OBC आरक्षण : 'डॉ. अंबेडकर का संविधान कमजोर होगा', हाईकोर्ट में सामान्य वर्ग की बड़ी दलील

Neel Tiwari | Jul 16, 2026, 17:29 IST
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ओबीसी आरक्षण सुनवाई
ओबीसी आरक्षण सुनवाई

हाई कोर्ट में ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग ने बड़ा दावा किया। अदालत में कहा गया कि बिना सही आधार और गणना के आरक्षण बढ़ाना संविधान की मूल भावना को कमजोर करेगा। 50% सीमा, 73% आरक्षण और पिछड़ा वर्ग आयोग पर भी विस्तृत बहस हुई।

समझें क्या है पूरा मामला

  • मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में ओबीसी आरक्षण की वैधता पर सुनवाई जारी है।
  • सामान्य वर्ग ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का विरोध किया।
  • अदालत में कहा गया कि बिना सही गणना आरक्षण बढ़ाना संविधान के खिलाफ होगा।
  • डॉ. अंबेडकर के संविधान और 50 प्रतिशत सीमा का भी हवाला दिया गया।
  • अब अगली सुनवाई में सरकार और आरक्षण समर्थक पक्ष अपनी दलील रखेंगे।
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में OBC आरक्षण मामले की सुनवाई गुरुवार को संविधान और आरक्षण की सीमा पर केंद्रित रही। सामान्य वर्ग की ओर से अदालत में कहा गया कि बिना पर्याप्त आधार और सही गणना के आरक्षण बढ़ाना डॉ. भीमराव अंबेडकर के बनाए संविधान की मूल भावना को कमजोर करेगा। सुनवाई के दौरान 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा, 73 प्रतिशत आरक्षण, पिछड़ा वर्ग आयोग और सरकार की प्रक्रिया पर भी कई अहम सवाल उठाए गए। अब इस बहुचर्चित मामले में शुक्रवार को राज्य सरकार अपना पक्ष रखेगी।

पूरे दिन चली सामान्य वर्ग की बहस

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ में गुरुवार को भी ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई जारी रही। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की। पहले वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने सामान्य वर्ग का पक्ष रखा। इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण ने बहस को आगे बढ़ाया। पूरे दिन सामान्य वर्ग ने सरकार के आरक्षण फैसले पर कई कानूनी सवाल उठाए।

प्रतिनिधित्व के सरकारी दावे को बताया गलत

सामान्य वर्ग की ओर से अदालत में कहा गया कि सरकार का यह दावा सही नहीं है कि ओबीसी वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। अदालत को बताया गया कि स्कूलों, कॉलेजों, शिक्षकों और सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग की भागीदारी दिखाई देती है। यह भी कहा गया कि जिस वर्ग की आवाज विधानसभा तक पहुंच रही है और जिसके पक्ष में कानून बन रहे हैं, उसे प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं कहा जा सकता। इसी आधार पर सरकार के दावे को चुनौती दी गई।

50 प्रतिशत सीमा पार करना बताया गलत

सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। अदालत में कहा गया कि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा केवल विशेष परिस्थितियों में ही पार की जा सकती है। वर्तमान मामले में ऐसी कोई असाधारण स्थिति नहीं है। सामान्य वर्ग ने कहा कि पहले ही आरक्षण 63 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। अब इसे 73 प्रतिशत से ऊपर ले जाने की कोशिश की जा रही है। दलील दी गई कि ऐसा कदम संविधान की मूल भावना को कमजोर करेगा और दूसरे वर्गों के साथ भेदभाव होगा।

डॉ. अंबेडकर के संविधान का भी किया गया उल्लेख

सामान्य वर्ग की ओर से कहा गया कि बिना सही आधार और पर्याप्त गणना के आरक्षण बढ़ाना संविधान की भावना के खिलाफ होगा। अदालत में यह भी कहा गया कि यदि लगातार आरक्षण की सीमा बढ़ती रही तो इससे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के बनाए संविधान की मूल व्यवस्था कमजोर होगी। सामान्य वर्ग ने अदालत से कहा कि आरक्षण का फैसला केवल ठोस तथ्यों और कानूनी आधार पर ही होना चाहिए।

आरक्षण आखिरी विकल्प होना चाहिए

सुनवाई के दौरान केवल आरक्षण की सीमा पर ही नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। सामान्य वर्ग ने कहा कि पिछड़े वर्ग को आगे बढ़ाने के कई दूसरे रास्ते भी हैं। सरकार को पहले शिक्षा, अवसर और सामाजिक विकास जैसे उपाय अपनाने चाहिए। यदि इन उपायों से भी लक्ष्य पूरा न हो, तभी आरक्षण का सहारा लेना चाहिए। सीधे आरक्षण बढ़ाना उचित तरीका नहीं बताया गया।

पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका पर भी उठे सवाल

अदालत में रामजी महाजन आयोग और पिछड़ा वर्ग आयोग का भी उल्लेख हुआ। सामान्य वर्ग ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन वर्ष 1993 में हुआ था। उसे संवैधानिक दर्जा अगस्त 2018 में मिला। इसके बाद भी सरकार ने आयोग से सलाह लिए बिना आरक्षण नियम बनाए। सामान्य वर्ग ने इसे संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत बताया।

कोर्ट ने पूछा अहम सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि यदि सरकार अब आयोग से दोबारा सलाह ले, तो क्या स्थिति बदल जाएगी। इस पर सामान्य वर्ग ने कोई सीधी सहमति नहीं दी। उन्होंने कहा कि सरकार को शुरुआत में ही नियमों का पालन करना चाहिए था। बाद में प्रक्रिया पूरी करना पहले की कमी को सही नहीं ठहराता।

अब सरकार रखेगी अपना पक्ष

गुरुवार की सुनवाई के बाद सामान्य वर्ग की बहस लगभग पूरी हो गई। अदालत ने उन्हें 10 से 15 मिनट का अतिरिक्त समय दिया है। इसके बाद राज्य सरकार और ओबीसी आरक्षण के समर्थन में उपस्थित अधिवक्ता अपनी दलील रखेंगे। कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि इस मामले की सुनवाई प्रतिदिन दोपहर 2:30 बजे होगी।

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