कैग रिपोर्ट ने खोली पोल, MP में रोज 12 लोग दे रहे जान, खतरनाक मोड़ पर डिप्रेशन
समझें क्या है पूरा मामला
- एमपी में रोज औसतन 11.9 यानी करीब 12 लोग सुसाइड कर रहे हैं।
- राज्य में 18 से 30 वर्ष के युवाओं की सुसाइड दर 24.55% है।
- प्रदेश की 13.9% यानी 1.01 करोड़ आबादी मानसिक बीमारी का शिकार है।
- WHO नियम के अनुसार प्रति लाख 3 डॉक्टर चाहिए पर यहां 0.05 हैं।
- सरकारी अस्पतालों में 45 प्रतिशत पद खाली हैं और दवाएं गायब हैं।
एमपी में लोग मानसिक बीमारी से ग्रस्त
CAG Report MP Mental Health: इमेजिन कीजिए एक ऐसे समाज की जहां युवा अपने फ्यूचर और करियर को लेकर दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। लेकिन अंदर ही अंदर एक भारी स्ट्रेस उन्हें खाए जा रहा है। वे मदद मांगना चाहते हैं। पर सिस्टम में न प्रॉपर काउन्सलिंग है और न ही सही ट्रीटमेंट।
यह कोई फिक्शनल स्टोरी नहीं है। यह हमारे मध्य प्रदेश की आज की सबसे कड़वी रियलिटी है। CAG (Comptroller and Auditor General) की ताजा रिपोर्ट ने एमपी के मेन्टल हेल्थ सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है।
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में मानसिक तनाव और डिप्रेशन एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। हर दिन कई युवा अपनी जिंदगी का अंत कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर कमी कहां रह गई, आइए इस मुद्दे को गहराई से समझें...
एमपी में आत्महत्या का आंकड़ा बढ़ा
कैग रिपोर्ट के आंकड़े बहुत चिंताजनक हैं। प्रदेश में रोज 11.9 लोग सुसाइड कर रहे हैं। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 10.6 से अधिक है। इसमें 18 से 30 साल के युवा शामिल हैं।
युवाओं में आत्महत्या की दर 24.55 प्रतिशत है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 17.1 प्रतिशत है। मानसिक बीमारियों का सही इलाज नहीं मिल पा रहा। काउंसलिंग की व्यवस्था भी पूरी तरह बदहाल है।
एक करोड़ आबादी डिप्रेशन की शिकार
रिपोर्ट के मुताबिक, 13.9 प्रतिशत लोग बीमार हैं। यानी 1.01 करोड़ लोग मानसिक तनाव में हैं। इतनी बड़ी आबादी के लिए डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। राज्य में एक लाख पर मात्र 0.05 मनोचिकित्सक हैं। WHO के नियमानुसार प्रति लाख तीन डॉक्टर होने चाहिए।
इस मानक से एमपी (cag report mp) बहुत पीछे चल रहा है। इंदौर में 1689 मरीजों का डायग्नोसिस हुआ। ग्वालियर में भी 419 मरीजों की जांच हुई। इन दोनों जगह बिना रेडियोलॉजिस्ट जांच कर दी गई। यह मरीजों की जान से खिलवाड़ जैसा है।
CAG रिपोर्ट क्या होता है
CAG रिपोर्ट का आसान मतलब Comptroller and Auditor General की जांच रिपोर्ट होता है। सरल भाषा में कहें तो CAG सरकार का ऑडिटर या हिसाब-किताब रखने वाला सीए (CA) होता है। सरकार जनता के टैक्स का पैसा कहाँ, कैसे और कितना खर्च कर रही है, इसकी पूरी ऑडिटिंग CAG करता है।
इसके बाद CAG एक डिटेल रिपोर्ट तैयार करता है जिसे CAG रिपोर्ट कहते हैं। इस रिपोर्ट में सरकारी योजनाओं का बजट, काम की गुणवत्ता, फंड का सही इस्तेमाल और कहीं कोई घपला, भ्रष्टाचार या लापरवाही तो नहीं हुई, इसका पूरा सच उजागर किया जाता है।
अस्पतालों में डॉक्टरों के पद खाली
जिला अस्पतालों और CHC का बुरा हाल है। जरूरी 23 में से 15 दवाएं गायब हैं। अस्पतालों में टेस्ट इक्विपमेंट ही मौजूद नहीं हैं। 47 से 100% इक्विपमेंट की भारी कमी है। इंदौर और ग्वालियर को 10 करोड़ रुपए मिले थे।
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का पैसा खर्च नहीं हुआ। चयनित अस्पतालों में स्वीकृत पद 480 हैं। लेकिन इनमें से केवल 267 पद भरे हैं। करीब 45 फीसदी पद आज भी खाली पड़े हैं। इलाज की उचित व्यवस्था न होना बड़ी समस्या है।
हेल्पलाइन पर नहीं मिल रहा रिस्पॉन्स
