OBC आरक्षण मामलों पर 13 से 15 मई तक हाईकोर्ट में होगी मैराथन सुनवाई, 90 प्रकरण सूचीबद्ध
समझें पूरा मामला...
- 13 से 15 मई तक OBC आरक्षण से जुड़े 90 मामलों की फाइनल सुनवाई होगी।
- चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच करेगी सुनवाई।
- मामलों को कॉज लिस्ट में सीरियल नंबर 5 से 5.89 तक सूचीबद्ध किया गया।
- सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी 2026 को तीन माह में फैसला करने के निर्देश दिए थे।
- ओबीसी पक्ष के अधिवक्ताओं ने सरकार पर सुनवाई टालने के प्रयासों के आरोप लगाए हैं।
जबलपुर हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण से जुड़े करीब 90 मामलों की 13 से 15 मई तक लगातार सुनवाई होगी। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा की खंडपीठ इन मामलों पर प्रतिदिन सुबह 11:30 बजे सुनवाई करेगी। सुनवाई से पहले सरकार की भूमिका और बार-बार हो रही देरी को लेकर अधिवक्ताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
कल 13 मई से शुरू होगी निर्णायक सुनवाई
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण से जुड़े लंबे समय से लंबित मामलों में अब निर्णायक सुनवाई का दौर शुरू होने जा रहा है। जबलपुर स्थित हाईकोर्ट की मुख्यपीठ में 13 मई से 15 मई 2026 तक लगातार तीन दिनों तक इन मामलों की सुनवाई निर्धारित की गई है।
जानकारी के अनुसार चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा एवं जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच प्रतिदिन सुबह 11:30 बजे से सुनवाई करेगी। कॉज लिस्ट में ओबीसी आरक्षण से जुड़े लगभग 90 प्रकरणों को सीरियल क्रमांक 5 से 5.89 तक सूचीबद्ध किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही दे चुका है समयसीमा
ओबीसी आरक्षण विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले ही मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को स्पष्ट निर्देश दे चुका है। 17 फरवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि आरक्षण से जुड़े सभी लंबित मामलों का निराकरण तीन माह के भीतर किया जाए। इसके बावजूद अब तक मामलों में अंतिम सुनवाई शुरू नहीं हो पाई थी। इसी देरी को लेकर अब एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।
सरकार की भूमिका पर उठ रहे सवाल
सुनवाई से पहले ओबीसी वर्ग से जुड़े अधिवक्ताओं ने मध्यप्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अधिवक्ताओं का कहना है कि राज्य सरकार की उदासीनता और लगातार बदलती रणनीति के कारण मामलों की सुनवाई प्रभावित होती रही है। उनका आरोप है कि पहले सुप्रीम कोर्ट में विशेष अधिवक्ताओं की नियुक्ति की गई और एक ही सुनवाई के बाद उन्हें हटा दिया गया।
इसी प्रकार हाईकोर्ट में भी पिछली सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह की पहल पर राज्य शासन की अधिसूचना में बदलाव करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराज को नियुक्त किया गया। हालांकि, कोर्ट की सुनवाई के अनुसार यह नियुक्तियां इसलिए बदली गई क्योंकि हाईकोर्ट ने इस मामले पर संज्ञान लिया।
ओबीसी वर्ग की ओर से पर भी कर रहे हैं कुछ अधिवक्ता 27 प्रतिशत से अधिक आरक्षण की मांग पर भी बहस करने वाले थे। कोर्ट ने इस मामले पर ही संज्ञान दिया और यह कहा कि सरकार की ओर से नियुक्त किया गया अधिवक्ता सरकार के खिलाफ बहस नहीं कर सकते। इसके बाद ही सरकार के द्वारा या फैसला लिया गया और ओबीसी वर्ग की और से बहस करने वाले कुछ अधिवक्ताओं को अलग किया गया।
ग्रीष्मकालीन अवकाश से पहले फैसला आने पर नजर
ओबीसी पक्ष के अधिवक्ताओं का आरोप है कि राज्य सरकार एक बार फिर किसी तकनीकी या प्रक्रियात्मक मुद्दे के जरिए मामले को ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद तक टालने की कोशिश कर सकती है।
हालांकि, अब सभी की निगाहें 13 मई से शुरू होने वाली सुनवाई पर टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि यह सुनवाई मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण की भविष्य की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
प्रदेश की राजनीति और भर्ती प्रक्रियाओं पर पड़ेगा असर
ओबीसी आरक्षण का मुद्दा केवल कानूनी विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव प्रदेश की सरकारी भर्तियों, चुनावी समीकरणों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी पड़ रहा है।
कई भर्ती परीक्षाएं और चयन प्रक्रियाएं इस विवाद के कारण प्रभावित हुई हैं। ऐसे में हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई को प्रदेश के लाखों अभ्यर्थियों और ओबीसी वर्ग के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
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