खेलो एमपी पर करोड़ों की चमक, कोचिंग सिस्टम हुआ खोखला!
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- खेलो एमपी पर खर्च, कोचिंग पर संकट।
- दो नियमित कोच, 120 संविदा प्रशिक्षक।
- 51 जिलों में स्थायी कोचिंग का सवाल।
- बड़ा बजट, लेकिन मैदान पर कमी।
- इवेंट से खिलाड़ी नहीं, कोच तैयार करते हैं।
खेलों को लेकर मध्यप्रदेश सरकार बड़े दावे कर रही है। खेलो एमपी जैसे आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। स्टेडियम, प्रतियोगिताएं और खेल सुविधाओं के विस्तार की तस्वीर भी लगातार सामने रखी जा रही है। लेकिन इसी चमक के पीछे खेल व्यवस्था का वह हिस्सा छिपा है, जहां खिलाड़ी की असली तैयारी होती है, कोचिंग।
यहीं से सरकार के दावों और मैदान की हकीकत के बीच बड़ा फासला दिखाई देता है। जब खिलाड़ी तैयार करने वाली व्यवस्था में ही नियमित प्रशिक्षकों का टोटा हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि करोड़ों रुपये खर्च करके आयोजित होने वाले इवेंट आखिर किस खेल तंत्र की मजबूती का प्रमाण हैं?
इवेंट पर खर्च, खिलाड़ी की नींव कमजोर
खेलो एमपी जैसे आयोजन खेल प्रतिभाओं को मंच देने के लिए जरूरी हो सकते हैं। लेकिन किसी खिलाड़ी की असली तैयारी एक-दो दिन के आयोजन से नहीं होती। उसे वर्षों तक नियमित प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और अनुभवी कोच की जरूरत होती है।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में करीब 120 कोच संविदा पर काम कर रहे हैं, जबकि नियमित कोचों की संख्या बेहद कम है। यानी जिस व्यवस्था से प्रदेश के खिलाड़ियों को लगातार तैयार किया जाना चाहिए, उसका बड़ा हिस्सा अस्थायी ढांचे पर टिका हुआ है।
दो नियमित कोचों से कितना बड़ा खेल तंत्र?
प्रदेश में स्वीकृत नियमित कोच पदों और वास्तविक नियुक्तियों के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। मौजूदा स्थिति में नियमित कोचों की संख्या महज दो बताई जा रही है और वे भी विभागीय जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।
इसके मुकाबले हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों में नियमित प्रशिक्षकों का बड़ा नेटवर्क है। यही तुलना मध्यप्रदेश की नीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है, जब प्रतियोगिता राष्ट्रीय स्तर की है तो कोचिंग व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों?
घनघोरिया ने विधानसभा में खोली व्यवस्था की परत
विधायक लखन घनघोरिया ने विधानसभा में खेल विभाग के बजट, खेल सुविधाओं और कोचों की कमी को लेकर सवाल उठाए। जबलपुर के रानीताल खेल परिसर और वेलोड्रोम की स्थिति का मुद्दा भी सामने आया।
उनका सवाल मूल रूप से यही था कि अगर खेलों के लिए बड़ा बजट उपलब्ध है, तो खिलाड़ियों को जरूरी सुविधाएं और पर्याप्त प्रशिक्षक क्यों नहीं मिल रहे? यह सवाल सिर्फ जबलपुर का नहीं है। यह पूरे प्रदेश की जिला स्तरीय खेल व्यवस्था की तस्वीर पर सवाल खड़ा करता है।
बालू सिंह यादव का तर्क, लेकिन सवाल बरकरार
खेल एवं युवा कल्याण विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर बालू सिंह यादव का कहना है कि नियमित सरकारी कोच भले कम हों, लेकिन विभाग ने संविदा पर अनुभवी प्रशिक्षकों को जोड़ा है। उनके मुताबिक इन्हीं प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में प्रदेश के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे हैं।
यह विभाग का पक्ष है। लेकिन असली सवाल इससे आगे है, क्या संविदा व्यवस्था को लंबे समय की स्थायी खेल नीति का आधार बनाया जा सकता है?
20 साल की सेवा, फिर भी स्थायित्व नहीं
कई प्रशिक्षक लंबे समय से संविदा व्यवस्था में काम कर रहे हैं। हर साल अनुबंध नवीनीकरण की स्थिति उनके सामने नौकरी की अनिश्चितता बनाए रखती है।
यह सिर्फ कर्मचारियों की समस्या नहीं है। इसका सीधा असर खिलाड़ी पर पड़ सकता है। जिस खिलाड़ी को चार-पांच साल लगातार एक प्रशिक्षक की निगरानी में तैयार होना है, उसकी प्रशिक्षण व्यवस्था बार-बार बदलती रहे तो प्रदर्शन की निरंतरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
द्रोणाचार्य सम्मान भी स्थायी व्यवस्था नहीं दिला सका
प्रदेश के एकमात्र द्रोणाचार्य सम्मान प्राप्त मलखंब प्रशिक्षक का संविदा व्यवस्था में होना इस पूरे सिस्टम का सबसे बड़ा विरोधाभास माना जा सकता है।
जिस प्रशिक्षक की उपलब्धि प्रदेश के लिए सम्मान है, अगर वही स्थायी सेवा ढांचे से बाहर है, तो सवाल सिर्फ एक पद का नहीं बल्कि खेल नीति की प्राथमिकता का है।
सारंग के दावों की असली परीक्षा मैदान में
मंत्री विश्वास सारंग खेल सुविधाओं, स्टेडियम और खेल गतिविधियों को बढ़ाने की दिशा में लगातार योजनाओं और घोषणाओं की बात करते रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी प्रदेश में खेलों की प्रगति और नई संभावनाओं को लेकर सरकार की उपलब्धियां गिनाते रहे हैं, लेकिन अब सवाल घोषणाओं की संख्या का नहीं, नतीजों की गुणवत्ता का है।
स्टेडियम बन सकता है। इवेंट कराया जा सकता है। करोड़ों रुपए खर्च किए जा सकते हैं। लेकिन खिलाड़ी को पदक तक पहुंचाने वाली रोज की मेहनत मैदान में कोच ही कराता है।
यही वजह है कि मध्यप्रदेश के खेल विभाग के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कितने इवेंट हुए? सवाल यह है कि कितने स्थायी, प्रशिक्षित और जवाबदेह कोचों के जरिए खिलाड़ियों की नई पीढ़ी तैयार हुई?
अगर इसका जवाब कमजोर है, तो करोड़ों की आयोजन चमक के बावजूद खेल व्यवस्था की असली तस्वीर अभी भी अधूरी है।
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