मध्यप्रदेश में पायलट भर्ती घोटाला: 4 लाख की पोस्ट पर 29 लाख खर्च करने को तैयार सरकार...आखिर क्यों?

Harish Divekar | Jul 13, 2026, 14:16 IST
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कर्ज के बोझ तले दबे मध्यप्रदेश में पायलट भर्ती घोटाला हो गया है। The Sootr की पड़ताल में ऐसी भर्ती व्यवस्था सामने आई है, जिसने सरकारी खर्च, नियमों और फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे बड़ा सवाल सरकारी खर्च को लेकर है। जिस पायलट इन कमांड (PIC) को सरकार सीधे करीब 4 लाख रुपए प्रतिमाह में नियुक्त करती है, उसी पद के लिए अब एक प्राइवेट कंपनी को 21 लाख 96 हजार रुपए प्रति महीने का भुगतान किया जाएगा।



इसके अलावा 18 प्रतिशत जीएसटी और 20 प्रतिशत सर्विस चार्ज भी देना होगा। यानी एक ही पायलट पर सरकार का वास्तविक मासिक खर्च 4 लाख रुपए से बढ़कर करीब 27 से 29 लाख रुपए तक पहुंच जाएगा।



यह मामला केवल एक पायलट तक सीमित नहीं है। को-पायलट, फ्लाइट ऑपरेशन मैनेजर और डिस्पैचर सहित अन्य तकनीकी पदों के लिए भी वर्तमान सरकारी वेतन से कई गुना ज्यादा सैलरी तय की गई है। कई पदों पर यह अंतर सात से दस गुना तक है।



द सूत्र ने भर्ती प्रक्रिया, टेंडर, नियमों, कंपनी चयन और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की करीब एक हफ्ते तक पड़ताल की है। हमारी जांच में कई ऐसे तथ्य मिले हैं, जो बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रहे हैं।



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सिलसिलेवार ढंग से समझिए पूरी कहानी

मध्यप्रदेश सरकार अगस्त 2026 में अपने विमानन बेड़े में 235 करोड़ रुपए कीमत का बॉम्बार्डियर चैलेंजर 3500 बिजनेस जेट शामिल करने जा रही है। कनाडा निर्मित इस विमान को भारत लाने के लिए डीजीसीए की सभी जरूरी औपचारिकताएं पूरी हो गई हैं।



दरअसल, मई 2021 में कोरोना काल के दौरान रेमडेसिविर दवाइयों की आपूर्ति के बीच मध्यप्रदेश सरकार का बीचक्राफ्ट किंग एयर B-200GT विमान ग्वालियर एयरबेस पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इसके बाद सरकार के पास कोई कार्यशील फिक्स्ड-विंग विमान नहीं बचा था, इसलिए मोहन सरकार ने नया विमान खरीदा है।



वहीं, सरकार एक हेलीकॉप्टर भी खरीदने जा रही है। करीब 170 करोड़ का यह अत्याधुनिक H160 हेलीकॉप्टर जनवरी 2027 तक बेड़े में शामिल हो जाएगा। H160 हेलीकॉप्टर हर मौसम में उड़ान भरने के साथ रात में भी संचालन करने में सक्षम है। इसकी खासियत अल्ट्रा-क्वाइट यानी बेहद कम शोर वाली तकनीक है।



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किराए में उड़ गए 290 करोड़ रुपए

सरकारी विमान नहीं होने के कारण मुख्यमंत्री समेत अन्य वीआईपी यात्राओं के लिए सरकार को लगातार चार्टर विमान और हेलीकॉप्टर किराए पर लेने पड़े हैं। विधानसभा में सरकार ने स्वीकार किया है कि जनवरी 2021 से नवंबर 2025 के बीच केवल चार्टर प्लेन और हेलीकॉप्टर पर 290 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव के कार्यकाल में औसतन 21 लाख रुपए प्रतिदिन चार्टर विमान और हेलीकॉप्टर पर खर्च हो रहे हैं। इन्हीं खर्चों को कम करने के उद्देश्य से नया बिजनेस जेट खरीदा गया है।



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दो साल चली खरीद प्रक्रिया

नया विमान खरीदने की प्रक्रिया करीब दो वर्ष पहले शुरू हुई थी। शुरुआत में टेक्सट्रोन ने 145 करोड़ रुपए का प्रस्ताव दिया, लेकिन बाद में कीमत बढ़ाकर 208 करोड़ रुपए कर दी।



इसके बाद पूरी प्रक्रिया निरस्त कर दी गई। बाद में 10 जुलाई 2024 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने बॉम्बार्डियर चैलेंजर 3500 खरीदने को मंजूरी दी। सितंबर 2024 में तकनीकी और वित्तीय प्रक्रिया आगे बढ़ी और अब अगस्त 2026 में विमान सरकार को मिलने जा रहा है।



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यहीं से शुरू होता है पूरा विवाद

17 मार्च 2025 को विमानन विभाग की बैठक में नए विमान के संचालन की तैयारियां पूरी करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इसके बाद कई महीनों तक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। अब जब विमान की डिलीवरी का वक्त नजदीक आया तो विभाग ने नए जेट और हेलीकॉप्टर के संचालन के लिए पायलटों व तकनीकी कर्मचारियों की भर्ती का टेंडर जारी कर दिया। यह भर्ती विभाग ने खुद करने के बजाय प्राइवेट आउटसोर्स कंपनी के माध्यम से कराने का निर्णय लिया। यहीं से पूरे मामले पर सवाल उठने शुरू होते हैं।



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सवाल नंबर-1: जब अपने पायलट मौजूद हैं तो नई भर्ती क्यों?

