बित्ता भर जोड़ती और हाथ भर तोड़ती कांग्रेस... जनता को उम्मीदें कितनी?

Ravi Kant Dixit | Sept 21, 2026, 20:21 IST
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इंदौर के छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने शिक्षा पर सवाल उठाए, लेकिन मंच पर पुलकित मणि की मिमिक्री से विवाद बढ़ा। भाजपा ने कांग्रेस से माफी मांगने की बात की, आयोजन को लेकर कांग्रेस की तैयारी पर भी सवाल उठे।

कांग्रेस जब-जब विपक्ष की भूमिका में अपने लिए जगह बनाती दिखाई देती है, तब-तब उसके सामने बड़ी चुनौती विपक्ष का मुद्दा संभालने की नहीं, अपना मंच और अपने नेताओं को संभालने की होती है।

सियासत में साख बनाने में वक्त लगता है, लेकिन उसे गंवाने में एक तस्वीर, एक बयान या मंच पर हुआ एक छोटा-सा वाकया काफी होता है। कांग्रेस के साथ पिछले कुछ समय में यही पैटर्न बार-बार दिखाई देता है। पार्टी 'बित्ता भर साख जोड़ती है और फिर ऐसा कुछ कर बैठती है कि हाथ भर साख पर बट्टा लग जाता है।'

ताजा मामला इंदौर के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का है। राहुल गांधी के इस कार्यक्रम का मकसद छात्रों और युवाओं से संवाद करना था। उनके सवालों को सामने लाना था। शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर बहस खड़ी करना था। इसी लाइन पर आगे बढ़ते हुए राहुल गांधी ने कार्यक्रम में छात्रों के सवाल, शिक्षा व्यवस्था और सरकार की नीतियों को लेकर दमखम के साथ बात रखी। कांग्रेस ने इसे युवाओं से जुड़ने की अपनी मुहिम के तौर पर आगे बढ़ाया,

लेकिन फिर मंच पर कॉमेडियन पुलकित मणि की प्रस्तुति हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नकल वाला हिस्सा सोशल मीडिया और सियासी बहस का केंद्र बन गया। भाजपा ने इसे लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी पर जमकर निशाना साधा और माफी की मांग की। कांग्रेस की तरफ से इसे मिमिक्री और मनोरंजन के तौर पर देखा गया।

सवाल यहां यह नहीं है कि राजनीतिक व्यंग्य होना चाहिए या नहीं? लोकतंत्र में व्यंग्य और राजनीतिक कटाक्ष की अपनी जगह है। सवाल यह है कि जब मंच का नाम ‘छात्रों की गूंज’ हो, मकसद युवाओं के सवालों को राष्ट्रीय बहस में लाना हो और मंच पर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हो, तब उस मंच की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?

यहीं कांग्रेस के सामने वह सवाल खड़ा होता है, जिससे वह बार-बार घिरती रही है। विपक्ष की राजनीति में सरकार के खिलाफ सवाल उठाना जितना जरूरी है, उतना ही अहम है कि खुद विपक्ष अपने मंचों के संदेश को लेकर स्पष्ट रहे।

मंच पर कौन था, इसकी पड़ताल क्यों नहीं?

इंदौर के कार्यक्रम को लेकर भाजपा ने आरोप लगाए। बीजेपी नेताओं ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दावा किया कि मंच पर मौजूद कुछ चेहरे कांग्रेस या उससे जुड़े छात्र संगठनों से संबंध रखते हैं और उन्हें आम छात्रों के तौर पर पेश किया गया। भाजपा ने राधा मालवीय, तनय और रंजीत से जुड़े सोशल मीडिया प्रोफाइल शेयर किए और इनकी राजनीतिक या संगठनात्मक संबद्धता का दावा किया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर जरूरी है, लेकिन राजनीतिक सवाल अपनी जगह है।

राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उनके कार्यक्रमों के लिए कांग्रेस की बड़ी टीम काम करती है। ऐसे में यह जानना स्वाभाविक है कि मंच पर सवाल पूछने या संवाद करने के लिए चुने गए लोगों की पृष्ठभूमि की पड़ताल किस स्तर तक की जाती है। यदि प्रोफाइल की पड़ताल नहीं होती, तो यह आयोजन की गंभीर तैयारी पर सवाल है और यदि जांच होती है तो फिर जनता के सामने यह साफ होना चाहिए कि मंच पर मौजूद लोगों की वास्तविक पहचान और भूमिका क्या थी? यही वह पॉइन्ट है, जहां कांग्रेस को भाजपा के आरोपों का जवाब राजनीतिक नारे से नहीं, तथ्य और पारदर्शिता से देना चाहिए।

विपक्ष को तमाशे का जवाब तमाशे से देना है या सवालों से?

