रीवा के अस्पताल में मरीज ने ब्लड लेने से किया इनकार, बोला-मेरी जाति का खून लाओ
समझें क्या है पूरा मामला
- रीवा संजय गांधी अस्पताल में मामला सामने आया।
- परिजनों ने जाति बताकर रक्त रोकने का आरोप लगाया।
- रक्तदाता ने भी इसी तरह के आरोप लगाए।
- अस्पताल प्रबंधन ने आरोपों को गलत बताया है।
- ब्लड बैंक ने जाति धर्म आधार नहीं होने की बात कही।
रीवा के संजय गांधी अस्पताल में एक गंभीर आरोप सामने आया है। मरीज के परिजनों और एक रक्तदाता ने दावा किया कि जाति पूछकर खून लेने से इनकार किया गया। परिवार का कहना है कि उन्हें मरीज की जाति वाला डोनर लाने को कहा गया। ब्लड बैंक प्रभारी ने इन आरोपों को गलत बताया है। उनका कहना है कि डोनर का खून हाई रिस्क की वजह से नहीं लिया गया।
सीधी से इलाज कराने आई थी मरीज
सीधी जिले के रहने वाले बैजनाथ वैश्य अपनी भांजी को लेकर रीवा पहुंचे थे। भांजी की हालत गंभीर थी। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि मरीज को खून की जरूरत है। इसके बाद परिवार ने रक्तदान की कोशिश शुरू की।
पहले परिवार के एक सदस्य ब्लड बैंक गए। लेकिन उनकी उम्र 18 साल से कम थी। इस वजह से उनका खून नहीं लिया गया। परिवार को दूसरा डोनर तलाशना पड़ा।
परिचित ने की रक्तदान की कोशिश
मंगलवार सुबह परिवार के परिचित जीतेंद्र पांडेय ब्लड बैंक पहुंचे। उन्होंने रक्तदान करने की इच्छा जताई। डोनर का आरोप है कि उनका खून लेने से मना कर दिया गया।
जीतेंद्र का दावा है कि उन्हें कहा गया कि पांडे का खून वैश्य मरीज को नहीं चढ़ सकता। उनसे मरीज की जाति वाला डोनर लाने को कहा गया। यह आरोप सामने आते ही मामला तूल पकड़ गया।
परिजनों का कहना है कि इलाज की इस मुश्किल घड़ी में उन्हें जाति के नाम पर परेशान किया गया। इस घटना ने अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अस्पताल ने आरोप को बताया गलत
संजय गांधी अस्पताल के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. लोकेश ने मामले को गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की जांच की जाएगी।
डॉ. लोकेश के मुताबिक, काउंसलिंग के दौरान डोनर को हाई रिस्क श्रेणी में पाया गया। इसी वजह से उनका खून नहीं लिया गया। उन्होंने साफ कहा कि ब्लड बैंक में जाति या धर्म पूछकर खून कभी नहीं लिया जाता।
अस्पताल प्रबंधन ने जाति के आधार पर इनकार वाले सभी आरोपों को निराधार बताया है। प्रबंधन का कहना है कि नियमों के तहत ही डोनर की जांच होती है।
अब जांच पर टिकी नजरें
फिलहाल यह मामला दो पक्षों के दावों के बीच उलझा है। एक तरफ परिजन और डोनर जाति आधारित भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं। दूसरी तरफ अस्पताल प्रबंधन इसे खारिज कर रहा है।
सच्चाई क्या है, यह जांच और मौजूद रिकॉर्ड से ही साफ हो पाएगा। स्वास्थ्य विभाग की तरफ से भी इस मामले पर आधिकारिक बयान का इंतजार है। स्थानीय लोग इस घटना को लेकर चिंता जता रहे हैं।
यह मामला सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है कि क्या सरकारी अस्पतालों में इलाज के दौरान जाति आड़े आ सकती है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट से स्थिति और साफ होगी।
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