अब्दुल रज्जाक की याचिका खारिज, हिरासत को अवैध मानने से हाईकोर्ट का इनकार
समझें पूरा मामला...
- हाईकोर्ट ने अब्दुल रज्जाक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज की।
- कोर्ट ने माना- जमानत के वैधानिक उपाय मौजूद, इसलिए हिरासत अवैध नहीं।
- रज्जाक ने आरोप लगाया था कि उन्हें राजनीतिक कारणों से लगातार जेल में रखा गया।
- कोर्ट ने पुलिस को सभी लंबित मामलों की जानकारी देने के निर्देश दिए।
- आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का विस्तृत उल्लेख किया गया
जबलपुर हाईकोर्ट ने हिस्ट्रीशीटर अब्दुल रज्जाक की याचिका पर 37 पेज का विस्तृत आदेश जारी करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी।
राज्य सरकार और पुलिस को निर्देश दिया कि रज्जाक के खिलाफ दर्ज सभी मामलों और भविष्य में दर्ज होने वाले अपराधों की जानकारी उन्हें उपलब्ध कराई जाए। अदालत ने कहा कि जमानत के वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं, इसलिए हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता।
37 पेज के आदेश और हैबियस कॉरपस याचिका खारिज
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने हिस्ट्रीशीटर अब्दुल रज्जाक की याचिका पर 37 पेज का विस्तृत आदेश जारी किया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया।
आदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), गिरफ्तारी की प्रक्रिया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पुलिस कार्रवाई से जुड़े कई महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है।
रज्जाक ने लगाया था राजनीतिक प्रताड़ना का आरोप
याचिकाकर्ता अब्दुल रज्जाक ने अदालत में दावा किया था कि उन्हें राजनीतिक कारणों से लगातार जेल में रखने के लिए प्रशासन ने एक के बाद एक आपराधिक मामले दर्ज किए। उनका आरोप था कि जब भी उन्हें किसी मामले में जमानत मिली, तब नए मामलों में गिरफ्तारी दिखाकर उन्हें जेल से बाहर नहीं आने दिया गया। याचिका में कहा गया कि NSA का उपयोग भी इसी उद्देश्य से किया गया।
तीन बार लगा NSA, तीनों बार बोर्ड से नहीं मिली मंजूरी
रज्जाक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली ने कोर्ट को बताया कि अगस्त 2021 से जनवरी 2023 के बीच उन पर तीन बार राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम लगाया गया। लेकिन राज्य स्तरीय सलाहकार बोर्ड ने तीनों ही मामलों में NSA को मंजूरी नहीं दी और बाद में आदेश निरस्त हो गए। याचिकाकर्ता ने इसे प्रशासन द्वारा “लगातार हिरासत में रखने की रणनीति” बताया।
आधी रात गिरफ्तारी को बताया मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
याचिका में कहा गया कि 26 और 27 अगस्त 2021 की मध्यरात्रि में पुलिस ने उन्हें घर से उठाया, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन है।
इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया गया, जिनमें निजता के अधिकार से जुड़ा केएस पुट्टास्वामी फैसला भी शामिल रहा। अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा गया कि गिरफ्तारी और हिरासत के आधार आरोपी की समझ की भाषा में लिखित रूप में देना संवैधानिक आवश्यकता है।
पुलिस कार्रवाई और संपत्तियों पर भी उठे सवाल
रज्जाक ने अदालत को बताया कि उनके माइनिंग लीज रद्द कर दिए गए, पत्नी का हथियार लाइसेंस निरस्त कर दिया गया और रिश्तेदारों के बैंक खाते तक सीज कर लिए गए। याचिका में आरोप लगाया गया कि यह सब प्रशासनिक प्रताड़ना का हिस्सा था। हालांकि राज्य सरकार ने इन आरोपों का विरोध किया और कहा कि सभी कार्रवाइयां कानून के दायरे में हुईं।
राज्य सरकार ने कहा- याचिका सुनवाई योग्य नहीं
महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने अदालत में दलील दी कि जब कोई आरोपी न्यायिक हिरासत में हो और उसकी नियमित जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी हों, तब बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए रिहाई नहीं मांगी जा सकती।
राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले मध्य प्रदेश राज्य बनाम कुसुम साहू का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक मामलों में हिरासत को केवल इसलिए अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि आरोपी की जमानत याचिका खारिज हुई है।
हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण राहत देने से इनकार
दोनों पक्षों की लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास जमानत प्राप्त करने के वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं और इसलिए उनकी हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता।
लेकिन कोर्ट ने पुलिस को दिए अहम निर्देश
हालांकि अदालत ने याचिका पूरी तरह खारिज नहीं की। कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि रज्जाक के खिलाफ लंबित सभी मामलों की जानकारी उन्हें उपलब्ध कराई जाए। साथ ही भविष्य में यदि कोई नया मामला दर्ज किया जाता है तो उसकी सूचना भी समय पर दी जाए ताकि वह कानूनी उपाय अपना सकें।
सुप्रीम कोर्ट के कई बड़े फैसलों का हवाला
37 पेज के आदेश में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अनेक महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया। इनमें डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य फैसला, अर्नेश कुमार फैसला, ललिता कुमारी फैसला और मेनका गांधी फैसला जैसे ऐतिहासिक मामलों को विस्तार से लिखा गया।
जमानत याचिकाओं पर आदेश का असर नहीं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियां भविष्य में दायर होने वाली किसी भी जमानत याचिका को प्रभावित नहीं करेंगी। अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता सक्षम अदालत में जमानत आवेदन पेश करते हैं तो उसका निर्णय स्वतंत्र रूप से मेरिट के आधार पर किया जाएगा।
क्या है बंदी प्रत्यक्षीकरण
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को बोलचाल में एम आमतौर पर “हेबियस कॉर्पस” कहा जाता है- यानी जब किसी को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा जाए, तो वो या उसके परिजन अदालत से कह सकते हैं- “इसे अदालत के सामने लाओ और बताओ किस आधार पर रोका है।” सरल शब्दों में कह सकते हैं “छोड़ो या अदालत को बताओ क्यों रोका है।”
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