27% OBC आरक्षण पर सरकार करती रही विचार, यूथ फॉर इक्वलिटी की सुप्रीम कोर्ट में कैविएट, अब एकतरफा स्टे की राह मुश्किल
2019 में लिया था 27 प्रतिशत करने का फैसला
मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला वर्ष 2019 में लिया गया था। इसके बाद इस व्यवस्था की संवैधानिक वैधता को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। मामला कई वर्षों तक चला और 87:13 के फॉर्मूले के कारण सरकारी भर्तियों में 13 प्रतिशत पद होल्ड रखे गए। इस दौरान अभ्यर्थियों को नियुक्तियों और परिणामों का इंतजार करना पड़ा।
92 सुनवाइयों के बाद हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला
इस मामले में 92 बार सुनवाई सूचीबद्ध हुई थी। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष डिवीजन बेंच ने 5 अगस्त को अंतिम सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था। इसके बाद 9 अक्टूबर को आए फैसले में हाई कोर्ट ने 27 प्रतिशत OBC आरक्षण बढ़ाने वाले कानून को असंवैधानिक मानते हुए निरस्त कर दिया। कोर्ट ने OBC आरक्षण को 14 प्रतिशत रखने और 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर पात्र अनारक्षित अभ्यर्थियों को तीन महीने में नियुक्ति देने के निर्देश दिए।
सरकार का अगला कदम क्या होगा?
हाई कोर्ट के फैसले के बाद सरकार के सामने अब आगे की कानूनी रणनीति तय करने का सवाल है। 'द सूत्र' ने 9 अक्टूबर की रिपोर्ट में बताया था कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में फैसले को चुनौती देने के विकल्प पर विचार कर सकती है। हालांकि, अपील दायर करने की आधिकारिक पुष्टि सामने आना जरूरी है। सरकार के विचार-विमर्श के बीच यूथ फॉर इक्वलिटी की कैविएट इस विवाद का नया घटनाक्रम है।
कैविएट से क्या बदलेगा?
कैविएट दायर करने का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि संबंधित मामले में कोई पक्ष सुप्रीम कोर्ट से राहत मांगता है, तो कैविएट दाखिल करने वाले पक्ष को भी सुनवाई का अवसर मिले। ऐसे में यदि सरकार हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर कर अंतरिम स्थगन की मांग करती है, तो यूथ फॉर इक्वलिटी अदालत के सामने अपना पक्ष रखने का अवसर मांग सकेगी। इससे बिना दूसरे पक्ष को सुने एकतरफा राहत मिलने की संभावना पर कानूनी प्रक्रिया के तहत अंकुश लग सकता है।
अब एकतरफा स्टे लेना आसान नहीं
कैविएट का सीधा असर संभावित सुनवाई की प्रक्रिया पर पड़ेगा। सरकार के लिए केवल अपील दाखिल कर तत्काल एकतरफा स्थगन हासिल करना आसान नहीं होगा, क्योंकि कैविएट के जरिए दूसरे पक्ष ने पहले ही अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की व्यवस्था की है। हालांकि, कैविएट का मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट स्थगन दे ही नहीं सकता। अदालत दोनों पक्षों को सुनने के बाद अंतरिम राहत देने या न देने का फैसला कर सकती है।
अब सरकार और याचिकाकर्ताओं की रणनीति पर नजर
फिलहाल इस घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यह है कि सरकार के अगले कदम से पहले यूथ फॉर इक्वलिटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करने की पहल की है। यदि सरकार अपील करती है, तो आरक्षण की संवैधानिक वैधता, हाई कोर्ट के निर्देशों और अंतरिम राहत की मांग पर नई सुनवाई हो सकती है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार कब और किन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख करती है और शीर्ष अदालत मामले में आगे क्या प्रक्रिया अपनाती है।
FAQ:
- मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण को 27 प्रतिशत करने का निर्णय कब लिया गया था?
मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण को 27 प्रतिशत करने का निर्णय वर्ष 2019 में लिया गया था। - हाई कोर्ट ने OBC आरक्षण को 27 प्रतिशत करने वाला कानून क्यों निरस्त किया?
हाई कोर्ट ने 9 अक्टूबर को OBC आरक्षण को 27 प्रतिशत करने वाला कानून असंवैधानिक मानते हुए निरस्त किया, और 14 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को बरकरार रखा। - सरकार के अगली कानूनी रणनीति क्या हो सकती है?
सरकार द्वारा हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने पर विचार किया जा रहा है, हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।