नर्मदा परियोजनाओं का ‘प्रभार मॉडल’! अरबों के काम, लेकिन खाली पदों के भरोसे दौड़ रहा सिंचाई सिस्टम

Ramanand Tiwari | May 18, 2026, 07:00 IST
Photograph: (the sootr)
मध्य प्रदेश की नर्मदा परियोजनाएं अरबों की लागत की हैं, लेकिन खाली इंजीनियरिंग पद और अतिरिक्त प्रभार मॉडल के कारण प्रशासनिक केंद्रीकरण, निगरानी कमजोर और गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।

मध्य प्रदेश में सिंचाई क्षमता बढ़ाने और किसानों तक पानी पहुंचाने के बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी तस्वीर इससे अलग दिखाई दे रही है। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) और जल संसाधन विभाग इंजीनियरों की भारी कमी से गुजर रहे हैं।



हालत यह है कि अरबों रुपए की परियोजनाएं अतिरिक्त प्रभार के सहारे संचालित हो रही हैं। स्थिति सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि गुणवत्ता, मॉनिटरिंग और जवाबदेही से भी जुड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है।



NVDA में ‘वन मैन कंट्रोल’ जैसी स्थिति

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण इस समय असामान्य प्रशासनिक ढांचे पर काम कर रहा है। विभाग में इंजीनियर-इन-चीफ (ENC) के तीन पद स्वीकृत हैं, लेकिन फिलहाल एक भी नियमित ENC पदस्थ नहीं है।



वहीं मुख्य अभियंता (Chief Engineer) के 21 स्वीकृत पद हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण सर्किल बिना नियमित चीफ इंजीनियर के संचालित हो रहे हैं।



सूत्रों के मुताबिक, विभाग में अतिरिक्त प्रभार का दायरा इतना बढ़ चुका है कि कई बड़े फैसले सीमित अधिकारियों के भरोसे चल रहे हैं।



एक अधिकारी के पास कई जिम्मेदारियां

जानकारी के अनुसार मेंबर इंजीनियर डीएल वर्मा के पास केवल तकनीकी जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और वित्तीय प्रभार भी हैं। वे मेंबर इंजीनियर के साथ-साथ ऊर्जा और वित्त से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। विभाग के कई खाली पदों का असर सीधे कार्यप्रणाली पर दिखाई दे रहा है।



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SE से लेकर EE तक भारी कमी

NVDA में सुपरिटेंडिंग इंजीनियर (SE) के 88 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 45 पद खाली बताए जा रहे हैं।



स्थिति और ज्यादा गंभीर कार्यपालन यंत्री (Executive Engineer) स्तर पर है। विभाग में 228 पद स्वीकृत हैं, जबकि वर्तमान में केवल 21 एग्जिक्यूटिव इंजीनियर ही कार्यरत बताए जा रहे हैं।



ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि इतने सीमित अधिकारियों के जरिए अरबों रुपए की परियोजनाओं की निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण कैसे सुनिश्चित किया जा रहा होगा।



22 बड़ी परियोजनाएं और निगरानी का संकट

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अधीन इस समय करीब 22 बड़ी सिंचाई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इन परियोजनाओं की लागत हजारों करोड़ रुपए में है।



सरकार दावा कर रही है कि इन योजनाओं से सिंचाई रकबा बढ़ेगा और किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। लेकिन तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी बड़ी परियोजनाओं की फील्ड मॉनिटरिंग, गुणवत्ता परीक्षण, साइट निरीक्षण और समयबद्ध समीक्षा के लिए पर्याप्त इंजीनियरिंग ढांचा जरूरी होता है।



जब अधिकांश पद खाली हों और अधिकारी अतिरिक्त प्रभार पर काम कर रहे हों, तब निर्माण गुणवत्ता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।



जल संसाधन विभाग की तस्वीर भी चिंताजनक

स्थिति सिर्फ NVDA तक सीमित नहीं है। जल संसाधन विभाग भी इंजीनियरों की भारी कमी से जूझ रहा है। विभाग के लगभग 80 प्रतिशत इंजीनियरिंग पद खाली बताए जा रहे हैं। प्रदेश के 11 जोनों में नियमित मुख्य अभियंता पदस्थ होने चाहिए, लेकिन कई जोन अतिरिक्त प्रभार के सहारे संचालित हो रहे हैं। भोपाल, सिवनी, रीवा और राजगढ़ जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थायी तकनीकी नेतृत्व का अभाव विभागीय दबाव बढ़ा रहा है।



‘प्रभार मॉडल’ पर चल रहा सिंचाई तंत्र?

मौजूदा स्थिति यह संकेत दे रही है कि प्रदेश का सिंचाई तंत्र धीरे-धीरे “अतिरिक्त प्रभार मॉडल” पर निर्भर होता जा रहा है। एक ही अधिकारी कई जिम्मेदारियां संभाल रहा है। इससे प्रशासनिक केंद्रीकरण बढ़ने, निर्णय प्रक्रिया प्रभावित होने और तकनीकी मॉनिटरिंग कमजोर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।



विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते रिक्त पद नहीं भरे गए, तो भविष्य में परियोजनाओं की लागत, समयसीमा और गुणवत्ता तीनों प्रभावित हो सकती हैं।



सरकार का पक्ष: प्रमोशन अटके, इसलिए दी जा रही अतिरिक्त जिम्मेदारी

इस पूरे मामले पर अACS डॉ. राजेश राजौरा का कहना है कि विभागों में प्रमोशन प्रक्रिया लंबित होने की वजह से कई पदों पर नियमित नियुक्तियां नहीं हो पा रही हैं। उन्होंने कहा कि पद स्वीकृत होने के बावजूद पदोन्नति नहीं होने से प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हुई है। ऐसे में कार्य प्रभावित न हो, इसलिए आवश्यकता के अनुसार अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार सौंपना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है।



राजौरा के मुताबिक, NVDA सहित संबंधित विभागों में सभी परियोजनाओं की मॉनिटरिंग व्यवस्थित तरीके से की जा रही है और कामकाज को सुचारु बनाए रखने के लिए लगातार समीक्षा की जा रही है।



सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी

प्रदेश में केन-बेतवा प्रोजेक्ट सहित कई मेगा सिंचाई परियोजनाओं को विकास मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ खाली पद, सीमित इंजीनियरिंग स्टाफ और अतिरिक्त प्रभार आधारित व्यवस्था एक अलग तस्वीर दिखा रही है।



सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हजारों करोड़ की परियोजनाएं सीमित अधिकारियों और अतिरिक्त जिम्मेदारियों के भरोसे चल रही हों, तब गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही की अंतिम जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?



एक नजर में विभागों की हालत

  • NVDA में ENC के 3 पद स्वीकृत, एक भी नियमित पदस्थ नहीं
  • चीफ इंजीनियर के 21 पद स्वीकृत इसके बावजूद स्थिति शून्य।
  • वहीं SE के 88 पदों में 45 खाली
  • EE के 228 पद स्वीकृत, केवल 21 कार्यरत
  • 22 बड़ी सिंचाई परियोजनाएं अतिरिक्त प्रभार व्यवस्था के बीच संचालित
  • जल संसाधन विभाग में भी करीब 80% इंजीनियरिंग पद खाली
  • कई जोन नियमित मुख्य अभियंता के बिना संचालित
  • सरकार ने प्रमोशन लंबित होने को बताया प्रमुख कारण

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