क्या खतरे में है MP का टाइगर स्टेट का टैग? नहीं धम रहे बाघों की मौत के मामले
मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट भी कहा जाता है, क्योंकि यहां पूरे देश में सबसे ज्यादा बाघ हैं। वहीं बाघों की मौत की बढ़ती रफ्तार ने सबको चिंता में डाल दिया है। अब ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या टाइगर स्टेट ही अब बाघों के लिए सुरक्षित नहीं है?
NTCA (नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी) की गाइडलाइन और सुरक्षा के सख्त दावे होने के बावजूद हर साल बाघों की मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। 2026 तो जैसे बाघों के लिए काल बनकर आया है।
क्या है पूरा मामला?
कान्हा टाइगर रिजर्व के सरही रेंज से रेस्क्यू कर के मुक्की क्वारनटाइन सेंटर लाई गई बाघिन अमाही (टी-141) बुधवार को इलाज के दौरान दम तोड़ दिया है।
हैरानी की बात है कि बाघिन का चौथा शावक भी मर गया है। इससे पहले बाघिन के तीन शावक भी मर चुके थे। कुल मिलाकर नौ दिन में पांच मौतों ने कान्हा प्रबंधन में हड़कंप मचा दिया है।
17 से 25 अप्रैल में तीन शावक की मौत
पर्यटकों ने 17 अप्रैल को अमाही और उसके शावकों को कमजोर हालत में देखा था। 21 अप्रैल को पहला शावक मृत पाया गया था। इसके बाद 24 को दूसरा शावक मरा था।
25 अप्रैल को तीसरे शावक की भी मौत हो गई थी। अब अंत में 29 अप्रैल को बाघिन और उसके चौथे शावक ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया है।
क्या है शावकों की मौत का कारण?
कान्हा प्रबंधन का कहना है कि बाघिन और उसके शावकों की मौत का कारण फेफड़ों में संक्रमण था। असल कारण जानने के लिए सैंपल फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे गए हैं।
इसके अलावा जबलपुर की स्कूल ऑफ वाइल्ड लाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ की टीम भी इस मामले की जांच में लगी हुई है।
क्या टाइगर स्टेट में बाघ अब भी सुरक्षित हैं?
सड़क हादसे और टेरिटोरियल फाइट जैसी वजहें बाघों की मौत का कारण बताई जा रही हैं। सवाल यह है कि हर टाइगर रिजर्व को करोड़ों का बजट मिल रहा है। फिर निगरानी में कमी कहां रह गई है? विशेषज्ञों का कहना है कि फील्ड मॉनिटरिंग को और मजबूत करना होगा।
मुखबिर तंत्र को सुधारना होगा। साथ ही लापरवाही पर सख्त कार्रवाई करनी होगी। इसके बाद ही हालात सुधर सकते हैं। हर बार किसी बाघ की मौत के बाद एक सवाल सामने आ रहा है। क्या टाइगर स्टेट में बाघ अब भी सुरक्षित हैं?
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