मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना पर खर्च शिक्षा बजट के 42 फीसदी के बराबर पहुंचा
महिला कैश ट्रांसफर योजना बजट पर कितना भारी पड़ रही है
दिल्ली में महिलाओं के खाते में हर महीने 2,500 रुपए आने शुरू हो गए हैं। एक अगस्त को शुरू हुई दिल्ली लक्ष्मी योजना का पहले ही दिन डेढ़ लाख से ज्यादा महिलाओं ने रजिस्ट्रेशन कराया। लेकिन एक सवाल पीछे छूट जाता है। यह पैसा आता कहां से है? इससे भी बड़ा सवाल ये कि उन राज्यों के क्या हाल हैं, जहां लंबे समय से ऐसी स्कीम चलाई जा रही है।
समझें क्या है मामला
देश के 12 राज्य अब महिलाओं को सीधे कैश ट्रांसफर दे रहे हैं। तीन साल पहले सिर्फ दो राज्यों में ऐसी स्कीम थी। रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर आधारित एक स्टडी बताती है कि झारखंड में यह खर्च राज्य के कुल बजट का 10 फीसदी तक पहुंच गया है।
आपसे क्यों जुड़ा है यह
अगर आप मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ में रहते हैं, तो यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। यह सीधा असर आपके बच्चे के स्कूल और आपके नजदीकी अस्पताल पर पड़ सकता है। जब एक स्कीम का बजट शिक्षा के आधे बजट के बराबर हो जाए, तो बाकी पैसा कहां से आएगा? यही सवाल अब अर्थशास्त्री और नीति बनाने वाले पूछ रहे हैं।
पहले क्या था हाल
महिलाओं को कैश देने का चलन नया नहीं है। 1994 में हरियाणा की अपनी बेटी अपना धन योजना से यह शुरुआत हुई थी। लेकिन तब की स्कीमें शर्तों वाली थीं, यानी बच्ची की पढ़ाई या टीकाकरण जैसी शर्त पूरी करने पर ही पैसा मिलता था।
2023 के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना ने यह ट्रेंड शुरू किया। इसके बाद कर्नाटक, महाराष्ट्र और अब दिल्ली तक हर राज्य बिना शर्त वाली कैश स्कीम लेकर आया। यानी अब महिला की उम्र और आय ही शर्त है, कोई और काम पूरा करने की जरूरत नहीं।
आंकड़े साफ तस्वीर दिखाते हैं
2025-26 में 12 राज्य मिलकर इन स्कीमों पर करीब 1.68 लाख करोड़ रुपए खर्च करने वाले हैं। यह रकम किसी छोटे देश के बजट के बराबर है।
लेकिन असल बात यह है कि राज्यों के पास पैसा बनाने के नए रास्ते सीमित हैं। 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 44 फीसदी राज्य खर्च तो पहले से ब्याज, पेंशन और वेतन में बंधा है। यानी नई स्कीम के लिए पैसा या तो कर्ज से आएगा या पुराने खर्चों में कटौती से।
झारखंड, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जहां यह स्कीम सबसे बड़ी है, वहां इसका खर्च शिक्षा बजट के आधे से भी ज्यादा है। सोचिए एक बार। अगर स्कूल के बजट का आधा हिस्सा एक ही स्कीम में चला जाए, तो नई कक्षाएं, नए शिक्षक, नई किताबें कहां से आएंगी?
