17 साल की देरी, दोगुनी लागत और अधूरी तैयारियां: आखिर कब मिलेगा नर्मदा का पानी?
समझें क्या है पूरा मामला...
- नर्मदा टनल परियोजना 17 साल से अधूरी पड़ी है।
- लागत 799 करोड़ से बढ़कर 1600 करोड़ पहुंची।
- निर्माण में 300 से अधिक सिंकहोल बने।
- अमेरिकी मशीन भी खुदाई में सफल नहीं हो सकी।
- जनता अभी भी नर्मदा जल का इंतजार कर रही।
मध्य प्रदेश के कटनी जिले में बन रही देश की सबसे लंबी वाटर टनल एक बार फिर चर्चा में है। प्रशासन दावा कर रहा है कि परियोजना अब अंतिम चरण में पहुंच गई है और जल्द ही नर्मदा का पानी विंध्य क्षेत्र तक पहुंचने लगेगा।
इसमें बड़ा सवाल यह है कि जिस परियोजना की शुरुआत 2008 में हुई थी, वह 17 साल बाद भी पूरी तरह तैयार क्यों नहीं हो पाई?
लाखों लोगों को पानी और किसानों को सिंचाई देने के नाम पर शुरू हुई इस महत्वाकांक्षी योजना की समय-सीमा कई बार पीछे खिसकी। लागत दोगुनी हो गई, निर्माण कार्य बार-बार बाधित हुआ और आज भी टनल के साथ नहरों की मरम्मत का काम बाकी है। ऐसे में जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जवाबदेही किसकी है?
2008 में शुरू हुई थी बरगी डायवर्जन परियोजना...
- 17 साल बाद भी परियोजना पूरी तरह तैयार नहीं।
- 11.95 किलोमीटर लंबी देश की सबसे बड़ी वाटर टनल बनाई जा रही है।
- शुरुआती अनुमानित लागत 799 करोड़ रुपए थी।
- लागत बढ़कर करीब 1600 करोड़ रुपए तक पहुंच गई।
- निर्माण के दौरान 300 से अधिक बार सिंकहोल बने।
- अमेरिकी टनल बोरिंग मशीन भी कामयाब नहीं हो सकी।
- कई मजदूरों की मौत और परिवारों का विस्थापन हुआ।
- नहर के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, मरम्मत अभी बाकी है।
- प्रशासन अब भी जल्द काम पूरा होने का दावा कर रहा है।
2008 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट, 2026 में भी इंतजार जारी
बरगी डायवर्जन योजना का उद्देश्य नर्मदा नदी का पानी जल संकट से जूझ रहे विंध्य क्षेत्र तक पहुंचाना था। इसके लिए कटनी के स्लीमनाबाद क्षेत्र में 11.95 किलोमीटर लंबी भूमिगत वाटर टनल का निर्माण शुरू किया गया।
परियोजना को क्षेत्र की तस्वीर बदलने वाला बताया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि 17 साल बाद भी काम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। हर कुछ वर्षों में परियोजना को जल्द पूरा होने का दावा किया गया, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग दिखाई देती रही।
समय-सीमा निकलती गई, बढ़ता गया इंतजार
किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता उसकी तय समय-सीमा में पूरी होने पर निर्भर करती है। लेकिन इस परियोजना में समय-सीमा बार-बार बढ़ती रही।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह योजना क्षेत्र के लिए इतनी महत्वपूर्ण थी तो फिर वर्षों तक इसकी निगरानी और क्रियान्वयन में अपेक्षित गंभीरता क्यों नहीं दिखाई गई? आखिर लाखों लोगों को पानी देने वाली योजना लगातार देरी का शिकार कैसे होती रही?
अमेरिकी मशीन फेल, निर्माण में आते रहे नए संकट
टनल निर्माण के दौरान भूगर्भीय परिस्थितियां बड़ी चुनौती बनकर सामने आईं। संगमरमर, चूना पत्थर, डोलोमाइट और स्लेट की परतों के बीच खुदाई का काम बेहद कठिन साबित हुआ।
वर्ष 2011 में लाई गई अमेरिकी रोबिन्स टनल बोरिंग मशीन भी इस चुनौती के सामने टिक नहीं सकी और तकनीकी रूप से विफल हो गई। हालत यह रही कि शुरुआती 1.6 किलोमीटर खुदाई पूरी करने में ही करीब साढ़े छह साल लग गए। इसके बाद नई तकनीक और दूसरी मशीनों की मदद से काम आगे बढ़ाया गया, लेकिन तब तक परियोजना वर्षों पीछे जा चुकी थी।
300 से ज्यादा सिंकहोल, बार-बार रुका काम
निर्माण के दौरान 300 से अधिक बार सिंकहोल बनने की घटनाएं सामने आईं। कई स्थानों पर जहरीली गैस निकलने की शिकायत हुई तो कहीं अचानक पानी का रिसाव शुरू हो गया।
मिट्टी धंसने की घटनाओं ने कई बार निर्माण कार्य रोक दिया। इन समस्याओं ने न सिर्फ परियोजना की रफ्तार धीमी की बल्कि लागत और समय दोनों को बढ़ा दिया।
मजदूरों की मौत और विस्थापन भी बना बड़ा मुद्दा
इस परियोजना के दौरान कई मजदूरों ने अपनी जान गंवाई। वहीं करीब 80 परिवारों को विस्थापन का सामना करना पड़ा। इतने बड़े सामाजिक और मानवीय प्रभाव के बावजूद परियोजना निर्धारित समय में पूरी नहीं हो सकी। इससे योजना प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होते हैं।
799 करोड़ से 1600 करोड़ तक पहुंची लागत
परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत 799 करोड़ रुपए तय की गई थी। लेकिन लगातार देरी, तकनीकी दिक्कतों और अतिरिक्त निर्माण कार्यों के कारण लागत लगभग दोगुनी होकर 1600 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। ऐसे में यह भी बड़ा सवाल है कि बढ़ी हुई लागत का बोझ आखिरकार किसके हिस्से में जाएगा और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
टनल लगभग पूरी, लेकिन नहरें अभी भी परेशानी
प्रशासन का दावा है कि टनल में अब करीब 85 मीटर खुदाई का कार्य शेष है। प्रतिदिन 3 से 4 मीटर खुदाई की जा रही है और जल्द निर्माण पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है।
हालांकि, दूसरी तरफ पहले से बनी नहरों के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। उनकी मरम्मत के लिए अभी टेंडर प्रक्रिया चल रही है। यानी टनल पूरी होने के बाद भी पूरी परियोजना के संचालन में समय लग सकता है।
जनता का सवाल: आखिर जवाबदेह कौन?
17 साल तक परियोजना अधूरी रहने, लागत दोगुनी होने और बार-बार समय-सीमा बढ़ने के बाद अब प्रशासन फिर जल्द काम पूरा होने का दावा कर रहा है।
जिन किसानों को वर्षों पहले सिंचाई मिल जानी चाहिए थी और जिन परिवारों को समय पर पेयजल सुविधा का लाभ मिलना चाहिए था, उनके लिए यह सवाल आज भी कायम है कि आखिर इतनी लंबी देरी की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
परियोजना पूरी होने पर कटनी, मैहर, सतना, पन्ना और रीवा के लोगों को लाभ मिलने की बात कही जा रही है। लेकिन जनता के लिए सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि जिस पानी का इंतजार वर्षों पहले खत्म हो जाना चाहिए था, वह अब जाकर क्यों पहुंच रहा है?
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