क्या एमपी में नहीं हुआ एसआईआर का असर? 58 लाख एक्स्ट्रा वोटर, गांव-शहर दोनों लिस्ट में नाम
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्यप्रदेश की विधानसभा और निकाय वोटर लिस्ट में 58 लाख मतदाताओं का अंतर मिला है।
- कई वोटरों के नाम गांव और शहर यानी पंचायत और नगरीय निकाय दोनों सूचियों में दर्ज हैं।
- एसआईआर (Special Summary Revision) के बाद भी डुप्लीकेट नाम स्थानीय निकायों की लिस्ट में बने हुए हैं।
- राज्य निर्वाचन आयोग ने केंद्रीय चुनाव आयोग से अपडेटेड सूची मांगी पर पांच रिमाइंडर के बाद भी नहीं मिली।
- 2027 के जून-जुलाई में 413 नगरीय निकायों और करीब 23 हजार ग्राम पंचायतों के चुनाव होने हैं।
मध्य प्रदेश में 58 लाख वोटर ज्यादा कैसे?
मध्यप्रदेश में अगले साल होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों से पहले एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। केंद्रीय चुनाव आयोग की विधानसभावार सूची में प्रदेश में 5 करोड़ 39 लाख मतदाता दर्ज हैं। लेकिन राज्य निर्वाचन आयोग की नगरीय निकाय और पंचायत सूची में यही संख्या 5 करोड़ 97 लाख तक पहुंच रही है। यानी दोनों सूचियों में करीब 58 लाख मतदाताओं का फर्क है।
यह फर्क अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा करता है। चुनाव से पहले होने वाली पड़ताल में यह आंकड़ा सामने आया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने 22 अप्रैल से जिला स्तर पर अलग से वोटर लिस्ट को खंगालने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसी में यह बड़ा अंतर पकड़ाया।
कौन हैं ये 58 लाख अतिरिक्त वोटर
राज्य निर्वाचन आयोग की शुरुआती पड़ताल में इस अंतर के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण सामने आए हैं। पहला कारण है डुप्लीकेट मतदाता, यानी ऐसे लोग जिनका नाम एक ही नगरीय निकाय में दो या उससे ज्यादा जगह दर्ज है। कुछ मामलों में एक ही जिले के दो अलग-अलग नगरीय निकायों की सूची में भी एक ही व्यक्ति का नाम है।
दूसरा और बड़ा कारण है शिफ्टेड वोटर यानी ऐसे लोग जो गांव छोड़कर शहर में बस गए। लेकिन पंचायत की सूची से नाम नहीं कटवाया। इससे उनका नाम पंचायत और नगरीय निकाय दोनों सूचियों में बना हुआ है। यही वजह है कि कुल संख्या असल से कहीं ज्यादा दिखती है।
SIR के बाद भी क्यों नहीं सुधरी गड़बड़ी
विधानसभा चुनावों से पहले एसआईआर यानी स्पेशल समरी रिवीजन (Special Summary Revision) किया गया था। इसमें डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम विधानसभा सूची से हटाए गए थे। लेकिन यही सफाई स्थानीय निकायों की वोटर लिस्ट में नहीं हो पाई। राज्य निर्वाचन आयोग ने केंद्रीय चुनाव आयोग से एसआईआर के बाद की अपडेटेड सूची मांगी थी ताकि उसी आधार पर निकाय सूची भी ठीक की जा सके। लेकिन सूची नहीं मिली।
दो आयोगों के बीच फंसा पेंच
राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त मनोज श्रीवास्तव ने बताया कि आयोग ने केंद्रीय चुनाव आयोग को पांच बार रिमाइंडर भेजे। इसके बावजूद अपडेटेड वोटर लिस्ट उपलब्ध नहीं कराई गई। उनके अनुसार सूची न मिलने पर आयोग को मजबूरन जिला स्तर पर अपने दम पर वोटर लिस्ट खंगालनी और अपडेट करनी पड़ रही है।
दूसरी तरफ संयुक्त मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी आर.पी. सिंह जादौन का कहना है कि केंद्रीय चुनाव आयोग की नीति के मुताबिक रिवीजन प्रक्रिया के दौरान सूची साझा नहीं की जाती।
आर.पी. सिंह जादौन ने स्पष्ट किया कि वास्तविक चुनाव के समय नियमों के अनुसार सूची उपलब्ध करा दी जाएगी। यानी दोनों आयोगों की अपनी-अपनी दलील है और इसी वजह से यह पेंच फंसा हुआ है।