टेली मानस हेल्पलाइन पर कॉल्स का जवाब नहीं मिलता। दो साल में 85 हजार 260 कुल कॉल्स प्राप्त हुईं। इनमें से 9 हजार 855 कॉल्स का आंसर ही नहीं दिया गया। इंदौर और भोपाल में ऐसी बड़ी लापरवाही दिखी। सरकारी हॉस्पिटल्स से 409 मरीज भाग भी गए।
अस्पताल प्रशासन ने उनका कोई फॉलोअप नहीं किया। करियर का स्ट्रेस और अकेलापन सुसाइड का मेन कारण है। पारिवारिक कलह और नशा भी वजह बन रहे। गंभीर बीमारियां और हिंसा भी डिप्रेशन बढ़ा रही हैं। इस स्थिति में सुधार करना बेहद जरूरी है।
इसे कैसे रोक सकते हैं
इस बढ़ रहे डिप्रेशन, मानसिक तनाव और आत्महत्या की दर को रोकने के लिए ठोस कदम उठाना बहुत जरूरी है। CAG रिपोर्ट में सामने आई समस्याओं को दूर करने के लिए क्या किया जा करता है।
- अस्पतालों में खाली पदों को भरना और डॉक्टर्स बढ़ाना
राज्य में स्वीकृत 480 पदों में से खाली पड़े 45% पदों को जल्द से जल्द भरा जाए। वर्तमान में एक लाख आबादी पर केवल 0.05 साइकेट्रिस्ट हैं। इसे WHO के मानक (प्रति लाख 3 डॉक्टर) के करीब लाने के लिए नई नियुक्तियां की जानी चाहिए। - अस्पतालों में दवाओं और इंस्ट्रूमेंट की उपलब्धता
कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (CHC) और जिला अस्पतालों में 23 जरूरी दवाओं में से गायब 15 दवाओं की सप्लाई तुरंत बहाल हो। अस्पतालों में 47% से 100% तक इंस्ट्रूमेंट की जो कमी है, उसे दूर किया जाए। बिना रेडियोलॉजिस्ट जांच करने जैसी गंभीर लापरवाहियों पर रोक लगे। - हेल्पलाइन और इमरजेंसी रिस्पॉन्स को मजबूत करना
टेली मानस (Tele-MANAS) हेल्पलाइन पर कॉल्स न उठाने की समस्या को ठीक किया जाए। कॉल सेंटर में स्टाफ बढ़ाकर 24x7 क्विक काउंसलिंग और इमरजेंसी सपोर्ट सिस्टम सुनिश्चित किया जाए। - रेगुलर काउंसलिंग
चूंकि 18 से 30 वर्ष के युवाओं में सुसाइड रेट 24.55% है, इसलिए शैक्षणिक संस्थानों में करियर स्ट्रेस, अकेलेपन और डिप्रेशन से निपटने के लिए प्रोफेशनल काउन्सलेर्स नियुक्त हों। करियर प्रेशर, एग्जाम स्ट्रेस और एकाकीपन पर खुलकर बात करने के लिए अवेयरनेस वर्कशॉप्स आयोजित की जाएँ। - फंड का सही यूज और इंफ्रास्ट्रक्चर
इंदौर और ग्वालियर जैसे शहरों में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के लिए मिले 10 करोड़ रुपए जैसे फंड का सही और समय पर इस्तेमाल किया जाए। अस्पतालों का इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा जाए ताकि मरीज वहां से भागने न पाएं और उनका प्रॉपर फॉलोअप ट्रैक रखा जा सके। - सामाजिक जागरूकता
डिप्रेशन और मानसिक बीमारी को सोशल स्टिग्मा न मानकर सामान्य बीमारी की तरह देखने के लिए समाज में जागरूकता फैलाई जाए। पारिवारिक कलह, नशा या लत और मानसिक तनाव को दूर करने के लिए कम्युनिटी लेवल पर सपोर्ट ग्रुप्स और नशा मुक्ति केंद्रों का विस्तार किया जाए।
FAQ
- कैग रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में सुसाइड की दर क्या है?
कैग रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में रोजाना औसतन 11.9 (लगभग 12) लोग सुसाइड कर रहे हैं। इसमें 18 से 30 वर्ष के युवाओं की हिस्सेदारी 24.55% है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। - मध्य प्रदेश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है?
एमपी में प्रति एक लाख आबादी पर केवल 0.05 मनोचिकित्सक हैं, जबकि WHO के अनुसार 3 होने चाहिए। अस्पतालों में 45% पद खाली हैं और 23 में से 15 आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। - मध्य प्रदेश में युवाओं में सुसाइड और डिप्रेशन के प्रमुख कारण क्या हैं?
कैग रिपोर्ट के अनुसार करियर की समस्याएं, अकेलापन, पारिवारिक कलह, हिंसा, मानसिक तनाव, शराब या नशे की लत और दीर्घकालीन गंभीर बीमारियाँ आत्महत्या के मुख्य कारण हैं।
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