मेडिकल यूनिवर्सिटी के ई-मूल्यांकन सॉफ्टवेयर में खामियां, जांचकर्ता की मर्जी से मिल रहे नंबर!
News in short
- मेडिकल यूनिवर्सिटी के वैल्यूएशन सॉफ्टवेयर में लूपहोल
- सही उत्तर दिखाकर दे रहे शून्य और गलत दिखाकर मिल रहे नंबर
- एक मूल्यांकन में 3 नंबर तो दूसरे में 0; विषय विशेषज्ञों की योग्यता पर उठे सवाल।
- एक OMR शीट जांचने के मिलते हैं 50 रूपये, ज्यादा से ज्यादा शीट निपटा रहे मूल्यांकनकर्ता
- डिजिटल पेन का उपयोग और सॉफ्टवेयर में अनिवार्य मार्किंग सिस्टम लागू करने के सुझाव।
News in detail
मध्यप्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी (MPMSU) की मूल्यांकन प्रणाली पर हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने पाया कि यूनिवर्सिटी जिस सॉफ्टवेयर से ओएमआर शीट (omr sheet) जांची जा रही है, उसमें भारी कमियां है। कोर्ट ने इसे 'गलत प्रैक्टिस' मानते हुए सॉफ्टवेयर की पूरी कार्यप्रणाली पर रिपोर्ट तलब की है।
OMR शीट के डिजिटल वैल्यूएशन में गड़बड़ झाला
जबलपुर हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता अमरजीत भारद्वाज द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान मेडिकल यूनिवर्सिटी की कार्यप्रणाली की परतें उधड़ गईं। याचिका में यूनिवर्सिटी द्वारा कॉपियों के गलत मूल्यांकन और सॉफ्टवेयर की खामियों को चुनौती दी गई थी।
मामले की पिछली सुनवाई के आदेशों का पालन करते हुए एग्जामिनेशन कंट्रोलर और सॉफ्टवेयर प्रदाता कंपनी के प्रतिनिधि कोर्ट में पेश हुए, जहां सॉफ्टवेयर का लाइव डेमो और जानकारी साझा की गई। जिसमें कोर्ट के सामने चौंकाने वाले खुलासे हुए।
सही उत्तर पर 'शून्य' और गलत पर 'नंबर' का अजूबा
कोर्ट के सामने जब सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली रखी गई, तो चौंकाने वाली विसंगतियां दिखीं। सॉफ्टवेयर में राइट और रॉन्ग टिक करने का विकल्प तो है, लेकिन यह अनिवार्य (Mandatory) नहीं है।
इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ जगह उत्तरों को सही बताने के बावजूद छात्रों को बिल्कुल नंबर नहीं दिए गए, वहीं कुछ जगह गलत दिखाए उत्तरों पर आंशिक अंक दे दिए गए। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि सॉफ्टवेयर में दिए गए इस 'लूपहोल' का फायदा उठाकर जांचकर्ता मनमाफिक तरीके से नंबर बांट रहे हैं।
जांचकर्ताओं की 'मनमानी' और 50 रुपए का गणित
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि एक OMR शीट का मूल्यांकन करने के लिए जांचकर्ता को 50 रूपये का भुगतान किया जाता है। हालांकि, जांचकर्ता किसी प्रश्न पर आंशिक अंक (Partial Marks) क्यों दे रहा है, इसका कारण लिखने का कोई प्रावधान या बाध्यता नहीं है।
इस कारण से ही मूल्यांकन जल्दबाजी में किया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा शीट निपटाई जा सकें। कोर्ट ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बिना किसी ठोस आधार या डिजिटल मार्किंग के यह पता लगाना असंभव है कि नंबर किस आधार पर दिए गए हैं।
यूनिवर्सिटी का दावा बनाम कड़वी हकीकत
विश्वविद्यालय की ओर से तर्क दिया गया कि वे 'डबल वैल्यूएशन' कराते हैं और दोनों में से जो अधिक नंबर होते हैं, वही छात्र को दिए जाते हैं। लेकिन याचिकाकर्ता की ओर से इस दावे की हवा निकाल दी गई।
कोर्ट को बताया गया कि यूनिवर्सिटी विषय विशेषज्ञों से जांच कराने का दावा करती है, लेकिन विसंगति का आलम यह है कि पहले मूल्यांकन में छात्र को 3 नंबर मिलते हैं और दूसरे में सीधे 0। इसके साथ ही इसका कोई भी फिजिकल रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। यह दर्शाता है कि मूल्यांकन की प्रक्रिया कितनी त्रुटिपूर्ण है।
हाईकोर्ट के कड़े निर्देश और सुधार के सुझाव
जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजनल बेंच ने इस पूरी प्रक्रिया को दोषपूर्ण माना है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि इसमें 'डिजिटल पेन' का विकल्प होना चाहिए ताकि स्कैन कॉपी पर स्पष्ट दिख सके कि जांचकर्ता ने किस भाग पर अंक दिए हैं।
साथ ही, सही/गलत का निशान लगाना अनिवार्य करने को कहा है। अब अगली सुनवाई में यूनिवर्सिटी को यह बताना होगा कि सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
ये खबरें भी पढ़ें...
ESB की ANM भर्ती पर हाईकोर्ट का आदेश, याचिकाकर्ताओं के दस्तावेज करें मान्य
इंदौर का वंदे मातरम् विवाद: फौजिया के पति शेख अलीम और महापौर की साजिश? किसने लगाए आरोप
चित्रकूट में 500 पांडुलिपियां मिलीं, उर्दू पांडुलिपि में श्रीकृष्ण के कालिया मर्दन का मिला वर्णन
एमपी की सरकारी जमीन गई तो जिम्मेदार अधिकारी की जेब से होगी भरपाई