OBC आरक्षण केस से एसटी क्यों नाराज, 50% अनारक्षित रखने से एसटी-एससी को क्यों लाभ
जबलपुर हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण केस की अंतिम सुनवाई चल रही है। सामान्य वर्ग ने अपना पक्ष रख दिया है। अब शासन और ओबीसी वर्ग को अपनी बात रखनी है। लेकिन इसी बीच बुधवार को नया फ्रंट खुल गया।
इसमें एसटी कैटेगरी की ओर से पक्ष रखते हुए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का विरोध कर दिया गया। आगे जाकर मामला एससी कैटेगरी का भी उलझेगा और वह भी इसके पक्ष में नहीं है।
अभी MP में क्या है आरक्षण की स्थिति
कमलनाथ सरकार ने OBC आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27% कर दिया था। इसके साथ ही मध्यप्रदेश की भर्तियों में यह आरक्षण लागू हो गया।
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 27%
- अनुसूचित जनजाति (ST): 20%
- अनुसूचित जाति (SC): 16%
- आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS): 10%
इस तरह कुल आरक्षण 73 फीसदी हो गया और अनारक्षित के लिए 27 फीसदी ही पद रह गए, जो पहले 40 फीसदी थे। वहीं, विविध केस में फैसले के बाद ओबीसी आरक्षण को 14 फीसदी तक ही सीमित रखा गया। साथ ही, 13 फीसदी पद होल्ड कैटेगरी में चले गए थे।
सरकार ने सितंबर 2022 में तय किया कि 13 फीसदी पदों पर जब आरक्षण पर फैसला आ जाएगा तब उन्हें अनहोल्ड करेंगे। यदि ओबीसी आरक्षण मान्य होता है तो यह ओबीसी के पक्ष में, नहीं तो फिर अनारक्षित कैटेगरी में चले जाएंगे।
अब क्यों कैटेगरी वाले विरोध कर रहे हैं
अभी मध्यप्रदेश में एसटी को 20 फीसदी और एससी को 16 फीसदी, कुल 36 फीसदी आरक्षण है। इसके बावजूद, देश के साथ मप्र में भी मेरिट के आधार पर भर्ती का नियम है। यदि किसी कैटेगरी वाले (एसटी, एससी, ओबीसी) ने अपनी कैटेगरी के कट-ऑफ अंकों या उम्र सीमा जैसी छूट का लाभ नहीं लिया है, तो वह मेरिट में अधिक अंक आने पर अनारक्षित कैटेगरी की सीट ले सकता है।
यानी वह उम्मीदवार अनारक्षित में शिफ्ट होगा और उसकी जगह की सीट उसी कैटेगरी के ही अन्य उम्मीदवार को मेरिट के आधार पर मिल जाएगी। इससे एसटी और एससी कैटेगरी को बड़ा लाभ यह है कि उन्हें उनकी कैटेगरी में तय आरक्षित सीट तो मिलती ही है, साथ ही किसी के मेरिट में अनारक्षित में जाने पर अतिरिक्त सीट भी मिलती है। वहीं, यदि आरक्षित सीटें घटकर केवल 27 फीसदी रह जाएंगी तो ऐसे में उन्हें भी मिलने वाला अतिरिक्त लाभ कम हो जाएगा। इसलिए वह नहीं चाहते हैं कि अनारक्षित का कोटा कम हो।
ओबीसी भी इसी तरह मेरिट से ऊपर जाते हैं
यही लाभ ओबीसी और ईडब्ल्यूएस वाले भी लेते हैं। हाल-फिलहाल तो देखने में आ रहा है कि अनारक्षित कैटेगरी में 60 फीसदी से ज्यादा सीटें ओबीसी और ईडब्ल्यूएस कैटेगरी वालों को जा रही हैं। जैसे असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास में तो 10 अनारक्षित सीटों में से केवल एक ही महिला उम्मीदवार को मिली, बाकी आरक्षित कैटेगरी में गई। इसी तरह फूड सेफ्टी ऑफिसर का पद हो या अन्य पद, हर परीक्षा में यही स्थिति सामने आ रही है।
यही लाभ ओबीसी और ईडब्ल्यूएस वाले भी लेते हैं। हाल फिलहाल तो देखने में आ रहा है कि अनारक्षित कैटेगरी में 60 फीसदी से ज्यादा सीटें ओबीसी और ईडब्ल्यूस कैटेगरी वालों को जा रही है। जैसे असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास में तो 10 अनारक्षित सीट में केवल एक ही महिला उम्मीदवार को मिली, बाकी कैटेगरी में गई। इसी तरह फूड सेफ्टी आफिसर पद हो या अन्य पद। हर परीक्षा में यही स्थिति सामने आ रही है।
कमलनाथ सरकार साथ में ये नियम भी लाई थी
जब कमलनाथ सरकार ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण किया, तो उन्होंने साथ में एक और नियम लागू किया था। वह यह था कि जो जिस कैटेगरी में है, वह वहीं रहेगा। यानी ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण तो मिलेगा, लेकिन यदि किसी के अंक अनारक्षित में जाने लायक आते हैं, तो भी वह अनारक्षित में नहीं जाएगा।
यानी कैटेगरी के हिसाब से सीट तय रहेंगी और मेरिट के आधार पर शिफ्टिंग नहीं होगी। वहीं, इस नियम को अल्ट्रा वायरस घोषित किया गया और हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। वहीं 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण का केस कानूनी पेंच में फंस गया है।
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