपील करने वाले जल संसाधन विभाग के 65 रिटायर्ड सब इंजीनियरों को राहत मिली है। - क्या नियमितीकरण से पहले की सेवा भी पेंशन में जोड़ी जाएगी?
हां, कोर्ट ने संबंधित कर्मचारियों की शुरुआती नियुक्ति से की गई सेवा को पेंशन योग्य माना है।