भोपाल में नगर निगम प्रोजेक्ट फाइलों तक सीमित, कमिश्नर को ही नहीं दिया रिकॉर्ड
पानी, सड़क और सफाई जैसी जरूरी सेवाएं नगर निगम की जिम्मेदारी होती हैं, लेकिन हैरानी की बात ये है कि खुद निगम के अफसरों को ही ये नहीं पता कि इन कामों का क्या हाल है।
पिछले तीन साल में वार्डों में नागरिकों और जनप्रतिनिधियों की मांग पर लगभग 16 हजार कामों के एस्टीमेट तैयार किए गए थे। इनमें से केवल दो हजार 500 कामों के लिए ही वर्क ऑर्डर जारी हुए हैं, बाकी काम तो बस फाइलों में दबे रह गए हैं।
निगम कमिश्नर को ही नहीं मिली जानकारी
हैरानी की बात यह है कि इन दो हजार 500 कामों की भी स्थिति क्या है, इसकी जानकारी खुद भोपाल नगर निगम कमिश्नर संस्कृति जैन को तीन महीने तक इंजीनियरों से मिली ही नहीं। उन्हें सिर्फ मौखिक रूप से बताया गया कि तीन साल में 16 हजार एस्टीमेट तैयार किए गए थे। इनमें से दो हजार 500 के वर्क ऑर्डर हुए हैं।
वेतन रोके गए, विभाग बदले
कमिश्नर ने इंजीनियरों से काम की जानकारी ऑन रिकॉर्ड मांगी, लेकिन इंजीनियरों ने उन्हें कोई जानकारी नहीं दी। इसके बाद उनके वेतन रोके गए, विभाग बदल दिए गए और उन्हें अक्षम बताते हुए बीएलओ के अधीन कर दिया गया, फिर भी जानकारी नहीं मिली।
अब निगम कमिश्नर आईएएस संस्कृति जैन ने तय किया है कि सभी काम ऑनलाइन होंगे। कार्यपालन यंत्रियों को पोर्टल पर जानकारी अपडेट करना अनिवार्य होगा और उन्हें सत्यता का शपथ पत्र भी देना होगा।
एक क्लिक में मिलेगी प्रोजेक्ट्स की जानकारी
फाइनेंशियल बिड ओपन होते ही पोर्टल पर जानकारी डाली जाएगी। वर्क ऑर्डर के साथ काम की डेडलाइन भी तय की जाएगी। इंजीनियर काम का निरीक्षण करते वक्त जियो-टैग फोटो और वीडियो अपलोड करेंगे। इन्हें कमिश्नर भई देख सकेंगे।
एक क्लिक में हर इलाके के काम और लंबित प्रोजेक्ट्स की जानकारी मिल जाएगी। भूमिपूजन में कोई देरी होती है तो उसका कारण भी रिकॉर्ड में दर्ज करना होगा।
काम आटकने का कारण क्या है?
कई बार लोग जनप्रतिनिधियों से काम की मांग करते हैं, तो वो एस्टीमेट बनवा देते हैं, लेकिन बिना उनकी मंजूरी के काम शुरू नहीं होता। नेताओं के भूमिपूजन के इंतजार में भी कई काम लंबे समय तक शुरू नहीं हो पाते हैं।
अपनी पसंद के ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए भी कई बार काम अटकाए जाते हैं। पार्षद और इंजीनियर मिलकर प्राथमिकता तय करते हैं और कहीं काम पूरे होते हैं तो कहीं अटक जाते हैं।
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