विमानन विभाग में पहले से तीन पायलट हैं। इनमें से दो पायलटों के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है, लेकिन जांच पूरी होने के बाद भी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। बताया गया कि उन्हें ​क्लीनचिट मिल गई है, लेकिन फाइल लंबे समय से पेंडिंग रखी गई है।



दूसरी तरफ नया विमान उपलब्ध कराने वाली कंपनी एक साल के लिए सीनियर पायलट भी उपलब्ध करा रही है। हेलीकॉप्टर के लिए दो पायलट पहले से कार्यरत हैं और हेलीकॉप्टर निर्माता कंपनी भी एक साल तक पायलट उपलब्ध कराएगी। पिछले तीन वर्षों से विभाग का हेलीकॉप्टर केवल दो पायलटों के सहारे संचालित होता रहा है। कैप्टन अनंत सेठी के मेडिकल अनफिट होने के बाद भी लगभग चार वर्षों तक विमान दो ही पायलटों से संचालित किया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर इतनी महंगी आउटसोर्स भर्ती की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?



सवाल नंबर-2: नियमों को दरकिनार किया गया?

विमानन नियुक्ति नियम-2003 के अनुसार नई नियुक्ति केवल दो तरीकों से हो सकती है। पहली प्रतिनियुक्ति से और दूसरी खुली प्रतियोगिता के आधार पर संविदा नियुक्ति।



दस्तावेज बताते हैं कि इस मामले में इन दोनों प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। यदि ऐसा है तो फिर यह भर्ती किस नियम के तहत की गई?



हालांकि अफसरों ने इसका रास्ता खोज लिया है। विभाग का तर्क है कि यह भर्ती नहीं है, क्योंकि भर्ती परमानेंट होती है, इसे आउटसोर्स पर कंपनी को दिया जा रहा काम बताया जा रहा है। कुल मिलाकर यह अफसरों का सिस्टम को घुमाने का एक मोड़ भर है।



सवाल नंबर-3: क्या कंपनी पर मेहरबानी की गई?

आउटसोर्स के टेंडर में दो कंपनियों ने भाग लिया है। इनमें एयरो एयरक्राफ्ट सेल्स एंड चार्टर्स प्राइवेट लिमिटेड और एल2 इंडिया फ्लाईसेफ एविएशन लिमिटेड शामिल थीं।



टेंडर एल1 एयरो एयरक्राफ्ट सेल्स एंड चार्टर्स प्राइवेट लिमिटेड को मिला है। अब संयोग यह है कि यही कंपनी पिछले छह सालों से मध्यप्रदेश सरकार को चार्टर प्लेन और हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराती रही है। इसे सरकारी विमान के लिए पायलट उपलब्ध कराने का ठेका मिला है। टेंडर में एल2 के प्लेन और हेलीकॉप्टर के लिए निकले हर पद का मामूली सा रेट बढ़ा हुआ है। इससे संदेह और गहराता है।



सवाल नंबर-4: सात से दस गुना ज्यादा भुगतान आखिर किस बात का?

यही पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर सरकार को एक ही पद के लिए इतना ज्यादा भुगतान क्यों करना पड़ रहा है।



सरकारी व्यवस्था में पायलट इन कमांड (PIC) का मासिक वेतन करीब 4 लाख रुपए है। वहीं आउटसोर्स कंपनी के जरिए इसी पद के लिए 21 लाख 96 हजार 153 रुपए प्रति महीने का भुगतान तय किया गया है।



इसी तरह फर्स्ट ऑफिसर का सरकारी वेतन करीब 2.50 लाख रुपए है, लेकिन कंपनी से उसे लेने के लिए 11 लाख 71 हजार 281 रुपए प्रति महीने तय किए गए हैं।



फ्लाइट ऑपरेशन मैनेजर के पद पर सरकारी वेतन करीब 1.10 लाख रुपए है, जबकि आउटसोर्स व्यवस्था में इसके लिए 2 लाख 92 हजार 820 रुपए भुगतान किया जाएगा।



वहीं डिस्पैचर को सरकारी वेतन के तौर पर करीब 61 हजार रुपए मिलते हैं, लेकिन कंपनी के जरिए इस पद के लिए 5 लाख 85 हजार 640 रुपए तय किए गए हैं।



इसके अलावा इन सभी भुगतानों पर 18 प्रतिशत जीएसटी और 20 प्रतिशत सर्विस चार्ज भी अलग से देना होगा। यही वजह है कि सरकारी और आउटसोर्स खर्च के बीच इतना बड़ा अंतर सवाल खड़े कर रहा है।











