GAD पोर्टल पर 56 अफसरों ने छिपाई अचल संपत्ति, IPR में खाली फॉर्म का खेल
समझें क्या है मामला...
- मध्यप्रदेश में हर सरकारी अफसर को हर साल 31 जनवरी तक अचल संपत्ति का ब्योरा देना होता है।
- दिसंबर 2025 तक 23 प्रशासनिक, 29 मंत्रालयी और 4 आबकारी अफसरों ने IPR जमा नहीं किया है।
- जिन्होंने फॉर्म भरा, उन्होंने भी कीमत, क्षेत्रफल और बेचने वाले का नाम नहीं लिखा है।
- कई अफसरों ने तो सिर्फ नाम और साइन कर खाली फॉर्म अपलोड कर दिया है।
- GAD की विजिलेंस यूनिट ने न कोई नोटिस दिया, न कोई कार्रवाई की।
MP के अफसरों की संपत्ति राज
मध्यप्रदेश में सरकारी अफसरों की तनख्वाह बढ़ रही है। संपत्ति भी बढ़ रही है, लेकिन जब बात उसे सार्वजनिक करने की आती है, तो कलम रुक जाती है।
राज्य सरकार का नियम साफ है। हर साल 31 जनवरी तक सभी श्रेणी के लोकसेवकों को अपनी अचल संपत्ति का ब्योरा देना होता है। यह ब्योरा GAD (General Administration Department) के पोर्टल mpsparrow.gov.in पर डालना होता है।
वहीं, द सूत्र की पड़ताल में जो सामने आया, वो चौंकाने वाला है।
कौन नहीं भर रहा IPR?
अचल संपत्ति की जानकारी देने में उदासीनता दिखाने वाले अधिकारियों की संख्या बढ़ रही है। 2021 में राज्य प्रशासनिक सेवा के 14 अधिकारियों ने आईपीआर जमा नहीं किया था। 2022 में ऐसे अधिकारियों की संख्या 12 थी, लेकिन 2023 में यह आंकड़ा 20 पर पहुंच गया।
वहीं 2024 में यह संख्या 2022 के मुकाबले करीब तीन गुना यानी 34 हो गई। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार द्वारा ऐसे अधिकारियों पर सख्ती नहीं दिखाई जा रही है। यही वजह है कि अधिकारी एक-दूसरे को देखकर अचल संपत्ति की जानकारी देने से बच रहे हैं।
दिसंबर 2025 तक के आंकड़े देखें, तो राज्य प्रशासनिक सेवा के 459 अफसरों में से 23 ने IPR (Immovable Property Return) ही नहीं भरा है। इनमें डिप्टी कलेक्टर, DSP (Deputy Superintendent of Police) और तहसीलदार स्तर के अफसर शामिल हैं।
मंत्रालय में भी यही हाल है। 73 अफसरों में से 29 ने फॉर्म ही नहीं भरा। आबकारी विभाग के 26 प्रथम श्रेणी (क्लास-1) अफसरों में से 4 को भी यह याद नहीं रहा।
कुल मिलाकर 56 से ज्यादा अफसरों ने IPR अपलोड नहीं किया है।
2021 के IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
सामान्य प्रशासन विभाग के अनुसार 2021 में राज्य प्रशासनिक सेवा के 14 अधिकारियों ने आईपीआर जमा नहीं किया था। अपर कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, ज्वाइंट कलेक्टर रैंक के अधिकारियों में संजू कुमारी, मंशाराम पटेल, विवेक सिंह, मनोज मालवीय, पीयूष दुबे, भूपेन्द्र सिंह कुशवाह, आरसी खतेडिया, आरके सिन्हा, अनिल सपकाले, मायाराम कोल, संजीव कुमार नागू, सुधीर कुमार जैन, भूपेन्द्र रावत और अनुभा जैन शामिल हैं।
2022 के IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
साल 2022 में आईपीआर जमा नहीं करने वाले अधिकारियों की संख्या 12 रही। राज्य प्रशासनिक सेवा का दायित्व संभालने वाले ऐसे अधिकारियों में संजू कुमारी, मंशाराम पटेल, विवेक सिंह, संदीप कुमार सोनी, गणेश कुमार जायसवाल, अखिलेश कुमार सिंह, अनिल सपकाले, मायाराम कोल, भारती देवी मिश्रा, भूपेन्द्र रावत, रोहित भामोर और अनुभा जैन हैं।
