शहडोल में कागजी मुरुम का खेल? खदान नहीं, फिर भी लाखों के बिल पास... अब नए घोटाले की गूंज
समझें क्या है पूरा मामला
- शहडोल में मुरुम खदानों को लेकर सवाल उठे।
- जिले में कोई वैध मुरुम खदान नहीं बताई गई।
- पंचायतों में लाखों रुपए के बिल पास हुए।
- पोर्टल पर भुगतान के दस्तावेज मौजूद हैं।
- मामले में निष्पक्ष जांच की मांग उठी है।
सरकारी खर्चों पर गंभीर सवाल
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल शहडोल जिले में सरकारी खर्चों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार मामला मुरुम (मोरम) खरीद का है। सरकारी रिकॉर्ड कहता है कि जिले में मुरुम की एक भी वैध खदान नहीं है, लेकिन पंचायतों के निर्माण कार्यों में मुरुम की सप्लाई दिखाकर लाखों रुपए के बिल पास किए गए। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर यह मुरुम आई कहां से और भुगतान किस आधार पर हुआ?
क्या है पूरा मामला?
शहडोल पहले भी ड्राई फ्रूट वाली चाय, कागजी तालाब और मजदूरों के फर्जी भुगतान जैसे मामलों को लेकर चर्चा में रहा है। अब पंचायतों में मुरुम खरीद से जुड़ा नया मामला सामने आया है, जिसने सरकारी व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। खनिज विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक जिले में मुरुम की कोई स्वीकृत खदान संचालित नहीं है। इसके बावजूद पंचायतों के विकास कार्यों में मुरुम की खरीद दिखाकर भुगतान किए जाने के दस्तावेज सामने आए हैं। गड़बड़ी की जानकारी पंचायत दर्पण पोर्टल पर अपलोड किए गए बिलों से सामने आई।
झिरिया पंचायत का मामला
सोहागपुर जनपद की ग्राम पंचायत झिरिया में पीएम जनमन योजना के तहत पेवर ब्लॉक निर्माण के लिए एस.एन. हार्डवेयर से मुरुम खरीदे जाने का दावा किया गया। इसके लिए 31 हजार 400 का भुगतान भी दर्ज है।
सीसी रोड निर्माण में भी भुगतान
एक अन्य बिल में सीसी रोड निर्माण के लिए 90 हजार 720 का भुगतान स्वीकृत दिखाया गया है। इसमें करीब 66 हजार 000 की मुरुम खरीद भी शामिल बताई गई है।
अधिकारियों के बयान भी बढ़ा रहे हैं सवाल
जिला खनिज अधिकारी राहुल शांडिल्य का कहना है कि शहडोल जिले में मुरुम की कोई वैध खदान स्वीकृत नहीं है।
वहीं संयुक्त आयुक्त विकास एमपी सिंह का कहना है कि पंचायतों में नियमानुसार कार्य हुए होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि मुरुम कहां से लाई गई और भुगतान कैसे हुआ, इसकी जांच कराई जाएगी। इन दोनों बयानों के बाद पूरे मामले को लेकर और अधिक सवाल खड़े हो गए हैं।
अब सबसे बड़े सवाल
- जिले में वैध मुरुम खदान नहीं है, फिर सामग्री कहां से आई?
- क्या मुरुम परिवहन के लिए ई-ट्रांजिट पास जारी किए गए थे?
- हार्डवेयर दुकान से मुरुम की सप्लाई कैसे दिखाई गई?
- क्या निर्माण कार्यों में वास्तव में मुरुम का उपयोग हुआ?
- या फिर केवल कागजों में खरीद दिखाकर सरकारी राशि का भुगतान कर दिया गया?
जांच से ही साफ होगी तस्वीर
निष्पक्ष जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण कार्य नियमों के अनुसार हुए या नहीं। जांच में यह भी सामने आएगा कि भुगतान वास्तविक कार्यों के आधार पर हुआ या दस्तावेजों के सहारे। फिलहाल पंचायतों के बिल और खनिज विभाग का रिकॉर्ड एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं, जिससे जांच की मांग तेज हो गई है।
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