यहां कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक सबक भी है। सत्ता पक्ष की नीतियों पर सवाल उठाना विपक्ष की जिम्मेदारी है, लेकिन विपक्ष से जनता यह भी अपेक्षा करती है कि वह अपने कार्यक्रमों में उन मुद्दों को केंद्र में रखे, जिनसे आम लोग और खासकर युवा सीधे जुड़े हैं। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाएं, फीस, छात्रावास, पेपर लीक, रोजगार के अवसर, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे कांग्रेस के पास हैं। इंदौर के मंच पर इन सवालों की जगह बनी भी, लेकिन जैसे ही राजनीतिक भाषण और गंभीर छात्र संवाद के बीच मिमिक्री का हिस्सा आया, मूल मुद्दे पीछे चले गए। यही कांग्रेस की दिक्कत है।

मुद्दा बड़ा होता है, लेकिन विवाद उससे बड़ा हो जाता है। यह पहली बार नहीं है। इससे पहले दिल्ली में ‘रचनात्मक कांग्रेस’ के सम्मेलन में राहुल गांधी और कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित के बीच मंच पर हुई बातचीत ने भी बखेड़ा खड़ा कर दिया था। वहां विदेश नीति पर बातचीत के दौरान मेलोनी को लेकर की गई टिप्पणी ने कार्यक्रम के राजनीतिक संदेश को पीछे धकेल दिया था। राजनीति में मंच पर कही गई बात का अपना वजन होता है। खासकर तब, जब मंच पर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व मौजूद हो। ऐसे मौकों पर हल्की टिप्पणी भी पूरे कार्यक्रम की दिशा बदल देती है।

कांग्रेस के सामने चुनौती यही है कि उसके कार्यक्रम का राजनीतिक संदेश मंच पर मौजूद हर व्यक्ति की टिप्पणी से कमजोर न पड़े। इंदौर के महू में भी मुद्दे से ज्यादा बयान चर्चा में आया था। जनवरी 2025 में महू में ‘जय बापू, जय भीम, जय संविधान’ रैली के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने महाकुंभ और गंगा स्नान को लेकर सवाल उठाया था। उन्होंने पूछा था कि गंगा में डुबकी लगाने से क्या गरीबी दूर होगी और क्या इससे भूखे लोगों का पेट भरेगा।

उन्होंने यह भी कहा था कि उनका उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है और किसी को बुरा लगा हो तो उन्होंने खेद जताया। खरगे का मूल राजनीतिक तर्क गरीबी, भूख और रोजगार जैसे मुद्दों को धार्मिक आयोजनों की चर्चा से जोड़कर देखने का था, लेकिन भाजपा ने इसे धार्मिक आस्था पर टिप्पणी के रूप में लिया और तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया दी।

नतीजा?

जिस कार्यक्रम का राजनीतिक संदेश था ‘जय बापू, जय भीम, जय संविधान’, उसकी चर्चा लंबे समय तक खरगे के महाकुंभ वाले बयान को लेकर होती रही। यानी फिर वही कहानी। कांग्रेस ने मुद्दा उठाया, बहस कहीं और चली गई। कांग्रेस की असली चुनौती यही है। उसके पास सरकार को घेरने के लिए मुद्दों की कमी नहीं है। राहुल गांधी का छात्रों के बीच जाना भी रणनीति का हिस्सा है। इंदौर के कार्यक्रम में उन्होंने छात्रों से संवाद किया और शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए, लेकिन राजनीति में सिर्फ मुद्दा होना पर्याप्त नहीं है।

मंच कैसा है, संदेश क्या है, कौन बोल रहा है, किस संदर्भ में बोल रहा है और उस कार्यक्रम के बाद जनता के बीच कौन-सी बात रह जाती है...यह भी उतना ही अहम है। कांग्रेस के सामने यही प्रबंधन की चुनौती है। वह जितना समय सरकार को घेरने में लगाती है, उतनी ही सावधानी उसे अपने मंचों को संभालने में भी दिखानी होगी। क्योंकि आज की राजनीति में विपक्ष की एक चूक सत्ता पक्ष के लिए हथियार बन जाती है और कांग्रेस की विडंबना यही है।

बित्ता भर जोड़ने में कई दिन लगते हैं,

हाथ भर गंवाने में एक मंच काफी होता है।

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