2023 के IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
जबकि 2023 में राज्य प्रशासनिक सेवा के 20 अधिकारियों ने अचल संपत्ति का ब्यौरा सामान्य प्रशासन विभाग को नहीं सौंपा। इनमें मंशाराम पटेल, विवेक सिंह, प्रतुल चंद्र सिन्हा, नरेन्द्र नाथ पांडेय, अखिलेश कुमार सिंह, अनिल भाना, अनिल सपकाले, अशोक कुमार मांझी, हेमलता सोलंकी, राजीव कुमार समाधिया, ऋषभ कुमार जैन, सुधीर कुमार जैन, अभिषेक चौरसिया, अक्षय सिंह मरकाम, आरती यादव, भूपेन्द्र रावत, निधि सिंह गोहेल, संघमित्रा बौद्ध, अनुभा जैन और अभिषेक सिंह शामिल हैं।
2025 के IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
जबकि 2024 में आईपीआर जमा न करने वाले अधिकारियों की संख्या बढ़कर 34 पहुंच गई। इनमें मंशाराम पटेल, विवेक सिंह, सुनील दुबे, भूपेन्द्र सिंह कुशवाह, कमलेश कुमार भार्गव, शैली कनाश, शैलेन्द्र सिंह, आरके सिन्हा, अनिल बनवारिया, प्रमोद कुमार सेनगुप्ता, सत्येन्द्र प्रसाद सिंह, सुनील कुमार शुक्ला, अखिलेश कुमार सिंह, अनिल कुमार सोनी, अनिल सपकाले, हुनेन्द्र घोमरे, रामबाबू सिंदोसकर, संतोष कुमार तिवारी, शिवलाल शाक्य, भूपेन्द्र रावत, दिव्या पटेल, नेहा सोनी, निधि सिंह गोहेल, शिवानी गर्ग, अनुभा जैन, रवि वर्मा, निकिता मंडलोई, अंकित उइके, ज्योति लिलहारे, पवन गुरैया, पूजा सोनी, प्रशांत उइके, प्रिया अग्रवाल और रोहित रानावत शामिल हैं।
2025 तक IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
2025 में आईपीआर जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों में मंशाराम पटेल (1994), विवेक सिंह, नारायण प्रसाद नामदेव, कैलाश बुंदेला, जितेन्द्र सिंह चौहान, कमलेश कुमार भार्गव, संतोष कुमार टैगोर, आशीष कुमार पाठक, रोहन सक्सेना, अरविंद कुमार झा, नरेन्द्र नाथ पांडेय, सुनील कुमार शुक्ला, अजित तिर्की, अखिलेश कुमार सिंह, अनिल कुमार सोनी, कमल सोलंकी, भूपेन्द्र रावत, राजेश शाह, अंकित उइके, प्रिया अग्रवाल, एकता अग्रवाल, कल्पेश सिंघई, राजेश दत्त शर्मा नाम शामिल हैं।
2025 तक IPR जमा न करने वाले आबकारी अधिकारी
2025 में आईपीआर जमा न करने वाले आबकारी अधिकारियों में सत्य नारायण दुबे, वीके सक्सेना, रविन्द्र मानिकपुरी, शैलेष जैन नाम शामिल हैं।
2025 तक आईपीआर जमा न करने वाले मंत्रालयीन सेवा के अधिकारी
2025 में आईपीआर जमा न करने वाले मंत्रालयीन सेवा के अधिकारियों में कलिस्टा कुजूर, सीएल पुण्डे, इंदू शर्मा, जयराज विलियम, कैलाश सोलंकी, करण सिंह सोलंकी, एलएस धुर्वे, मनोहर छटवानी, प्रभुलाल काशदेकर, रमेशबाबू माहोर, सुरेश जसवानी, सुनील मडावी, सुरेश कुमार दिनकर, उमराव सिंह, विनोद कुरसांगे, मंजू शर्मा, दीपक प्रसाद तिवारी, जयकुमार पटेल, अजय शर्मा, सन्नी बघेल, विनीश गर्ग, महेन्द्र कुमरे, पुष्पेन्द्र कुमार गौतम, राजेश गजभिए, संजय सिंह चौहान, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, स्वयंप्रकाश त्रिपाठी, संगीता झाडे।
फॉर्म में क्या पूछा जाता है?