कितने बड़े होंगे ये चुनाव
मध्यप्रदेश में अगले साल जून-जुलाई में 413 नगरीय निकायों के चुनाव होने हैं। इनके साथ ही करीब 23 हजार ग्राम पंचायतों में भी मतदान होना है। इतने बड़े चुनाव से पहले अगर वोटर लिस्ट में 58 लाख का फर्क बना रहा तो चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।
क्या होगा आगे
राज्य निर्वाचन आयोग (एमपी में एसआईआर) ने फिलहाल जिला स्तर पर वोटर लिस्ट की जांच और अपडेट का काम शुरू कर दिया है। यह प्रक्रिया 22 अप्रैल से जारी है। जो नाम डुप्लीकेट या गलत पाए जाएंगे उन्हें हटाया जाएगा।
अगर केंद्रीय चुनाव आयोग (Voter List) से अपडेटेड सूची मिल जाए तो काम और आसान हो जाएगा। लेकिन जब तक यह पेंच नहीं सुलझता तब तक दोनों आयोगों के बीच का यह अंतर बना रहेगा।
यह खबर क्यों जरूरी है
लोकतंत्र में मतदाता सूची की सटीकता सबसे बुनियादी जरूरत है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत हर वयस्क नागरिक को मताधिकार मिला हुआ है।
ऐसे में अगर वोटर लिस्ट में 58 लाख अतिरिक्त नाम हैं तो यह चुनावी पारदर्शिता पर सीधा सवाल है। डुप्लीकेट वोटरों की मौजूदगी फर्जी मतदान की आशंका को जन्म देती है जो लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है।
यह खबर मध्यप्रदेश के करोड़ों मतदाताओं से जुड़ी है जिन्हें यह जानने का हक है कि उनके वोट की ताकत कहीं पतली तो नहीं हो रही। दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच सूचना साझा न होने का यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही का भी सवाल है। डिजिटल और सामाजिक नैतिकता के नजरिए से यह पूरी तरह तथ्यात्मक और संतुलित खबर है।
FAQ
- मध्यप्रदेश की वोटर लिस्ट में 58 लाख एक्स्ट्रा वोटर कहां से आए?
केंद्रीय चुनाव आयोग की विधानसभावार सूची में मध्यप्रदेश में 5 करोड़ 39 लाख मतदाता हैं जबकि राज्य निर्वाचन आयोग की नगरीय निकाय और पंचायत सूची में यह संख्या 5 करोड़ 97 लाख है। इस 58 लाख के फर्क के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं। पहला, ऐसे मतदाता जिनका नाम एक ही निकाय में दो जगह दर्ज है। दूसरा, ऐसे लोग जिनका नाम जिले के दो अलग-अलग नगरीय निकायों की सूची में है। तीसरा, गांव से शहर शिफ्ट हुए लोग जिन्होंने पंचायत सूची से नाम नहीं कटवाया और इस तरह उनका नाम दोनों जगह बना हुआ है। - एसआईआर के बाद भी मध्य प्रदेश वोटर लिस्ट में गड़बड़ी क्यों रही?
एसआईआर यानी स्पेशल समरी रिवीजन विधानसभा चुनावों की सूची में डुप्लीकेट नाम हटाने के लिए किया गया था। लेकिन यह सफाई स्थानीय निकायों की वोटर लिस्ट में नहीं हुई क्योंकि राज्य निर्वाचन आयोग को एसआईआर के बाद की अपडेटेड सूची केंद्रीय चुनाव आयोग से नहीं मिली। आयोग ने पांच बार रिमाइंडर भेजे लेकिन केंद्रीय चुनाव आयोग की नीति के अनुसार रिवीजन प्रक्रिया के दौरान सूची साझा नहीं की जाती। इस वजह से दोनों सूचियों में अंतर बना रहा। - मध्यप्रदेश में अगले निकाय चुनाव कब होंगे और वोटर लिस्ट कब तक सुधरेगी?
मध्यप्रदेश में 413 नगरीय निकायों और करीब 23 हजार ग्राम पंचायतों के चुनाव अगले साल यानी 2026 के जून-जुलाई में होने हैं। वोटर लिस्ट सुधारने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने 22 अप्रैल से जिला स्तर पर अलग से सूची खंगालने और अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू की है। केंद्रीय चुनाव आयोग का कहना है कि वास्तविक चुनाव के समय नियमानुसार अपडेटेड सूची उपलब्ध करा दी जाएगी।
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