सतना मेडिकल बिल्डिंग में गुणवत्ता पर घमासान: रिपोर्ट में खामियां, निगम बोला-सब सही
मध्यप्रदेश के सतना जिले में बन रहे रामनगर मेडिकल भवन को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। एक ओर गुणवत्ता परिषद की निरीक्षण टीम ने निर्माण में गंभीर खामियां बताई हैं, वहीं भवन विकास निगम के इंजीनियर इन आरोपों को खारिज कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर सच्चाई क्या है, गुणवत्ता में गड़बड़ी या बाद में की जा रही लीपापोती?
क्या है पूरा मामला?
रामनगर (सतना) में 30 से 50 बेड वाले मेडिकल भवन का निर्माण भवन विकास निगम द्वारा कराया जा रहा है। इस परियोजना की शुरुआत में लागत लगभग 9.15 करोड़ रुपए थी। लेकिन अब यह बढ़कर करीब 13 करोड़ रुपए हो गई है। काम तय समय (अप्रैल 2024) में पूरा नहीं हो सका और अब गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जन्मदिन पर ‘बहनों की पाती’ से सजा मुख्यमंत्री निवास, जल्द होगी विशेष महिला पंचायत
निरीक्षण में क्या-क्या खामियां मिलीं?
गुणवत्ता परिषद की टीम ने 5 जनवरी 2026 को निरीक्षण किया। उन्होंने कई गंभीर कमियां गिनाईं। भवन की ऊंचाई (2.10 मीटर) जरूरत से ज्यादा पाई गई। इससे लागत बढ़ी और करीब 1.5–2 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च हुआ। भवन विकास निगम ने ऊंचाई का सही उपयोग नहीं किया। वहां स्टोर या पार्किंग बन सकती थी। दीवार और स्लैब के बीच गलत मटेरियल (थर्माकोल) का इस्तेमाल किया गया। टाइल्स सही तरीके से नहीं लगीं, कई जगह खोखली आवाज आई।
फिनिशिंग कार्य को असंतोषजनक बताया गया। संबंधित अधिकारियों की लापरवाही भी रिपोर्ट में दर्ज की गई। गुणवत्ता परिषद का सीधा आरोप था कि निर्माण कार्य में गंभीर तकनीकी खामियां हैं। इससे सरकारी पैसे का नुकसान हुआ और भवन की उपयोगिता और सुंदरता प्रभावित हुई। जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जरूरत है।
सीएम मोहन यादव के जन्मदिन पर नगराध्यक्ष मिश्रा, प्रभारी रावत की चतुराई ने सबको चौंकाया
भवन विकास निगम की सफाई
ईएनसी (इंजीनियरिंग चीफ) अजय श्रीवास्तव ने कहा कि काम ऑनगोइंग था, कमियां बाद में ठीक कर दी गईं। ऊंचाई को लेकर जो आपत्ति है, वह जस्टिफाइड है। उनके पास कई प्रोजेक्ट हैं, हर केस याद रखना मुश्किल है। आप डीजीएम से बात कर लें।
वर्दी का ग्लैमर: सोशल मीडिया पर ‘सिंघम’ बने पुलिसकर्मी, रील और पेड प्रमोशन से उठे अनुशासन पर सवाल
डीजीएम अजय ठाकुर का पक्ष
भवन की ऊंचाई ड्राइंग के अनुसार रखी गई। लागत बढ़ने की वजह फ्लोर एरिया बढ़ना बताया गया। ऊंचाई बढ़ाने से सिर्फ भराव (फिलिंग) की लागत बढ़ी। उन्होंने स्वीकार किया कि पुरानी DPR (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) सही नहीं थी। बाद में नई DPR बनाकर काम आगे बढ़ाया गया।
सबसे बड़ा सवाल: विरोधाभास क्यों?
मामला यहां से उलझता है। गुणवत्ता परिषद कह रही है कि खामियां गंभीर हैं। वहीं निगम का कहना है कि सब कुछ सही और जस्टिफाइड है। इंजीनियर मान रहे हैं कि लागत बढ़ी, लेकिन कारण अलग-अलग बता रहे हैं।
अगर DPR गलत थी, तो काम शुरू ही क्यों किया गया? अगर सब सही था, तो निरीक्षण टीम को मौके पर क्यों नहीं बताया गया? और अगर खामियां थीं, तो क्या बाद में सिर्फ कागजी सुधार हुआ? कंसल्टेंसी की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
डिजाइन और मॉनिटरिंग में शामिल कंसल्टेंसी पर भी रिपोर्ट में लापरवाही का संकेत मिला है। यह सवाल और गहरा हो जाता है कि इतनी बड़ी परियोजना में निगरानी आखिर कैसे ढीली पड़ी?
ईडी ने 3.36 करोड़ का बैंक लोन डकारने वाली फर्म की संपत्ति अटैच की
सिस्टम पर खड़े होते सवाल
पूरा मामला सिर्फ एक बिल्डिंग का नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। क्या निर्माण में गुणवत्ता से समझौता हुआ? क्या बाद में लीपापोती कर मामला दबाने की कोशिश की गई? या फिर यह सिर्फ तकनीकी मतभेद हैं? एक तरफ सरकारी रिपोर्ट है, दूसरी तरफ विभाग की सफाई, लेकिन सच इन दोनों के बीच फंसा नजर आता है।