GAD ने फॉर्म बहुत विस्तृत बनाया है, जिसमें 12 कॉलम हैं।
अफसर को शहर का नाम लिखना होता है। प्लॉट, मकान या खेत बताना होता है। क्षेत्रफल दर्ज करना होता है। कब खरीदा, कितने में खरीदा और अब बाजार में क्या कीमत है, यह भी बताना होता है।
संपत्ति किसके नाम पर है, वह खरीदी गई है, गिफ्ट में मिली है या पुश्तैनी है, यह भी पूछा जाता है। बेचने वाले का नाम और सालाना कमाई भी मांगी जाती है।
वहीं, इतने सवालों के बाद भी साहब लोग संक्षेप में निपटा देते हैं।
तीन तरह के खेल
द सूत्र ने mpsparrow.gov.in पोर्टल को खंगाला। वहां तीन तरह के पैटर्न मिले।
पहला- जिन्होंने IPR भरा ही नहीं। दूसरा- जिन्होंने आधी-अधूरी जानकारी दी और तीसरा- जिन्होंने सिर्फ खाली फॉर्म अपलोड कर दिया।
मजे की बात यह है कि ये तीनों ही श्रेणियों के अफसर कार्रवाई से बचे हुए हैं। न निलंबन, न विभागीय जांच, न ही वेतन रोका गया।
किस कॉलम में सबसे ज्यादा धोखा?
जो अफसर फॉर्म भरते भी हैं, वे भी चालाकी करते हैं। सबसे ज्यादा खाली छूटने वाला कॉलम है- कीमत।
संपत्ति की खरीद कीमत और मौजूदा बाजार भाव दोनों गायब रहते हैं। बेचने वाले का नाम भी नहीं लिखते। सालाना कमाई पर पूरी चुप्पी रहती है।
यानी प्रॉपर्टी है, लेकिन उससे कमाई होती है या नहीं, यह बताना साहब को 'निजता का हनन' लगता है।
नियम तो है, पर चलता नहीं
मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम 1965 का नियम 19 बहुत सख्त है। इसके मुताबिक IPR न देने पर प्रमोशन रुक सकता है, इंक्रीमेंट बंद हो सकता है, विभागीय जांच हो सकती है, विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं मिलेगी और नई पोस्टिंग भी लटक सकती है।
कागज पर डंडा बहुत सख्त है।
लेकिन जमीन पर? GAD की विजिलेंस यूनिट ने आज तक किसी का प्रमोशन नहीं रोका और न ही किसी को नोटिस दिया। इसीलिए अफसरों को भी डर नहीं है।
नतीजा यह है कि IPR भरना या न भरना, सब बराबर है।
GAD की विजिलेंस खुद निगरानी से बाहर
GAD की विजिलेंस यूनिट का काम था कि वह हर साल 31 जनवरी के बाद जांच करे कि किन-किन अफसरों ने IPR नहीं भरा है और उन्हें नोटिस दे।
वहीं, यह यूनिट खुद ही निगरानी के दायरे से बाहर बैठी है। न हिदायत जारी होती है, न रिमाइंडर और न ही कोई रिपोर्ट सार्वजनिक होती है।
नतीजा- नियम किताब में है, अफसर आराम में हैं।
ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन
पोर्टल कब से शुरू हुआ, पहले क्या व्यवस्था थी
मध्य प्रदेश के सामान्य प्रशासन विभाग ने 2010-11 से अचल संपत्ति की जानकारी ऑनलाइन करने का सिस्टम शुरू किया था। पहले अधिकारियों और कर्मचारियों को ये जानकारी ऑफलाइन जमा करनी होती थी। उसके बाद जीएडी इसे स्कैन करके वेबसाइट पर अपलोड करता था।
अब ये काम SPARROW (स्मार्ट परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट रिकॉर्डिंग ऑनलाइन विंडो) के जरिए सीधे ऑनलाइन किया जाता है। इससे सभी रिकॉर्ड सीधे पोर्टल पर अपलोड हो जाते हैं और सार्वजनिक देखने के लिए उपलब्ध रहते हैं।
CMO का इस पर क्या रुख है?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर सामान्य प्रशासन विभाग ने 6 जनवरी 2025 को सभी विभागों और मंत्रालयों में काम करने वाले लोकसेवकों से संपत्ति का ब्यौरा जमा करने को कहा था। यह सख्ती आरटीओ के पूर्व आरक्षक सौरभ गुप्ता से 52 किलो सोना और करोड़ों की नकदी बरामद होने के बाद की गई। आदेश में मध्य प्रदेश सिविल सेवा आचरण नियमों का हवाला देते हुए 31 जनवरी 2025 तक जानकारी जमा करने की चेतावनी भी दी गई थी।
क्यों जरूरी है IPR?