मध्यप्रदेश में पायलट भर्ती घोटाला


हेलीकॉप्टर में भी यही खेल

हेलीकॉप्टर के फर्स्ट ऑफिसर को वर्तमान में लगभग 2.50 लाख रुपए वेतन मिलता है, जबकि आउटसोर्स व्यवस्था में उसके लिए 14.64 लाख रुपए तय किए गए हैं। इसी तरह दूसरे फर्स्ट ऑफिसर के लिए पहले से 2.50 लाख का वेतन ​तय है।



अब नए टेंडर में उसके लिए 11.71 लाख रुपए का भुगतान निर्धारित किया गया है। एक और सवाल यह भी है कि हेलीकॉप्टर संचालन के लिए डिस्पैचर की भर्ती क्यों की जा रही है, जबकि एविएशन इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट कहते हैं कि हेलीकॉप्टर के लिए इस पद की जरूरत ही नहीं है।



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पहले आउटसोर्स भर्ती, अब अमेरिका में ट्रेनिंग

आउटसोर्स कंपनी के माध्यम से फिलहाल पायलट इन कमांड (PIC) की नियुक्ति की जा चुकी है। इसी पायलट को नए बॉम्बार्डियर चैलेंजर-3500 बिजनेस जेट की टाइप रेटिंग ट्रेनिंग के लिए अमेरिका भेजने की तैयारी है। सूत्रों के अनुसार, इस प्रशिक्षण पर करीब 80 लाख रुपए खर्च होने का अनुमान है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि विभाग में पहले से सरकारी पायलट हैं। इसके बावजूद निजी कंपनी के माध्यम से नियुक्त पायलट को सरकारी खर्च पर विदेश में प्रशिक्षण क्यों दिया जा रहा है?



वहीं, टेंडर में बिजनेस जेट (बॉम्बार्डियर चैलेंजर 3500 जेट विमान) और हेलीकॉप्टर के लिए फर्स्ट ऑफिसर, फ्लाइट ऑपरेशन मैनेजर, डिस्पैचर समेत अन्य तकनीकी पद भी शामिल हैं। इन पदों पर अभी नियुक्तियां नहीं हुई हैं, लेकिन अनुबंध होने के कारण आने वाले समय में इनकी भर्ती भी इसी आउटसोर्स व्यवस्था के तहत की जाएगी।



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वित्त विभाग का सर्कुलर किया दरकिनार

एक और सवाल वित्त विभाग के नियमों के पालन को लेकर भी खड़ा हो रहा है। वित्त विभाग ने 31 मार्च 2026 को जारी अपने निर्देशों में स्पष्ट किया है कि यदि कोई विभाग किसी निजी एजेंसी के माध्यम से आउटसोर्स सेवाएं लेता है, तो उसकी पूरी जानकारी ROAMS (Resource Outsourcing Agency Management System) पोर्टल पर अनिवार्य रूप से दर्ज की जाएगी।



विमानन विभाग ने आउटसोर्स भर्ती का टेंडर तो जारी किया, लेकिन इस प्रक्रिया को ROAMS पोर्टल पर अपलोड नहीं किया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या वित्त विभाग के अनिवार्य दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया? यह भी चर्चा है कि यदि मामला ROAMS पोर्टल पर अपलोड होता तो वित्त विभाग इस पर आपत्ति या अतिरिक्त परीक्षण कर सकता था।



अनुबंध पांच साल तक, भुगतान भी बढ़ता जाएगा

टेंडर दस्तावेजों के मुताबिक, आउटसोर्स एजेंसी के साथ प्रारंभिक अनुबंध तीन वर्ष के लिए किया गया है। प्रदर्शन संतोषजनक रहने और दोनों पक्षों की सहमति होने पर इसे एक-एक वर्ष के दो चरणों में बढ़ाया जा सकेगा। यानी एजेंसी अधिकतम पांच वर्ष तक यह काम कर सकती है। एजेंसी को भुगतान हर तीन महीने किया जाएगा। दस्तावेजों में यह भी प्रावधान है कि अनुबंध जारी रहने पर हर दो वर्ष बाद भुगतान में 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि होगी। यानी अनुबंध जितना लंबा चलेगा, एजेंसी को मिलने वाली राशि भी उतनी बढ़ती जाएगी।



एसीएस बोले- मामला दिखवाते हैं...

द सूत्र ने विमानन विभाग के अपर मुख्य सचिव आईएएस संजय शुक्ला से आउटसोर्स भर्ती, भर्ती नियमों के पालन, निजी कंपनी के चयन, पायलट पर कई गुना अधिक भुगतान, अमेरिका में प्रशिक्षण और अन्य दस्तावेजों के आधार पर सामने आए सवालों पर उनका पक्ष जानना चाहा। उनसे पूछा कि विभाग ने आउटसोर्स भर्ती का फैसला किन परिस्थितियों में लिया और पूरी प्रक्रिया किस नियम के तहत अपनाई गई।



इन सवालों पर अपर मुख्य सचिव संजय शुक्ला ने विस्तृत जवाब नहीं दिया। उन्होंने इतना ही कहा कि आपने मामला हमारे संज्ञान में लाया है। इसे हम दिखवाते हैं।



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