मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय का फरमान, अब 14 दिन में होगा FIR का फैसला
News In Short
- किसी भी मामले की प्रारंभिक जांच अब अधिकतम 14 दिनों में पूरी करना अनिवार्य है।
- जांच शुरू करने से पहले डीएसपी रैंक के अधिकारी से मंजूरी लेना आवश्यक होगा।
- केवल 3 से 7 साल तक की सजा वाले मामलों में ही प्रारंभिक जांच की अनुमति मिलेगी।
- समय पर जांच पूरी न करने वाले पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई होगी।
- यह निर्देश भ्रष्टाचार और अवैध वसूली की शिकायतों को खत्म करने के लिए जारी किए गए हैं।
News In Detail
मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय ने राज्य की कानून व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। अब पुलिस किसी भी शिकायत को जांच के नाम पर महीनों तक ठंडे बस्ते में नहीं डाल पाएगी। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस शिकायतों को जांच चल रही है कहकर लंबे समय तक लटकाए रखती है। इससे न केवल न्याय में देरी होती है, बल्कि भ्रष्टाचार और अवैध वसूली की गुंजाइश भी बनी रहती है।
इसी को रोकने के लिए PHQ की सीआईडी (CID) शाखा ने भोपाल और इंदौर के पुलिस कमिश्नर सहित सभी जिलों के एसपी को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अब 14 दिनों के भीतर यह स्पष्ट करना होगा कि मामले में FIR दर्ज होगी या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी फैसले का हवाला
पुलिस मुख्यालय ने अपने सर्कुलर में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का संदर्भ दिया है। कोर्ट के मुताबिक, यदि किसी जानने योग्य अपराध की सूचना मिलती है, तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है।
प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry-PE) केवल बहुत ही सीमित और विशेष परिस्थितियों में ही की जा सकती है। हाल ही में एक जिला पुलिस द्वारा FIR दर्ज न करने और मामले को केवल जांच के दायरे में रखने पर न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जताई थी, जिसके बाद यह सख्ती दिखाई गई है।
डीएसपी स्तर के अधिकारी की अनुमति होगी जरूरी
नए नियमों के मुताबिक, अब थाना प्रभारी अपनी मर्जी से हर मामले में प्रारंभिक जांच शुरू नहीं कर पाएंगे। वे केवल उन्हीं प्रकरणों में जांच कर सकते हैं जिनमें सजा की अवधि तीन से सात साल के बीच हो। इसके लिए भी उन्हें पहले डीएसपी स्तर के अधिकारी से लिखित अनुमति लेना जरूरी होगा। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि निचले स्तर पर शक्तियों का दुरुपयोग न हो सके।
भ्रष्टाचार और लेटलतीफी पर सीधा प्रहार
एमपी पुलिस मुख्यालय के पास ऐसी कई शिकायतें पहुंची थीं जिनमें जांच के नाम पर फाइलों को लंबित रखकर अवैध लाभ लेने की कोशिश की जा रही थी। अब यदि निर्धारित 14 दिनों की समयसीमा का उल्लंघन होता है, तो संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार आएगा और आम जनता का भरोसा कानून पर बढ़ेगा।
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