IPR असल में पारदर्शिता का सबसे बड़ा हथियार है। इससे पता चलता है कि किसी अफसर की संपत्ति अचानक तो नहीं बढ़ रही है।
यदि कोई अफसर हर साल 5-10 लाख तनख्वाह पाता है, लेकिन उसकी संपत्ति करोड़ों में है, तो सवाल उठता है कि वह पैसा आया कहां से?
यही पकड़ने के लिए IPR बना था। लेकिन जब IPR ही खाली या अधूरा होगा, तो जांच का आधार ही नहीं बचता।
यह सिर्फ फॉर्म का मामला नहीं
यह सिर्फ एक फॉर्म भरने की बात नहीं है। यह जनता के प्रति जवाबदेही का सवाल है। सरकारी अफसर जनता के पैसे से तनख्वाह पाते हैं, इसलिए उनकी संपत्ति का ब्यौरा देना जनता का हक है। जब IPR खाली रहे, नियम बेकार रहें और GAD चुप रहे - तो भ्रष्टाचार की जड़ें और मजबूत होती हैं।
GAD का पक्ष
सामान्य प्रशासन विभाग के उप सचिव विवेक कुमार रघुवंशी का कहना हैकिअचल संपत्ति की जानकारी देना सभी केलिएजरूरी है। समय पर IPR न मिलने पर संबंधित अधिकारी को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा जाता है।उनकाजवाब संतोषजनक न होने पर मध्य प्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम के तहत कार्रवाई प्रस्तावित की जाती है। कई मामलों में अधिकारी निर्धारित समय में IPR जमा नहीं कर पाते,उन्हें कारण के आधार पर बाद में जमाकरनेका मौका दिया जाता है। ऐसे IPR कई बार पोर्टल पर अपडेट नहीं हो पाते।
MP-CG-RJ कनेक्शन
यह मामला सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी सरकारी अफसरों की IPR प्रक्रिया लगभग ऐसी ही है।
राजस्थान में भी अफसरों को हर साल संपत्ति की घोषणा देनी होती है, पर वहां भी इसे लागू करने की व्यवस्था कमजोर है। छत्तीसगढ़ में भी रायपुर और बिलासपुर के आईएएस अधिकारियों पर कई बार संपत्ति छिपाने के आरोप लगे हैं।
MP में इस मामले की पड़ताल बताती है कि तीनों राज्यों में एक जैसा ढांचा है- नियम सख्त, अमल लापरवाह।
रेफरेंस:
- mpsparrow.gov.in - GAD पोर्टल
- म.प्र. सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 - नियम 19
- द सूत्र की मूल पड़ताल रिपोर्ट
FAQ
- IPR क्या होता है और इसे कौन भरता है?
IPR यानी Immovable Property Return (अचल संपत्ति रिटर्न)। मध्यप्रदेश में प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी के सभी सरकारी कर्मचारियों को हर साल 31 जनवरी तक GAD के पोर्टल mpsparrow.gov.in पर अपनी अचल संपत्ति का पूरा ब्यौरा देना जरूरी है। इसका मकसद यह जांचना है कि अफसर की संपत्ति उसकी आय के हिसाब से सही है या नहीं। - IPR में क्या-क्या जानकारी देनी होती है?
IPR फॉर्म में अफसर का नाम, पद, वेतन, संपत्ति का शहर, प्लॉट या मकान या खेत का क्षेत्रफल, खरीद का साल, कीमत, मौजूदा बाजार भाव, संपत्ति किसके नाम पर है, खरीदी है या गिफ्ट में मिली है या पुश्तैनी है, बेचने वाले का नाम और सालाना कमाई - ये सब बताना होता है। इतनी जानकारी के बावजूद ज्यादातर कॉलम खाली छोड़ दिए जाते हैं। - IPR न भरने पर क्या सजा का प्रावधान है?
म.प्र. सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 19 के मुताबिक IPR न भरने पर प्रमोशन रोका जा सकता है, इंक्रीमेंट बंद किया जा सकता है, विभागीय जांच हो सकती है और विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं मिलती। लेकिन व्यवहार में GAD ने आज तक किसी भी अफसर पर यह कार्रवाई नहीं की।
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