MP मेडिकल यूनिवर्सिटी में बिना टेंडर 2.86 करोड़ का भुगतान, ऑडिट रिपोर्ट से खुली पोल
मध्यप्रदेश की एकमात्र मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी जबलपुर की वित्तीय गड़बड़ियों की परतें अब एक-एक कर खुल रही हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग (CAG - Comptroller and Auditor General) की आपत्तियों के बाद अब लोकल फंड ऑडिट में भी बड़ा खुलासा हुआ है। ऑडिट ने यह मामला गंभीर वित्तीय नियंत्रण विफलता मानते हुए जिम्मेदारों की जांच और वसूली के निर्देश दिए हैं।
बिना टेंडर काम दिया, 2.86 करोड़ ज्यादा भुगतान
2020-21 में यूनिवर्सिटी ने बिना खुली टेंडर प्रक्रिया अपनाए कंपनी हाइटेक्स को आउटसोर्स सेवाओं का काम दे दिया था। इस गड़बड़ी का सिलसिला पांच साल तक जारी रहा। इस दौरान तय देय राशि से दो करोड़ 86 लाख रुपए से अधिक का अतिरिक्त भुगतान होता रहा।
यह गड़बड़ी एक बार नहीं, बल्कि कई वर्षों तक जारी रही। आंतरिक जांच में भी इस पर आपत्ति नहीं आई। वित्तीय निगरानी प्रणाली निष्क्रिय रही और भुगतान रोकने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
न कैशबुक, न कॉलेजों से वसूली
यूनिवर्सिटी में 2020-21 से 2025-26 के बीच अप्रैल-मई तक के भुगतान अभिलेखों की जांच में पाया गया कि वेतन गणना में त्रुटियां और वित्तीय विवरण में असंगतियां थीं। इस पूरे अवधि में न कैशबुक सही रखी गई और न ही संबद्ध कॉलेजों से करोड़ों की वसूली हुई।
यूनिवर्सिटी से जुड़े 531 कॉलेजों से एंडोमेंट फंड (Endowment Fund) की वसूली नहीं की गई। यह राशि राज्य की छात्रों और शिक्षकों के हित के लिए होती है। 2017-18 से 2022-23 तक 18 प्रतिशत जीएसटी (GST - Goods and Services Tax) भी नहीं लिया गया, जिससे बकाया राशि 15 करोड़ 33 लाख रुपए तक पहुंच गई।
80 प्रतिशत से अधिक पद खाली, काम आउटसोर्स पर
यूनिवर्सिटी में 275 स्वीकृत पदों में से 184 रिक्त हैं। यानी 80 प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हैं। रेक्टर, प्रशासनिक और वित्त अधिकारी सहित 16 पद नहीं भरे गए। इसका सीधा असर परीक्षा, रिजल्ट और डिग्री वितरण पर पड़ा।
इन खाली पदों की आड़ में महत्वपूर्ण काम आउटसोर्स कर्मचारियों से कराए जाते रहे। 12 नियमित कर्मचारियों को लूप लाइन में बैठाया गया जबकि एचआईटीईएस (HIITES) कंपनी को 84 लाख 19 हजार रुपए का भुगतान किया गया।
पांच साल तक पूरा लेखा-जोखा तैयार नहीं हुआ
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पांच साल तक पूरा लेखा-जोखा तैयार नहीं हुआ। संबद्ध कॉलेजों से करोड़ों की वसूली लंबित रही लेकिन आउटसोर्स कंपनी को भुगतान होता रहा। कार्यपरिषद से पास कराके ही सारे पेमेंट किए गए।
यूनिवर्सिटी के कुलगुरु डॉ. अशोक खंडेलवाल ने इस पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जो आपत्ति आई है उसका जवाब दे रहे हैं और सरकार का पैसा सरकार के उपक्रम में ही खर्च हुआ है।
ऑडिट ने माना, वित्तीय नियंत्रण पूरी तरह फेल
ऑडिट रिपोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीर वित्तीय नियंत्रण विफलता करार दिया है। कैग की आपत्तियों के बाद भी सुधार नहीं हुआ। लोकल फंड ऑडिट ने अब जिम्मेदार अधिकारियों की जांच और वसूली के निर्देश दिए हैं। यह देखना बाकी है कि इन निर्देशों पर कब और कितनी तेजी से कार्रवाई होती है।
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