महाराष्ट्र में एक बड़ी घटना इसी जोखिम की मिसाल है। लाड़की बहिन योजना के तहत जांच में 92 लाख महिलाएं अपात्र निकलीं। तब तक करीब 14,000 करोड़ रुपए उनके खातों में जा चुके थे। यह पैसा अब वापस लेना आसान नहीं।
फिर भी इसका एक दूसरा पहलू भी है। EAC-PM की एक स्टडी बताती है कि महाराष्ट्र में इस स्कीम से महिलाओं के बैंक बैलेंस में औसतन करीब 84 फीसदी का इजाफा हुआ। यानी पैसा असल में महिलाओं के हाथ में पहुंच रहा है, सिर्फ कागजों पर नहीं।
कौन-कौन है मैदान में
राज्य सरकारें इस स्कीम को महिला सशक्तीकरण का जरिया बताती हैं। विपक्षी दल इसे चुनावी 'रेवड़ी' कहकर निशाना साधते हैं। अर्थशास्त्री दोनों पक्षों के बीच खड़े हैं, वे स्कीम के फायदे को मानते हैं लेकिन दीर्घकालिक असर पर सवाल उठाते हैं। और आम महिलाएं, जिन्हें यह पैसा सीधे मिलता है, वे इसे रोजमर्रा के खर्च और बच्चों की जरूरतों में लगाती हैं।
दोनों तरफ की दलील
कुछ जानकार मानते हैं कि यह स्कीम राज्य की उस नाकामी की भरपाई है जो महिलाओं को रोजगार के मौके नहीं दे पाई। चुनाव से ठीक पहले शुरू होने की वजह से इसे 'दान' भी कहा जाता है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि हाल में हुए विरोध प्रदर्शन बताते हैं कि लोग अब सिर्फ भरपाई से संतुष्ट नहीं हैं, वे संसाधनों में बराबर हिस्सेदारी मांग रहे हैं।
समर्थकों का कहना है कि पैसा सीधे महिला के खाते में जाने से घर के फैसलों में उसकी भागीदारी बढ़ती है। आलोचकों की दलील है कि बिना शर्त पैसा देने से स्किल डेवलपमेंट या रोजगार जैसी असली समस्या अनसुलझी रह जाती है।
MP और CG की तस्वीर
मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना जून 2023 में 1,000 रुपए महीने से शुरू हुई थी। दिवाली 2025 के बाद यह बढ़कर 1,500 रुपए हो गई। लेकिन इसकी कीमत भी साफ दिखती है। यह स्कीम राज्य के कुल खर्च का 5.44 फीसदी है। यह शिक्षा बजट के 42 फीसदी के बराबर है। और स्वास्थ्य बजट से तुलना करें तो यह लगभग 99 फीसदी तक पहुंच जाती है, यानी लगभग पूरे स्वास्थ्य बजट के बराबर।
क्यों बढ़ रहा है बोझ, और क्यों घट रही है लिस्ट
आंकड़े देखिए तो तस्वीर साफ है। 2025-26 के बजट में लाड़ली बहना (Ladli Behna Yojana) के लिए 18 हजार 669 करोड़ रुपए रखे गए थे। 2026-27 में यह आंकड़ा 23 हजार 882 करोड़ रुपए हो गया। यानी सिर्फ एक साल में करीब 28 फीसदी की वृद्धि। कुल मिलाकर महिला कल्याण से जुड़ी योजनाओं पर मध्य प्रदेश अब सालाना 1 लाख 27 हजार 555 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि इतना बड़ा खर्च आ कहां से रहा है? राज्य का कुल बजट 2026-27 में 4 लाख 38 हजार 317 करोड़ रुपए का है। यानी हर 100 रुपए के बजट में से करीब साढ़े पांच रुपए सिर्फ इस एक योजना पर जाते हैं। पहले से प्रकाशित एक डेटा विश्लेषण के अनुसार, 2025-26 में यह खर्च राज्य के शिक्षा बजट के करीब 42 फीसदी और स्वास्थ्य बजट के करीब 99 फीसदी के बराबर बैठता था।
और यहीं से मामला दिलचस्प हो जाता है। जिस तरफ बजट बढ़ रहा है, उसी तरफ लाभार्थियों की संख्या घट भी रही है। पिछले ढाई साल में साढ़े पांच लाख से ज्यादा महिलाओं के नाम योजना से हट चुके हैं। अकेले इंदौर जिले में 19 हजार से ज्यादा नाम कटे। कुछ नाम उम्र 60 साल पार करने की वजह से हटे। कुछ ई-केवाईसी पूरी न होने की वजह से। कुछ महिलाओं ने खुद ही लाभ छोड़ दिया।
सोचिए एक बार...
