MP में 350 करोड़ के यूनिफॉर्म टेंडर पर हाईकोर्ट की रोक, सरकार से मांगा जवाब
समझें क्या है पूरा मामला
- हाईकोर्ट ने 350 करोड़ रुपए के यूनिफॉर्म टेंडर पर रोक लगाई।
- स्थानीय एमएसएमई उद्योगों ने टेंडर शर्तों पर आपत्ति जताई।
- जाइमा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
- कोर्ट ने सरकार और निगम से जवाब मांगा है।
- अगली सुनवाई तक टेंडर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी।
350 करोड़ टेंडर पर रोक
मध्य प्रदेश में स्कूल यूनिफॉर्म टेंडर मामले में बड़ा फैसला आया है। जबलपुर हाईकोर्ट ने करीब 350 करोड़ रुपए के टेंडर पर अंतरिम रोक लगा दी है। हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने यह आदेश दिया।
कोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई तक टेंडर प्रक्रिया को अंतिम रूप नहीं दिया जाएगा। इस मामले में राज्य सरकार और मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम सहित अन्य पक्षों से जवाब मांगा गया है। यह मामला प्रदेश के स्थानीय गारमेंट उद्योगों और सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों से जुड़ा है। जबलपुर अपैरल इनोवेशन एंड मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (जाइमा) ने याचिका दायर की थी।
टेंडर शर्तों पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि टेंडर की शर्तें बहुत कठिन रखी गई हैं। इन शर्तों के कारण स्थानीय कंपनियां प्रक्रिया से बाहर हो रही हैं।जाइमा के अनुसार, प्रदेश के कई गारमेंट निर्माता और बुनकर इन शर्तों को पूरा नहीं कर सकते। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विमल कांत जैन ने पक्ष रखा। जाइमा के सह-सचिव अजित मोदी ने भी टेंडर प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां बताईं। उनका कहना है कि स्थानीय उद्योगों को मौका मिलना चाहिए। लेकिन वर्तमान शर्तों के कारण बड़ी कंपनियों को फायदा मिल सकता है।
बड़ी कंपनियों को लाभ का आरोप
याचिका में कहा गया है कि टेंडर की शर्तें मध्य प्रदेश स्टोर परचेज नियम 2023 की भावना के खिलाफ हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि शर्तें इस तरह बनाई गई हैं, जिससे छोटे उद्योग प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकें। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करती है। ऐसे में टेंडर की शर्तों में भी इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। याचिका में एमएसएमई मंत्री चैतन्य कश्यप के स्थानीय उद्योगों को प्राथमिकता देने वाले बयानों का भी उल्लेख किया गया है।
क्या हैं टेंडर की शर्तें
इस टेंडर में कई बड़ी वित्तीय और उत्पादन क्षमता से जुड़ी शर्तें रखी गई हैं। स्पिनिंग मिल के लिए 700 करोड़ रुपए का वार्षिक टर्नओवर जरूरी बताया गया है। वहीं गारमेंट निर्माता के लिए 233 करोड़ रुपए का वार्षिक टर्नओवर तय किया गया है। टेंडर में भाग लेने वाली कंपनियों के लिए 350 करोड़ रुपए की न्यूनतम नेटवर्थ भी मांगी गई है।
इसके अलावा करीब 1.95 करोड़ रुपए की ईएमडी (Earnest Money Deposit) जमा करने की शर्त रखी गई है। कंपनियों के पास हर साल 50 लाख यूनिफॉर्म बनाने की क्षमता होना भी जरूरी बताया गया है। इसके साथ पिछले तीन वर्षों में 105 करोड़ रुपए के समान काम का अनुभव मांगा गया है।
एमएसएमई हितों का मुद्दा
जाइमा ने कोर्ट में कहा कि इन शर्तों से छोटे और मध्यम उद्योगों को नुकसान होगा। प्रदेश में कई छोटे गारमेंट निर्माता स्कूल यूनिफॉर्म बनाने का काम करते हैं। लेकिन बड़े वित्तीय मानकों के कारण वे टेंडर में शामिल नहीं हो पाएंगे।
एसोसिएशन का कहना है कि सरकार को स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने वाली नीति अपनानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की कि टेंडर प्रक्रिया की समीक्षा की जाए।
कोर्ट ने मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए टेंडर प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाई है। अदालत ने साफ किया कि अगली सुनवाई तक टेंडर को अंतिम रूप नहीं दिया जाएगा। राज्य सरकार, मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम और अन्य पक्षों को अपना जवाब दाखिल करना होगा।
अब आगे की सुनवाई में यह तय होगा कि टेंडर की शर्तों को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर क्या फैसला होगा। इस मामले में कोर्ट का अंतिम निर्णय आने के बाद ही टेंडर प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश के कारण 350 करोड़ रुपए की यूनिफॉर्म सप्लाई प्रक्रिया रुक गई है। मामला केवल टेंडर तक सीमित नहीं है। यह प्रदेश के छोटे उद्योगों की भागीदारी और सरकारी खरीद नीति से भी जुड़ा है।
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