4.42 करोड़ वाहनों की निगरानी प्रभारी अफसरों के भरोसे, परिवहन विभाग स्टाफ बेहाल
समझें क्या है पूरा मामला
- MP में वाहनों की संख्या 4.42 करोड़ पार।
- परिवहन विभाग के आधे से ज्यादा पद खाली।
- नियमित आरटीओ न होकर प्रभारी अधिकारियों पर निर्भर।
- तकनीकी और प्रवर्तन पदों में भारी कमी।
- 339 नए पदों का प्रस्ताव, विभाग संरचना 20% बढ़ेगी।
मध्यप्रदेश में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यह आंकड़ा 4.42 करोड़ के पार पहुंच चुका है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन वाहनों की निगरानी, फिटनेस जांच, परमिट, कर वसूली और सड़क सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला परिवहन विभाग खुद कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है।
हालात ऐसे हैं कि प्रदेश में नियमित क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (आरटीओ) तक उपलब्ध नहीं हैं और कई जिलों में व्यवस्था प्रभारी अधिकारियों के भरोसे चल रही है।
अब करीब 15 वर्षों बाद विभाग ने कैडर रिव्यू का प्रस्ताव तैयार किया है, जिसे जल्द वित्त विभाग और राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए भेजा जा सकता है।
बढ़ती गाड़ियां, सिकुड़ता सिस्टम
प्रदेश में पिछले डेढ़ दशक के दौरान वाहनों की संख्या में दोगुने से अधिक वृद्धि हुई है। इसके उलट परिवहन विभाग का ढांचा लगभग वहीं का वहीं बना हुआ है। वर्ष 2011 के बाद विभाग में नए पदों का सृजन नहीं किया गया, जबकि जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती रहीं।
परिणाम यह है कि वाहन पंजीयन से लेकर प्रवर्तन कार्रवाई तक का पूरा सिस्टम सीमित मानव संसाधनों के सहारे संचालित हो रहा है। विभागीय अधिकारियों का मानना है कि मौजूदा स्टाफ के साथ प्रभावी निगरानी और प्रशासनिक नियंत्रण संभव नहीं रह गया है।
- प्रदेश में वाहनों की संख्या 4.42 करोड़ से अधिक पहुंच चुकी है।
- मध्यप्रदेश परिवहन विभाग में 51 प्रतिशत से ज्यादा पद रिक्त हैं।
- क्षेत्रीय और अतिरिक्त क्षेत्रीय परिवहन अधिकारियों के सभी 36 पद खाली हैं।
- मोटरयान परिवहन उप निरीक्षक (एमवीएसआई) के सभी 35 पद रिक्त हैं।
- परिवहन निरीक्षक (गैर तकनीकी) के 70 में से 65 पद खाली हैं।
- एआरटीओ के 64 स्वीकृत पदों में से 24 पद रिक्त हैं।
- प्रधान आरक्षक और वाहन चालक वर्ग के 120 पदों में से 94 पद खाली हैं।
- विभाग ने 339 नए पद सृजित करने का प्रस्ताव तैयार किया है।
- करीब 15 वर्षों बाद कैडर रिव्यू की प्रक्रिया शुरू की गई है।
एक भी नियमित आरटीओ नहीं
परिवहन विभाग की मौजूदा स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश में क्षेत्रीय और अतिरिक्त क्षेत्रीय परिवहन अधिकारियों के सभी स्वीकृत पद खाली पड़े हैं। ऐसे में कई जिलों में जिम्मेदारी अतिरिक्त प्रभार के जरिए निभाई जा रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रभारी व्यवस्था लंबे समय तक प्रशासनिक स्थिरता नहीं दे सकती। इससे निर्णय प्रक्रिया प्रभावित होती है और प्रवर्तन गतिविधियों की गति भी धीमी पड़ जाती है।
तकनीकी अमले की कमी से फिटनेस जांच पर असर
वाहनों की तकनीकी जांच और फिटनेस प्रमाणन से जुड़े मोटरयान परिवहन उप निरीक्षकों के सभी पद रिक्त होना भी चिंता का विषय है। हालांकि इन पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन नियुक्तियां होने तक दबाव बना रहेगा।
ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि लगातार बढ़ते वाहनों की तकनीकी निगरानी आखिर किस व्यवस्था के तहत प्रभावी तरीके से की जा रही है।
फील्ड में गिने-चुने अधिकारी
प्रवर्तन व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले परिवहन निरीक्षकों की स्थिति भी चिंताजनक है। प्रदेशभर में स्वीकृत 70 पदों के मुकाबले केवल पांच अधिकारी ही फील्ड में सक्रिय हैं।
यानी अवैध परिवहन, कर चोरी और नियम उल्लंघन के खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी बेहद सीमित अमले पर आ गई है। इससे प्रवर्तन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
339 नए पदों का प्रस्ताव, 20 फीसदी विस्तार की तैयारी
विभाग ने कैडर रिव्यू के तहत मौजूदा संरचना में लगभग 20 प्रतिशत विस्तार का प्रस्ताव तैयार किया है। यदि सरकार मंजूरी देती है तो 339 नए पद सृजित किए जाएंगे।
इसके बाद विभाग में स्वीकृत पदों की संख्या दो हजार के पार पहुंच सकती है। अधिकारियों का मानना है कि इससे पंजीयन, फिटनेस जांच, कर संग्रहण और सड़क सुरक्षा अभियानों को मजबूती मिलेगी।
राजस्व और सड़क सुरक्षा पर दोहरी चुनौती
परिवहन विभाग केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि राज्य सरकार के प्रमुख राजस्व स्रोतों में भी शामिल है। ऐसे में बड़ी संख्या में पद रिक्त रहने का सीधा असर राजस्व संग्रहण पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर सड़क सुरक्षा अभियान और नियमों के पालन को सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था भी कमजोर पड़ती है। जब करोड़ों वाहन सड़कों पर हों और निगरानी तंत्र आधी क्षमता पर काम कर रहा हो, तब चुनौतियां और गंभीर हो जाती हैं।
सबसे बड़ा सवाल
मध्यप्रदेश में वाहनों की रफ्तार लगातार बढ़ रही है, लेकिन क्या परिवहन विभाग का ढांचा भी उसी गति से मजबूत हो पाएगा? कैडर रिव्यू का प्रस्ताव अब सरकार के पाले में है। यदि इसे जल्द मंजूरी नहीं मिली तो आने वाले वर्षों में बढ़ते परिवहन दबाव के बीच प्रशासनिक चुनौतियां और गहरा सकती हैं।
इस संबंध में परिवहन आयुक्त उमेश जोगा का पक्ष जानने के लिए उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। खबर प्रकाशित होने तक उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई।
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