अगर योजना का बजट लगातार बढ़ रहा है, तो नए रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं खुल रहे? पिछले तीन साल से मध्य प्रदेश में इस योजना में नया पंजीयन बंद है। जो महिलाएं 2023 में उम्र या दस्तावेज की वजह से छूट गई थीं, वे अब तक इंतजार में हैं।
छत्तीसगढ़ की महतारी वंदन योजना (Chhattisgarh Mahtari Vandan Yojana) मार्च 2024 में शुरू हुई, 1,000 रुपए महीने की दर से। यह राज्य खर्च का 3.34 फीसदी, शिक्षा बजट का 21.40 फीसदी और स्वास्थ्य बजट का 60.40 फीसदी है। और यहीं से मामला दिलचस्प हो जाता है। छत्तीसगढ़ में हाल में असेंबली में यह मुद्दा गरमाया, जब सरकार ने बताया कि पात्रता जांच में 1.55 लाख महिलाओं के नाम सूची से हटाए गए।
आगे क्या होगा
आने वाले महीनों में यह देखना जरूरी होगा कि राज्य सरकारें इन स्कीमों की पात्रता जांच कितनी सख्ती से करती हैं। जिन राज्यों में राजस्व घाटा पहले से है, वहां दबाव और बढ़ेगा। असली सवाल यह रहेगा कि क्या राज्य शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च घटाए बिना इन स्कीमों को चला पाएंगे, या फिर आने वाले बजट में कोई कटौती दिखेगी।
वो बात जो पता नहीं थी
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि यह स्कीम सिर्फ वोट के लिए है। लेकिन डेटा कुछ और कहता है। EAC-PM की स्टडी में सामने आया कि यह पैसा ज्यादातर बचत और खर्च दोनों में बदल रहा है, ना कि सिर्फ खर्च होकर गायब हो रहा है। यानी असर सिर्फ राजनीतिक नहीं, आर्थिक भी है।
अब आप क्या करें: अपने राज्य के बजट दस्तावेज में देखें कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किस दिशा में जा रहा है।
क्यों अभी: नया वित्तीय वर्ष शुरू होते ही राज्यों के बजट आवंटन सामने आएंगे।
आगे देखें: मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अगले बजट सत्र में स्वास्थ्य-शिक्षा आवंटन पर नजर रखें।
यह खबर क्यों जरूरी है?
संविधान के अनुच्छेद 41 और 47 राज्य को शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं। जब एक कल्याणकारी स्कीम इन्हीं क्षेत्रों के बजट को दबाने लगे, तो यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत से टकराव पैदा करता है। पारदर्शिता और जवाबदेही के लिहाज से भी यह जरूरी है कि जनता को पता हो कि कर का पैसा कहां जा रहा है, ताकि लोकतांत्रिक बहस सूचित आधार पर हो सके।
स्रोत
- मूल डेटा पॉइंट लेख (Dipa Sinha, Vijay Ram S, RBI डेटा आधारित, Centre for Study of the Indian Economy, Azim Premji University)
- PRS Legislative Research डेटा
FAQ
- सवाल 1: भारत में कितने राज्यों में महिला कैश ट्रांसफर योजना है?
2025-26 तक 12 से ज्यादा राज्यों में ऐसी स्कीम चल रही है, जबकि तीन साल पहले सिर्फ दो राज्यों में थी। - सवाल 2: मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना में कितना पैसा मिलता है?
मध्य प्रदेश में पात्र महिलाओं को अभी हर महीने 1,500 रुपए मिलते हैं, जो जून 2023 में 1,000 रुपए से शुरू हुई थी। - सवाल 3: क्या लाड़ली बहना योजना जैसी स्कीम शिक्षा और स्वास्थ्य बजट को प्रभावित करती है?
हां, कुछ राज्यों में इन स्कीमों पर खर्च शिक्षा और स्वास्थ्य बजट के आधे से भी ज्यादा पहुंच गया है, जिससे विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं।
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