NPS पेंशन में भेदभाव पर हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

Jitendra Shrivastava | Sept 10, 2026, 19:09 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. NPS में सेवा के दौरान मौत पर पेंशन लाभ का मामला हाई कोर्ट पहुंचा है। केंद्रीय स्वायत्त निकाय के कर्मचारियों को रूल 10 से अलग रखने की नीति पर सवाल उठे हैं। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मामला NPS में सेवा के दौरान मौत के बाद मिलने वाले लाभों से जुड़ा है।
  • केंद्र सरकार और स्वायत्त निकाय के कर्मचारियों के नियम अलग बताए गए हैं।
  • रूल 10 के लाभ को ऑटोनॉमस संस्थान पर सीधे लागू नहीं किया गया।
  • इन फैसलों से जुड़े केंद्र के कई आदेश हाई कोर्ट में चुनौती दिए गए हैं।
  • हाई कोर्ट ने 3 सितंबर को केंद्र सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

NPS में नौकरी के दौरान कर्मचारी की मौत बड़ा सवाल बन गई है। सवाल पेंशन व्यवस्था के भीतर बराबरी का है। मामला मध्यप्रदेश हाई कोर्ट तक पहुंच गया है। याचिका में केंद्र सरकार की नीति को चुनौती दी गई है।



विवाद केंद्र सरकार और केंद्रीय स्वायत्त निकाय के कर्मचारियों से जुड़ा है। दोनों वर्ग NPS व्यवस्था के तहत आते हैं। फिर भी मृत्यु के समय मिलने वाले लाभ अलग हैं। इसी अंतर को याचिका में चुनौती दी गई है।



रूल 10 पर टिका पूरा विवाद

रूल 10 सेवा के दौरान मौत से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रावधान है। इसके तहत कर्मचारी को विकल्प दिया जाता है। यह विकल्प पुरानी पेंशन से जुड़े लाभों के लिए होता है। यह लाभ मौत या गंभीर अक्षमता जैसी स्थिति में जुड़ते हैं।



यानी कर्मचारी के परिवार को पेंशन सुरक्षा का रास्ता मिलता है। इसी नियम की लागू होने की सीमा विवाद का केंद्र है। ऑटोनॉमस संस्थाओं के कर्मचारियों के लिए इसे अलग रखा गया है।



केंद्र सरकार के आदेशों में क्या कहा गया?

विवाद में विभाग के खर्च का का 8 अप्रैल 2021 का दस्तावेज शामिल है। इसमें रूल 10 को सीधे लागू नहीं माना गया। स्वायत्त निकाय (ऑटोनॉमस बॉडीज) के मामलों को अलग तरीके से देखने की बात कही गई।



इसके बाद 15 अप्रैल 2024 को शिक्षा मंत्रालय ने पत्र जारी किया। इस पत्र में पहले वाले आदेश का हवाला दिया गया। इसमें रूल10 को स्वतः लागू नहीं माना गया। जरूरत पर मामला अलग से देखने की बात कही गई।



याचिका में 26 जून 2025 के शिक्षा मंत्रालय के आदेश को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने इन सभी फैसलों को एक साथ उठाया है। उनका सवाल कर्मचारियों के बीच समानता से जुड़ा है।



ऑटोनॉमस संस्थाओं के कर्मचारियों के साथ भेदभाव

मामला केवल एक कर्मचारी के पेंशन लाभ तक सीमित नहीं है। हाई कोर्ट के सामने नीति की वैधता का सवाल भी है। सवाल यह है कि NPS में अंतर कितना उचित है।



क्या समान NPS व्यवस्था वाले कर्मचारियों के लाभ अलग हो सकते हैं? क्या स्वायत्त निकाय के कर्मचारियों को अलग नियमों में रखा जा सकता है? इन सवालों पर केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखना होगा।



हालांकि, अभी हाई कोर्ट ने इस अंतर को गलत नहीं माना है। कोर्ट ने केवल केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अंतिम फैसला जवाब और आगे की सुनवाई के बाद होगा।



बता दें कि स्वायत्त निकाय ऐसी सरकारी संस्थाएं होती हैं जो प्रत्यक्ष नियंत्रण से स्वतंत्र होकर अपने नियमों और बजट के अनुसार काम करती हैं।



हाई कोर्ट ने जारी किया नोटिस

मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने 3 सितंबर 2026 को मामले में नोटिस जारी किया। केंद्र सरकार से जुड़े पक्षों को नोटिस दिया गया है। केंद्र की ओर से डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ने नोटिस स्वीकार किया।



कोर्ट ने मामले में चार सप्ताह में जवाब मांगा है। इसके बाद केंद्र का पक्ष रिकॉर्ड पर आएगा। फिर याचिकाकर्ता उस जवाब पर अपनी बात रख सकते हैं। इससे मामले की अगली दिशा काफी हद तक साफ होगी। फिलहाल अदालत ने केवल जवाब मांगने का आदेश दिया है।



कोर्ट में यह उठाया गया मुद्दा उठाया

मामले में अधिवक्ता रोहित शर्मा ने पैरवी की। उनके साथ अधिवक्ता साहिल शर्मा ने भी पक्ष रखा। दोनों अधिवक्ताओं ने NPS लाभों में अंतर का मुद्दा उठाया।



उनकी ओर से केंद्र के अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी गई है। याचिका का मुख्य आधार कर्मचारियों के बीच समान व्यवहार है। इसमें मृत्यु के बाद परिवार की पेंशन सुरक्षा भी जुड़ी है।



मामले की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है। इसका असर केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह सकता। यदि अदालत नीति में बदलाव का रास्ता खोलती है, तो अन्य कर्मचारी भी प्रभावित हो सकते हैं।



इन कर्मचारियों पर पड़ सकता है असर

मामले का संबंध केंद्रीय स्वायत्त निकाय में काम करने वाले कर्मचारियों से है। ऐसे संस्थानों में कई केंद्रीय संस्थान और संगठन आते हैं। इनमें NPS से जुड़े कर्मचारी बड़ी संख्या में हो सकते हैं।



फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी कर्मचारियों को लाभ मिलेगा। अदालत के अंतिम फैसले के बाद ही स्थिति साफ होगी। अभी केंद्र सरकार का जवाब आना बाकी है। मामले का अगला चरण इसलिए महत्वपूर्ण रहेगा। केंद्र अपने आदेशों और नीति का आधार बताएगा। इसके बाद हाई कोर्ट इस विवाद पर आगे विचार करेगा।



चार सप्ताह में सरकार को देना है जवाब

चार सप्ताह में केंद्र सरकार को अपना जवाब देना है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं को उस जवाब का अवसर मिलेगा। फिर हाई कोर्ट मामले की आगे सुनवाई करेगा।



इस सुनवाई से रुल 10 की लागू सीमा पर तस्वीर साफ हो सकती है। साथ ही स्वशासीय संस्थान के कर्मचारियों की स्थिति भी स्पष्ट होगी। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि NPS में समान सुरक्षा मिलेगी या नहीं। इसका जवाब हाई कोर्ट की आगे की सुनवाई से सामने आएगा।



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